खुद को निखारिए







किसी यूरोपीय ने एक बार महान एक भारतीय दार्शनिक से पूछा था कि मनुष्य के जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानवीय गुण कौन सा है ? दार्शनिक ने कुछ देर सोचने के बाद कहा था कि वह गुण है “आत्मसमीक्षा” अर्थात खुद के प्रति सजग होना।

हमें अगर गलती निकालनी हो तो हम भगवान से लेकर छोटे इन्सान तक की गलती पर्याप्त मात्रा में निकाल ही लेते हैं। बस हम अपनी ही गलतियों और कमियों की सही समीक्षा नहीं कर पाते हैं।

यदि मनुष्य अपनी गलतियों के प्रति सजग है तो उसे अपने जीवन को निखारने से कोई भी रोक नहीं सकता है। वह खुद भी एक अच्छा इंसान बनेगा और दूसरों को भी सही रास्ते पर चलने को कहेगा। मनुष्य के जीवन का एकमात्र उद्देश्य यही है कि वो अपने जीवन की निरन्तर समीक्षा करते हुए उसे बेहतर बनाए। वह बीते हुए कल से सीखकर आने वाले कल को और बेहतर बनाए।

बेकार से बेहतर की यात्रा ही हमें मंजिल की तरफ ले जाती है। यह सारे जीवन लगातार चलने वाली यात्रा है। हर दिन हमें बीते हुए कल से सीखने का मौका देता है। और हमें अवसर देता है खुद को कल से बेहतर बनने का।

यों तो दूर से देखने पर इतने छोटे से प्रयास की गंभीरता का अनुमान लगाना मुश्किल है पर यदि यह गुण हमारी दिनचर्या में शामिल हो जाता है तो धीरे-धीरे ही सही पर हमारी दृष्टि बाहर से मुड़कर भीतर की ओर हो जाती है और फिर हमें चीजों को देखने समझने का एक नया नजरिया मिल जाता है जो हमें और हमारे आने वाले कल को बीते हुए कल से बेहतर बना सकता है। मैं भी प्रयास कर रहा हूं आप भी कीजिए।

जीना इसी का नाम है



एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था। अचानक से उसे लगा कि, उसकी बहन पीछे रह गयी है। वह रुका, पीछे मुड़कर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।

लडका पीछे आता है और बहन से पूछता है, “कुछ चाहिये तुम्हें?” लडकी एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है। बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी।

दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ। अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पूछा, “सर, कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?”

दुकानदार एक शांत और गहरा व्यक्ति था, उसने जीवन के कई उतार चढ़ाव देखे थे, उन्होने बड़े प्यार से बच्चे से पूछा, “बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो ?” बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोड़ी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर बीनी थी!

दुकानदार वो सब लेकर यूँ गिनता है जैसे कोई पैसे गिन रहा हो।सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,”सर कुछ कम हैं क्या?”

दुकानदार : “नहीं – नहीं, ये तो इस गुड़िया की कीमत से भी ज्यादा है, ज्यादा मैं वापस देता हूँ” यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी। बच्चा बड़ी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।

यह सब उस दुकान का कामगार देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पूछा, “मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सीपों के बदले मे दे दी?”

दुकानदार हंसते हुये बोला, “हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6 साल के बच्चे के लिये बहुत मूल्यवान है और अब इस उम्र में वो नहीं जानता, कि पैसे क्या होते हैं?

पर जब वह बडा होगा ना.. और जब उसे याद आयेगा कि उसने सीपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी। तब उसे मेरी याद जरुर आयेगी, और फिर वह सोचेगा कि, “यह विश्व अच्छे इंसानों से भी भरा हुआ है।”

यही बात उसके अंदर सकारात्मक सोच बढानेे में मदद करेगी और वो भी एक अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा।

Courtsey by AWGP Shantikunj Haridwar
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यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता


हमारे जानने वाली एक महिला इस बात से बेहद परेशान थी कि उनका चार साल का बेटा अक्सर दूसरों के यहाँ से कुछ भी जो उसे अच्छा लगता वो सामान घर उठा कर ले आता कभी दूसरे बच्चों के खिलौने उठा लाता तो कभी उनकी पेन्सिल या किताबें उठा लाता। उसकी इस आदत से परेशान वो उसको डांटती उस पर गुस्सा होती पर बच्चे के व्यवहार में कोई परिवर्तन न होते देख उन्होंने child psychologist से मदद मांगी उन्होंने उनसे खुद को बच्चे के स्थान पर रखकर सोचने की सलाह दी और समझाया कि बच्चों को अपनी और दूसरों की चीजों का अन्तर मालूम नहीं होता,इसलिए अच्छी लगने पर कोई भी चीज उठा लेना चाहे वो किसी और की क्यों न हो,इसमें उन्हें बुराई नजर नहीं आती। बच्चों का मानना है कि दुनिया की हर चीज अपनी है जिसे वे जब चाहे ले सकते हैं हालांकि 6 वर्ष की उम्र तक आते आते वे अपनी और दूसरों की चीजों में अन्तर करना जान जाते हैं। उन्होंने उन महिला को समझाया कि जब भी बच्चा दूसरों की चीज उठाकर घर ले आए तो उन्हें बच्चे को डाटने की बजाय खुद को बच्चे की जगह रखकर सोचना चाहिए और उसे धैर्य के साथ समझाना चाहिए, उसे गलती का एहसास कराना चाहिए कि जो चीज वो अपनी समझ कर उठा लाया है वो उसकी नहीं है और उसे उस चीज को वापस करना होगा और जब वो वह चीज वापस कर दे तो उसकी तारीफ करनी चाहिए एेसा करने पर बच्चे में सुधार होगा और यह सुधार डर के कारण नहीं होगा।

अपनी एक पोस्ट “सही निर्णय” में हमने चर्चा की थी कि क्यूं किसी इंसान के सभी निर्णय सही नहीं होते हैं। हमने पुष्टि की थी उस universal law की जिसके अनुसार किसी भी घटना के होने या न होने की probability कभी भी शून्य या एक नहीं होती। यही कारण है कि घटनाओं के सम्बन्ध में हमारे निर्णय भी हमेशा न तो सही और न ही हमेशा गलत होते हैं।
यह मानव का स्वभाव है कि अक्सर हम निर्णय लेते वक्त भावनाओं में बह जाते हैं। यह emotions क्रोध, दया, sympathy,पूर्वाग्रह या prejudice हो सकते हैं। एेसे में हमारे निर्णय के गलत होने की संभावना बढ़ जाती है। पर खुद को भावनाओं या emotions से मुक्त रखना बड़ा ही मुश्किल काम है। मानव मन है ही एेसा जो भावनाओं और संवेदनाओं से भरा हुआ है और भावनाओं पर नियंत्रण रखना नामुमकिन नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर है।
अंग्रेजी में एक कहावत है When you take decision put yourself in another shoe.यानी निर्णय लेते वक्त खुद को दूसरे के स्थान पर रखना चाहिए। बड़ी ही practical बात है दूसरे व्यक्ति की मनोदशा समझने का इससे अच्छा तरीका हो ही नहीं सकता। जब हम खुद को दूसरे के स्थान पर रखते हैं तो दूसरे व्यक्ति की मनोदशा के साथ हमें उन परिस्थितियों को भी समझने में मदद मिलती है जिसके प्रभाव में व्यक्ति वर्तमान में में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। फिर जब हम दूसरे व्यक्ति के बारे में निर्णय लेते हैं तो उसके सही होने की संभावना बढ़ जाती है। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि एेसा करने में या सोचने में हमें अपनी भावनाओं से मुक्त भी नहीं होना पड़ता है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि आपको को किसी की बात सुनकर गुस्सा आ गया है और बदले में आप भी क्रोध में आकर प्रतिक्रिया व्यक्त करने जा रहे हैं तो आपकी प्रतिक्रिया के सही होने की संभावना बढ़ जाएगी यदि आप खुद को सामने वाले के स्थान पर रखकर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।
यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता तो क्या होता, क्या हमारी दुनिया एेसी होती, क्या मैं और भी बेहतर होता, क्या जिदंगी और भी अच्छी होती… इन सभी के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है पर एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता तो आपके निर्णय बेहतर होते और आपको उन निर्णय निर्णयों पर अफसोस भी कम होता क्योंकि जब आप दूसरों के स्थान पर खुद को रखकर निर्णय लेते हैं तो दरअसल आप दूसरों के बारे में नहीं बल्कि खुद के बारे में निर्णय लेते हैं और आपके बारे में आपसे बेहतर कौन जानता है यही कारण है कि आपके निर्णय के सही होने की संभावना बढ़ जाती है…

HAD I BEEN IN YOUR PLACE




ये काम नहीं है आसान

जरूरत से ज्यादा काम भारतीयों को बेकार बना रहा है। मशहूर अर्थशास्त्री John Keens ने कभी कहा था भविष्य में लोगों के पास फुर्सत के काफी क्षण होगें पर लगता है कि भारत उनकी भविष्यवाणी को गलत साबित करने वाला देश बनने जा रहा है। काम और आराम में असंतुलन गंभीर खतरा बनता जा रहा है। ये तो सबको पता है कि भारत डायबिटीज, बी.पी सहित अनेक बीमारियों की Global capital बन गया है पर इस तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता कि इसकी एक बड़ी वजह काम का बढ़ता बोझ है।
भारत में एक कर्मचारी एक साल में लगभग 5200 घंटे और एक हफ्ते में लगभग 52 घंटे तक काम करता है जो दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। अभी हाल के दिनों में बैंक कर्मचारियों ने नोटबंदी के दौरान 12 से 18 घंटे प्रतिदिन काम किया और विश्व इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक घटना को सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया। बैंक के कुछ कर्मचारियों की इस दौरान काम के अत्यधिक दबाव के कारण जान भी चली गई।
दूसरा पहलू यह भी है कि आज नौकरी करने वाले 35% युवा डिप्रेशन से ग्रस्त हैं और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। भारत में औसत सैलरी मात्र 3168/-है जो कि विश्व में सबसे कम है। भारत में विश्व के सबसे ज्यादा बेरोजगार हैं प्रतिवर्ष नौकरी उत्पन्न करने के मामले में हम विश्व के पिछड़े देशों में शामिल है। हमारे देश में न्यूनतम और अधिकतम वेतन का अनुपात 1:2000 है जो विश्व में सर्वाधिक है। शिक्षा का स्तर यह है कि एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट को बैंक का बाबू बनने में भी पसीने छूट जाते हैं। हमारे यहां आरक्षण का यह हाल है कि किसी को 90 नंबर पाकर भी मौका नहीं मिलता और कोई 2 नंबर पाकर भी अफसर बन जाता है। पर हमारी सरकारें इन सबसे बेखबर वोट बैंक की राजनीति में लगी रहती हैं और हम हाथ पर हाथ रखकर अच्छे दिनों के आने के सपने देखते रहते हैं।

एेसे देश में नौकरी पाना ही अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। पर इतनी मुश्किल से नौकरी पाकर काम के बोझ से बीमार पड़ जाना और भी हैरान करता है। दरअसल इन सबकी जड़ में हमारे labour reforms हैं। यह एक एेसा क्षेत्र है जो सालों से उपेक्षित है। हमारे देश में RBI,SEBI, TRAI जैसी regulatory bodies हैं पर labour reforms के लिए कोई regulatory body नहीं है। हमारे manufacturing और Service industry को आज भी 1935 का payment of wages act, factories act 1956,और industrial dispute act 1947 govern कर रहे हैं जो वर्तमान की परिस्थितियों में बिलकुल भी प्रासंगिक नहीं हैं। इन obsolete हो चुके laws का सहारा लेकर इनमें दिये गये नियमों को आज की परिस्थितियों में अपने हिसाब से तोड़ मरोड़कर अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए कम्पनियाँ अपने Employees को exploit कर रही हैं। जरूरत से ज्यादा काम के बोझ के कारण काम और आराम में असंतुलन गंभीर होता जा रहा है और हमारी young workforce तेजी से बीमारियों की चपेट में आ रही है। वक्त है सरकार और हमारे लिए जागने का और वक्त है labour reforms का कहीं एेसा न हो कि जिस युवा शक्ति पर भारत आज नाज़ कराता है कल वही बीमार होकर उसके लिए बोझ न बन जाए….




परिवर्तन के नियम

परिवर्तन जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। यह अनवरत जारी रहने वाली प्रक्रिया है। परिवर्तन हमारे चाहने या न चाहने पर निर्भर नहीं होता ये तो बस होता रहता है। परिवर्तन मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं macro और micro जो परिवर्तन हमे और दूसरों को होते हुए दिखाई देते हैं जैसे उम्र के साथ होने वाले परिवर्तन, रहन सहन में होने वाले परिवर्तन, वेशभूषा में और खानपान में होने वाले परिवर्तन आदि को macro changes कहा जाता है वहीं जो परिवर्तन सूक्ष्म होते हैं जैसे विचारों में होने वाले परिवर्तन, व्यवहार में होने वाले परिवर्तन आदि को micro changes कहा जाता है। हम अक्सर macro changes को तो नोटिस करते हैं पर micro changes को नोटिस नहीं कर पाते हैं। जो सूक्ष्म है उसे देख पाना आसान नहीं होता..
जीवन में होने वाले परिवर्तन सकारात्मक भी होते हैं और नकारात्मक भी। जो परिवर्तन जीवन में अनुकूल परिस्थितियां लाते हैं उन्हें सकारात्मक और जो परिवर्तन प्रतिकूल परिस्थितियां लाते हैं उन्हें नकारात्मक परिवर्तन कहते हैं। हममे से ज्यादातर लोग परिवर्तन पसंद नहीं करते और इसके लिए तैयार भी नहीं होते हैं क्योंकि हमें हमेशा एक अज्ञात का डर होता है जिसे fear of unknown कहते हैं। कम ही लोग होते हैं जो इस डर को जीत पाते हैं जो इस डर के आगे बढ़ पाते हैं उन्हें परिवर्तन पसन्द होता है और एेसे लोग देश और दुनिया में परिवर्तन लाते हैं इन्हें change agents कहते हैं। परिवर्तन लाने में हमेशा विरोध का सामना करना पड़ता है कभी यह विरोध खुद के भीतर से तो कभी बाहर से होता है।
जीवन में होने वाले बड़े परिवर्तन अकस्मात होते हैं जिसके लिए हम तैयार नहीं होते हैं और जब ये परिवर्तन होते हैं तो अक्सर जीवन बदल जाता हैं। परिवर्तन में अवसर भी होता है और भय भी होता है जो इसमें अवसर देखते हैं वो आगे बढ़ जाते हैं और जो परिवर्तन से भयभीत हो जाता है वो वहीं रह जाता है जहां वो पहले था। विकास या development भी एक तरह का परिवर्तन ही होता है जिसे सकारात्मक या positive development कहा जा सकता है और जब यह परिवर्तन सतत या continuous होता है तो इसे ही समावेशी विकास या sustainable development कहते हैं।
क्या कोई भी development सम्पूर्ण या 100% हो सकता है? ब्रिटिश एयरवेज का sustainable process development प्रोग्राम की accuracy 99.96% पहुंच चुकी है जिसका मतलब यह हुआ हर 10000 उड़ान में से 40 उड़ान के दुर्घटनाग्रस्त होने की संभावना होती है। सोचिए हर बार जब उड़ान भरी जाती है तब कितने इन्सानों की जिंदगी दावं पर लगी होती है। पर यह संभावना कभी भी 100% नहीं हो सकती क्योंकि हर साल इसमें नये कारक या variables जुड़ जाते हैं जो पुराने कारकों से पूरी तरह भिन्न होते हैं। यह लगातार दौड़ी जाने वाली एेसी रेस है जिसकी कोई फिनिशिंग लाइन नहीं होती है। इसका मतलब यह भी है कि जीवन में कोई भी परिवर्तन स्थायी या पूर्ण नहीं होता यह लगातार चलने वाली अंतहीन प्रक्रिया है जिसका कोई अंत नहीं है। Management की भाषा में इसे ही TQM या Total Quality Management कहते हैं।






सही निर्णय

निर्णय लेने से कोई बच नहीं सकता। जब तक सांसें चलेगी फैसले लेने होंगे। निर्णय या डिसिजन जिदंगी के आधार हैं। हम आज जो भी हैं अपने बीते हुए कल में लिए गए फैसलों के कारण ही हैं। हम कल क्या होगें इसका फैसला हमारे आज के लिये हुए निर्णय करेंगे। निश्चित रूप से किसी के सभी निर्णय हमेशा न तो सही और न ही हमेशा गलत हो सकते हैं। हर इन्सान के जीवन में कुछ सही तो कुछ गलत निर्णय होते है। आपका कोई निर्णय सही होगा या गलत इसका निर्धारण सिर्फ और सिर्फ समय करता है। अक्सर हमें आज जो सही लगता है वो भविष्य में गलत साबित होता है और जो गलत लगता है वो ही सही साबित हो जाता है। जब निर्णय सही साबित हो जाता है तो तारीफ और जब गलत हो जाता है तो आलोचना के साथ गलत होने की जिम्मेदारी भी लेनी पड़ती है।
जब भी इन्सान कोई निर्णय लेता है तो वह यह सोच के नहीं लेता कि यह गलत साबित होगा। दरअसल निर्णय आज की परिस्थितियों में लिए जाते हैं जबकि कल की बदली हुई परिस्थितियां उन्हें सही या गलत साबित करती हैं। कल किसने देखा है? किसी ने नहीं पर इंसान की फितरत होती है अनुमान लगाने की और इसी आधार पर निर्णय लिए जाते हैं।आप कितनी सटीकता से भविष्य का अनुमान लगा सकते हैं यह आपकी दूरदर्शिता को निर्धारित करता है और आपकी दूरदर्शिता निर्धारित करती है आपके निर्णय के सफल या असफल होने की संभावना को। अनुमान तो कोई भी लगा सकता है पर अनुभव के साथ अनुमान लगाने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है उच्च पदों पर अनुभवी लोगों की नियुक्ति की जाती है जो कपंनी के लिए निर्णय लेते हैं। दूसरे शब्दों में आपकी कंपनी के CEO और आपमें बस इतना फर्क होता है कि वो आपकी तुलना में ज्यादा बेहतर अनुमान लगा सकते हैं।
अपनी जिंदगी में सारे निर्णय हम खुद नहीं ले सकते हमारी जिंदगी के कुछ निर्णय दूसरे भी लेते हैं और हम अक्सर अपनी जिंदगी में सफलताओं के लिए अपने निर्णयों को और असफलताओं के लिए दूसरों के निर्णयों को जिम्मेदार ठहराते हैं। इसे ही साइकॉलजी की Self prophecy theory कहते हैं। कुछ लोग जल्दी निर्णय लेते हैं तो कुछ लोग जल्दबाजी में निर्णय लेते हैं। कुछ लोग निर्णय लेने में बहुत वक्त लेते हैं तो कुछ को निर्णय लेना दुनिया का सबसे मुश्किल काम लगता है। कुछ निर्णय लेना आसान तो कुछ निर्णय लेने मुश्किल होते हैं। कुछ भी हो पर किसी के लिए सारे निर्णय न तो सही और न ही गलत हो सकते हैं।
दरअसल हम जो भी निर्णय लेते हैं वो भविष्य के अनुमान पर निर्भर होते हैं। हमारे अनुमान जितने सही होगें हमारे निर्णयों के सही होने की संभावना उतनी अधिक होगी। यह भी सही है कि अनुभव अनुमान को बेहतर बनाते हैं जिससे सफलता की संभावना बढ़ जाती है। पर फिर भी सब कुछ अनुमान और संभावना पर निर्भर करता है। प्रायिकता या Probability theory के अनुसार किसी भी घटना या event के होने या न होने की Probability न तो एक (one) और न ही शून्य (zero) हो सकती है। जिसका अर्थ यह हुआ कि किसी घटना के होने या न होने की संभावना को लेकर न तो पूरी तरह से आश्वस्त और न ही पूरी तरह से निराश हुआ जा सकता है। यही कारण है कि हमारे सारे निर्णय न तो हमेशा सही और न ही हमेशा गलत होते हैं। दरअसल अनुमान कभी भी absolute नहीं हो सकते। इसलिए किसी घटना के होने या न होने की संभावना हमेशा शून्य और एक के बीच होती है। यही कारण है कि हमारे कुछ निर्णय सही और कुछ गलत होते हैं। इसलिए जब लगे कि आपका या दूसरे का कोई निर्णय गलत साबित हुआ है तो इसका मतलब यह हुआ कि आपसे या दूसरों से महज अनुमान लगाने में चूक हुई है। अनुमान गलत होने का यह मतलब कतई नहीं कि आप अयोग्य या असफल हैं और हमेशा असफल होगें। अच्छा होगा कि घटनाओं से अनुभव लेकर अगली बार बेहतर अनुमान लगाइए क्या पता यही आपका सही निर्णय हो…



विचारों की फ्रीक्वेंसी

हम आज जो भी हैं अपनी आदतों की वजह से हैं। आदतें ही वो हैं जो हमें बनाती हैं और मिटाती हैं। वक्त के साथ आदतें भी बदलती रहती हैं नई आती हैं और पुरानी जाती हैं वहीं कुछ आदतें एेसी भी होती हैं जो ताउम्र नहीं बदलती हैं। जो आदतें कभी नहीं बदलती वो हमारे सब कॉन्शस या अचेतन मन का हिस्सा बन जाती हैं और हमारे चीजों को देखने के नजरिये को प्रभावित करती हैं। हमारा नजरिया और हमारी आदतें मिलकर हमारा स्वभाव बनाती हैं। हम देखते हैं कि एक परिस्थिति में दो अलग अलग स्वभाव के लोग अलग प्रतिक्रिया देते हैं इसका मतलब यह भी हुआ कि एक स्वभाव के लोग किसी एक परिस्थितियों में लगभग एक जैसी प्रतिक्रिया देगें। यही कारण है कि बड़ी कंपनियों में समय-समय पर अलग अलग बैकग्राउंड के लोगों के लिए एक जैसी ट्रेनिंग आयोजित की जाती है इसके पीछे उद्देश्य होता है कि एक जैसी विभिन्न परिस्थितियों के आने पर सभी कर्मचारी विभिन्न परिस्थितियों में लगभग एक जैसी प्रतिक्रिया दें। हमारा स्वभाव हमारी आदतों और हमारे नजरिए का मिश्रण होता है। आदतें नजरिए को प्रभावित करती हैं और आदतों को विचार प्रभावित करते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि विचारों को बदलकर आदतों को, आदतों को बदलकर नजरिए को और नजरिए को बदलकर स्वभाव को बदला जा सकता है। यही कारण है कि हमें विचारों को सकारात्मक रखने को कहा जाता है क्योंकि सकारात्मक विचार पाजिटिव और नकारात्मक विचार निगेटिव स्वभाव के निर्माण में पूरी तरह से सक्षम हैं।

दूसरे शब्दों में मनुष्य अपने विचारों को बदलकर अपना कायाकल्प कर सकता है। इसे ही बिहेवियर की cognitive resonance थ्योरी कहते हैं.. इसका सार यही है कि कोई किसी के विचारों की फ्रिक्वेंसी को पकड़ कर उसके जैसा बन सकता है या विचारों की फ्रिक्वेंसी को मैच कराकर विभिन्न परिस्थितियों में एक जैसी प्रतिक्रिया प्राप्त की जा सकती है..।



अन्तिम इच्छा

वो सोचता था कि बस ये मिल गया तो फिर कुछ नहीं मांगूगा। रात दिन उसी के सपने देखने लगा.. मेहनत करने लगा.. उसी के बारे में सोचने लगा। जिन्दगी ने इम्तिहान लिया.. कई बार लिया फिर वो सफल हो गया। उसे मिल गया था वह सब जिसके बारे में वो सोचता था। थोड़े दिनों बाद उसे लगने लगा कि उसे जो मिला है वो अधूरा है और लोगों की तुलना में कम है। उसने इस बार मेहनत कम की और चालाकी एवं होशियारी पर ज्यादा ध्यान दिया और अपनी अधूरी जिन्दगी को पूरा करने की कोशिश करने लगा। अब उसे ईश्वर पर कम और अपनी होशियारी पर ज्यादा भरोसा हो गया था.. दूसरों की नजर में उसमें आत्मविश्वास आ गया था। उसे इस बार संघर्ष कम करना पड़ा और काफ़ी हद तक वो अपने इरादों में सफल भी हुआ था। पर न जाने क्यों जिदंगी का अधूरापन दूर नहीं हुआ बार बार ध्यान उन चीजों की तरफ जाता था जो उसने हासिल नहीं की थी। उसकी बेचैनी बढ़ी तो उसने दिमाग दौड़ाया और अधूरे को पूरा करने का प्लान बनाया। इस बार उसने पूरा ध्यान होशियारी पर दिया.. उसे अब ईश्वर पर बस दिखावे के लिए भरोसा था.. अब उसकी नज़र में सब जायज़ था। दूसरों की नजर में अब उसमें अहंकार आ गया था। उसे इस बार जो मिला वो पहले से ज्यादा था। वह दुनिया की नजर में सफल हो गया था। थोड़े दिनों बाद उसे लगने लगा कि वह अभी भी सन्तुष्ट नहीं है..अपने शिखर पर पहुंच कर वो अकेला था.. उसकी नजर में होशियारी ही सर्वोपरि थी। वक्त के अपने नियम होते हैं जो किसी के लिए नहीं बदलते कुछ पलों के लिए लगता है कि जीवन और वक्त हमारे नियन्त्रण में है और हम जो चाहें वो कर सकते हैं और हमारी होशियारी हमें बचा लेगी.. पर वक्त के नियम नहीं बदलते। उसका भी वक्त बदल रहा था.. जिन्दगी के नियम लागू हो रहे थे.. पर बुद्धि को लाजिक नहीं समझ आ रहा था.. वक्त के नियम लाजिक के परे थे। बहुत मुश्किल था अहंकार के लिए वक्त के आगे झुकाना..उन रास्तों पर वापस लौटना जिन्हें वो पीछे छोड़ चुका था.. जब बेबसी ज्यादा बढ़ी तब उसने ईश्वर को पुकारा। अब उसे होशियारी पर कम और ईश्वर पर ज्यादा भरोसा था… अब वह वापस मुड़ गया था जिसकी दिशा केन्द्र की ओर थी…




वक्त


वक्त शायद दुनिया का सबसे ताकतवर शब्द है। वक्त ही वो ताकत है जिस पर किसी का जोर नहीं चलता। जब वक्त साथ हो तब इंसान को फर्श से अर्श पर और जब विपरीत हो तो अर्श से फर्श तक का सफर तय करने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। इसकी एक बड़ी खासियत है कि ये कभी एक जैसा नहीं रहता है और बदलता जरूर है। और जब बदलता है तब एेसा बदलता है कि इंसान की जिंदगी ही बदल जाती है। वक्त और कर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं वक्त के साथ कर्म और कर्म के साथ वक्त बदल जाता है। जो आज अकेले चल रहा है कल उसके साथ दुनिया चलेगी और जो जिसके कदमों में आज दुनिया है उसे शायद सुकून एकांत में मिलेगा। बड़ा मुश्किल है यह अनुमान लगाना कि वक्त का ऊंट किस करवट बैठेगा। पर जीवन की यही महान अनिश्चितता ही जीवन में रोमांच भरती है। वक्त कब बदलेगा किसी को नहीं पता अगर पता है तो बस अपने इरादे जो निश्चित रूप से वक्त को बदल देते हैं। कर्म करे बिना हम रह नहीं सकते बस कर्म करते रहना ही हमारे हाथ में है इसलिए जो हाथ में है उसे करते रहिये और अपने इरादे नेक रखिए क्या पता आपका वक्त कब बदल जाए… यही तो कहा था भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से जब वो खड़ा था असमंजस में बिल्कुल उसी तरह जैसे हम और आप आज खडे़ हैं…


तुलना

बिहेवियरल सांइस में एक थ्योरी है जिसे इक्विटी थ्योरी कहते हैं। इस के अनुसार व्यक्ति चार तरह से तुलना कराता है – खुद की खुद से, खुद की दूसरों से, दूसरों की खुद से, दूसरों की दूसरों से। इस तुलना में वो दो कारकों को इस्तेमाल करता है- आन्तरिक और वाह्य कारक। व्यक्ति अपनी सफलता के लिए आन्तरिक और असफलता के लिए वाह्य कारकों को जिम्मेदार मानता है। इन दो कारकों को इस्तेमाल करके वह एक सन्तुलन बना लेता है और उसी के अनुसार उसकी सोच बन जाती है। जब कभी यह सन्तुलन बिगड़ जाता है तब वह उत्तेजित, निराश या परेशान हो जाता है। उसकी परेशानी तब तक रहती है जब तक उसे सन्तुलन बनाने के लिए उचित कारक नहीं मिल जाता है। वह तलाश कराता है इन कारकों की बाहर और भीतर और चैन की तलाश में और बेचैन हो जाता है। उसकी तलाश पूरी होती है जब वह पूरी ईमानदारी से तलाशता है और जब इन्सान खुद के लिए ईमानदार हो जाता है तब उसे अपना अक्स साफ दिखने लगता है। फिर उसकी मुलाकात होती है खुद से और वो जान जाता है कि अपने दुखों का कारण और निवारण दोनों वह खुद है। इसे ही साइकॉलजी की भाषा में सेल्फ रिलाइजेशन कहते हैं…