शुरूआत

गाड़ी तेजी से बढ़ रही थी। वक्त मानो पंख लगा के उड़ रहा था। सभी दौड़ रहे थे वो भी भाग रहा था। जितनी जल्दी हो सके जितना ज्यादा हो सके वो सब कुछ पा लेना चाहता था। दूसरों की नजर में खुद को साबित करना चाहता था फिर भले ही खुद की नजरों में गिरना क्यूं न पड़े। नियम तो जरूरत के मुताबिक हर कोई बदल लिया कराता है ।उसने तो खुद को ही बदल लिया था। रिश्ते,प्यार, दुआ, ईमान, गांव, दोस्त, हिंदी और माँ-बाप सब दूसरी पिछड़ी दुनिया के लगते थे। तभी एक धमाका हुआ और उसकी नींद टूट गई। गाड़ी पटरी से उतर गई थी। भीषण रेल हादसा हुआ था। चारों तरफ सिर्फ लाशें और धूल थी। उसकी आँखों के सामने वो पिछड़ी दुनिया घूम गयी फिर चल दिया वो एक नई शुरुआत पर… दूसरों की नजर में सफल होकर।

आसान रास्ता

आज वह उठा तो कुछ उदास था.अपनी उदासी का कारण दूसरों में ढूंढा तो जो मिला वो पहले से पता था.आसान था यह रास्ता…दूसरों में खुद को ढूंढना हमेशा आसान होता है. मुश्किल है तो बस खुद को ढूंढना..जो सबसे करीब है वो नजर नहीं आता और जो दूर दिखता है वो सबसे आसान लगता है…यही देखने का नजरिया ही तो कारण था उसकी उदासी का..शायद किसी ने ईसे समझा था और लिखा दिया था..”आनंद श्रोत बह रहा फिर मन क्यूं उदास है? अचरज है कि जल में रह कर भी मछली को प्यास है.”