ताकत बड़ी है या प्यार

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rencontres naturalistes 43 किसी से अपनी बात मनवाने के लिये हमारे पास प्रायः दो ही साधन उपलब्ध होते हैं। एक ताकत तथा दूसरा प्रेम।

http://thenovello.com/alfondie/elkos/4028 ताकत से किसी को अपने नियंत्रण में किया जा सकता है, उससे अपना आदेश मनवाया जा सकता है। किन्तु यह विजय अस्थायी है, इससे किसी के दिल पर अधिकार नहीं किया सकता है।

http://strom.com.br/mifer/2449 हारा हुआ इंसान तभी तक अपने को हारा हुआ समझता है जब तक वह कमजोर है और उसके पास ईंट का जवाब पत्थर से देने के साधन नहीं है।

Tastylia for sale वह अंदर ही अंदर ऐसे मौके की प्रतीक्षा में रहता है जब वह खुद बदला लेने में अपने को समर्थ समझ सके। और एक न एक दिन उसे ऐसा मौकी मिल ही जाता है।

opcje binarne darmowe sygnały प्रेम से मिलने वाली जीत स्थायी होती है। जीतने वाला जीत कर भी अपना दिल हारता है और हारने वाला हारकर भी दूसरे का दिल जीत लेता है। वे सदा के लिये एक-दूसरे के हो जाते हैं। एक के दिल पर दूसरे का अधिकार हो जाता है।

http://davisslater.com/ficeryw/6025 शक्तिशाली लोग ताकत का प्रयोग इसलिये करते हैं ताकि दूसरों की शक्ति को अपने काम में ला सकें। यह कार्य प्रेम से भी हो सकता है। राम से लकर गांधी तक इस बात के साक्षी हैं कि प्रेम का बन्धन तलवार के भय से बड़ा है।

यदि आप दूसरों को जीतना चाहते हैं, उनकी शक्ति को अपने उपयोग में लाना चाहते हैं तो प्रेम को अपनाइये यह तलवार की अपेक्षा सैंकड़ों गुनी शक्ति रखता है।

असली आत्मविश्वास वैसा नहीं है जैसा हम अक्सर सोचते हैं

1- असली आत्मविश्वास वह है, जब आप हमेशा अपने निर्णयों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं होते हैं।

2- असली आत्मविश्वास वह है, जब आपको खामोशियों से डर नहीं लगता है।

3- असली आत्मविश्वास वह है, जब आप तब मुस्कुराते हैं जब वास्तव में आप मुस्कुराना चाहते हैं।

4- असली आत्मविश्वास वह है, जब आप दूसरों के अहंकार को बनाए रखने के लिए उनकी चापलूसी नहीं करते हैं।

5- असली आत्मविश्वास वह है, जब आप गलत के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाने की हिम्मत रखते हैं।

6- असली आत्मविश्वास वह है, जब आप अपनी कमजोरी और गलतियों को स्वीकार करने से डरते नहीं हैं।

7- असली आत्मविश्वास वह है, जब आप दूसरों के बारे में अनुमान लगाना छोड़ देते हैं।

8- असली आत्मविश्वास वह है, जब आप कोशिश करके असफल हो जाने में संकोच नहीं करते हैं।

9- असली आत्मविश्वास वह है, जब आप खुद को स्वीकार कर स्वयं से प्यार करना शुरू कर देते हैं।

10- असली आत्मविश्वास वह है, जब आप जानते हैं कि आप कौन हैं और आप क्या पाना चाहते हैं।

अंत भला तो सब भला

1- किसी रिश्ते को खत्म करने का निर्णय लेने से पहले, यह सोचिये कि यह सब कैसे शुरू हुआ और क्यों शुरू हुआ?

2- कुछ समय लीजिए, विश्लेषण कीजिए और समझने की कोशिश कीजिये कि कहां क्या गलत हुआ और एक- दूसरे को कहानी के उस संस्करण के बारे में बताइये कि चूक कहां हुई ?

3- अनकही बातों को प्रकट होने दीजिये और मन को राहत पंहुचने दीजिये। अगर कहीं कुछ आपत्तिजनक था, तो उसके लिए क्षमा मांग लीजिये।

4- स्वीकार करिये कि यह बात यहीं खत्म होनी चाहिए और इसके प्रति आश्वस्त रहिये, अन्यथा आगे बढ़ना मुश्किल होगा।

5- यदि दोनों मे से कोई भी आगे बढ़ने को तैयार नहीं है, तो कृपया एक दूसरे की मदद कीजिए। जिंदगी भर नफरत की भावनाओं का बोझ उठाना सही नहीं है।

6- मैच्योर बनिये, और एेसे व्यवहार न करिये कि जैसे आपको परवाह नहीं है। एेसा व्यवहार दूसरों को निराश करता है।

7- बिना एक -दूसरे को चोट पहुंचाए चीजों को समाप्त कीजिए।

8- एक-दूसरे को माफ कीजिये, एक-दूसरे के लिए बेहतर की कामना करिये, अनुभव से सीखिये और आगे बढ़िये।

9- दूसरे व्यक्ति को अपने दिल में कुछ जगह जरूर दीजिये, अपने जीवन में नहीं।

10- चेहरे पर मुस्कान रखिये, दृढ़ रहिये, स्वयं से प्यार कीजिए, और दूसरों से जैसे वे हैं उसी रूप में उनसे प्यार कीजिये।

जिंदगी के कुछ अनछुए पहलू

हम सभी के व्यकतित्व के दो पहलू होते हैं। एक वह जो लोग हममें देखते हैं और दूसरा वह जिसे अक्सर लोग देख कर भी समझ नहीं पाते हैं।

अक्सर जब कोई व्यक्ति चुप हो जाता है तो लाखों चीजें उसके दिमाग में चल रही होती हैं।

कभी-कभी कोई व्यक्ति जो हमसे मीलों दूर होता है वह ही आपके दिल के सबसे करीब होता है।

जब कोई आपको समझता नहीं है तब संगीत ही आपका सबसे अच्छा दोस्त बन जाता है।

अक्सर जो लोग सबसे ज्यादा हंसते हैं, वे जिंदगी में सबसे अधिक दर्द अनुभव करते हैं।

कभी-कभी, आपको अपने डर छिपाने के लिए मुस्कुराना पड़ता है और अपने आंसुओं को छिपाने के लिए हंसना पड़ता है।

जिंदगी में चीजें किसी कारण से नहीं होती हैं, अक्सर वे आपको कुछ सिखाने के लिए होती हैं।

कुछ कहने से पहले जरूर सोचिए, आपके शब्द किसी की खुशियों को खत्म सकते हैं।

आँसू हमेशा दिल से आते हैं, दिमाग से नहीं।

कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितना प्रयास करते हैं। कुछ लोग आपकी भावनाओं को कभी नहीं समझ पाएंगे।

आपका एक गलत कदम और हर कोई आपको जज करने लगेगा।

गहरी नींद और उन्मुक्त हंसी किसी भी बीमारी के दो सबसे अच्छे इलाज हैं।

जीवन में आशा रखना सीखिये, कोई नहीं जानता है कि आगे क्या होगा? खुद में विश्वास कीजिए आपका सर्वश्रेष्ठ आना अभी बाकी है।

वो जो दुनिया बदलते हैं

हममें से अधिकांश लोगों को अपने अपने वर्तमान से बहुत शिकायतें होतीं हैं। हम अक्सर यह महसूस करते हैं और कहते हैं कि जीवन में चीजें यदि इस तरह से न होकर उस तरह होतीं तो बेहतर होता। हम परिवार, समाज, देश और दुनिया को बदलना चाहते हैं और हमें लगता है कि एेसा करने से हमारा वर्तमान और भविष्य पहले से अधिक सुरक्षित और सुखद होगा।

हम दुनिया को कैसे बदल सकते हैं? ठीक यही प्रश्न एक बार किसी ने सत्य की खोज में लगे एक महान दार्शनिक से पूछा था। इस प्रश्न के उत्तर में दार्शनिक ने जो कहा यदि उसके मर्म को हम सही तरीके से समझ सकें तो हमारी दुनिया बदलने की चाहत काफी हद तक पूरी हो सकती है।

दार्शनिक ने प्रश्न के उत्तर में अपने जीवन का अनुभव को साझा किया था और कहा था कि –

जब मैं जवान था, मैं दुनिया को बदलना चाहता था।

मुझे दुनिया को बदलना मुश्किल लगा, इसलिए मैंने अपने देश को बदलने की कोशिश की।

जब मैंने पाया कि मैं अपने देश को नहीं बदल सकता, तो मैंने अपने शहर को बदलने पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया।

यह सब सोचते हुए जिस तरह जब उम्र बढ़ने लगी, तो मुझे एहसास हुआ कि मैं अपना शहर नहीं बदल सकता और मैंने अपने परिवार पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया।

अब, जब मैं बूढ़ा आदमी बन चुका हूं, तब मुझे यह पता चला है कि केवल मैं अपने खुद के सिवा कुछ नहीं बदल सकता हूँ।

अब मुझे यह अचानक पता चलता है कि यदि बहुत पहले मैं खुद को बदल चुका होता, तो मैं अपने परिवार पर असर डाल सकता था।

मैं और मेरा परिवार मिलकर हमारे शहर पर असर डाल सकते थे। उनका प्रभाव देश को बदल सकता था और सब मिलकर वास्तव में दुनिया को बदल सकते थे ।

दरअसल किसी भी बदलाव की शुरुआत खुद से होती है। इतिहास गवाह है कि कोई भी बदलाव दुनिया में रातों रात नहीं हुआ है। कुछ लोगों ने अकेले चलने की पहल की और कारवां बनता गया।

जो लोग खुद को बदलने की हिम्मत रखते हैं वही दुनिया को बदलने का माद्दा भी रखते हैं। उस बदलाव को पहले आप स्वयं में लाइये जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं। यही बदलाव की फिलासफी है।

अपनी आलोचना को हैंडल करना सीखिए

1-कितना भी कड़वा क्यों न हो, लोगों को धैर्यपूर्वक सुनना सीखिये।

2-दूसरों द्वारा दिए गए सही लॉजिक को एकनालेज कीजिए।

3-अपनी गलतियों को स्वीकार करना सीखिये और उनसे सबक लीजिये।

4- आप लोगों के प्रति असम्मानजनक हुए बिना भी उनसे भिन्न विचार रख सकते हैं।

5- हर एक आलोचना को खुद से जोड़ कर मत देखिये।

6- याद रखिए कि हर किसी को यह पता नहीं है कि आपके लिए सर्वश्रेष्ठ क्या है।

7- इतिहास गवाह है कि अलोचना उसी की होती है जिसने कुछ बड़ा करने की कोशिश की है।

8- अपने मूल्यों से समझौता न करना और अपनी बात पर अड़ जाना, इन दोनों में फर्क होता है। इस अंतर को समझिये।

9- किसी व्यक्ति पर व्यक्तिगत आक्षेप और उसकी व्यक्तिगत आलोचना से बचने का हरसंभव प्रयास कीजिए।

10-किसी व्यक्ति की बात को समझने का अर्थ उससे सहमत होना नहीं है।

11- व्यक्तित्व के विकास के लिए कुछ मात्रा में आलोचना सहायक होती है।

12-लोगों को स्वस्थ आलोचना के लिए प्रोत्साहित कीजिए।

13- आलोचना को सकारात्मक रूप में लेने के लिए धैर्य और अभ्यास की आवश्यकता होती है।

सब की यही कहानी है

हमारा जीवन दुखों से भरा हुआ दिखाई देता है। दुखों से बचने और सुखी जीवन जीने के लिए हम कोशिश भी बहुत करते हैं पर यह निराशाजनक है कि इसमें सफलता गिने-चुने लोगों को ही मिल पाती है शेष लोगों की झोली खाली ही रह जाती है। लोग भटकते हैं सुख के लिए और मिलता है दुःख। हर इंसान की यही कहानी है।

खुशियों की तालाश में भटकते हुए हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि दुख कहीं बाहर से नहीं आता है। हम चाहे जितना भी दुखों के कारण को कहीं बाहर ढूढं लें किसी इंसान में, किसी घटना में, किसी परिस्थिति में चाहे जितना तलाश लें पर हाथ कुछ ठोस नहीं आएगा। बाहर ढूंढने पर कारण तो पर्याप्त मिल सकते हैं पर समाधान नहीं मिलता है। समाधान परिस्थितियां बदलने से नहीं बल्कि मनःस्थिति बदलने से मिलता है।

दुखों से छुटकारा पाने के लिए सबसे पहले हमें जिम्मेदारी लेना सीखना होगा। एेसा इसलिए क्योंकि जब हम स्वयं की जिम्मेदारी लेते हैं तब हम जैसे भी हैं खुद को पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं। सुख मिले या दुख, सम्मान मिले या अपमान सबको समान रूप से स्वीकार करने के लिए हमें अपनी परिस्थिति की जिम्मेदारी स्वयं लेनी होगी जब हम स्वयं की जिम्मेदारी ले लेते हैं तब हमारी मुश्किल परिस्थितियों से लड़ने की ताकत भी बढ़ जाती है।

दूसरों पर जिम्मेदारी थोपने वाले, अपनी परिस्थितियों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते रहने से हम कभी स्वयं को बदलने की शुरुआत नहीं कर पाते हैं।

जो स्वयं की जिम्मेदारी लेना जानते हैं, जो दुख के कारणों की तालाश बाहर नहीं भीतर करते हैं और परिस्थितियों को नहीं बल्कि मनःस्थिति को बदलने की कोशिश करते हैं परिवर्तन उन्हीं के जीवन में घटित होता है। नजरिया बदलते ही जीवन समाधान स्वयं प्रस्तुत कर दिया करता है।

खुद को गुमराह मत कीजिए

हममें से कुछ लोग समस्याओं से मुक्त भविष्य की चाह रखते हैं। एेसे लोग अपने जीवन में आने वाली हर परेशानी एवं बाधाओं को अंतिम मानकर उनसे पूरी शिद्दत के साथ जूझते हैं और जल्दी से जल्दी सभी समस्याओं से मुक्त होकर जीना चाहते हैं। समस्याओं से संघर्ष करने का यह आशावादी नजरिया है। इस दृष्टिकोण के चलते इंसान न तो जल्दी थकता है और न ही हार मानता है।

दूसरी तरफ एेसे लोगों की भी कमी नहीं है जो यह मानते हैं कि जब तक जीवन है तब तक समस्याएं एवं संघर्ष भी हैं। इस नजरिये के अनुसार यह मानना ही पूरी तरह से अव्यावहारिक है कि इंसान का जीवन एक दिन समस्याओं से मुक्त हो जाएगा।

परेशानियों से जूझते हुए मन में यह विचार आना स्वाभाविक ही है कि वर्तमान समस्या ही आखिरी है और उसके बाद जीवन पूरी तरह से समस्या रहित हो जाएगा। एेसी बातें हमारा हौसला तो बढ़ाती हैं लेकिन एक बाद एक आने वाली समस्याएं हमारे मनोबल को कमजोर भी करती रहती हैं।

दरअसल यह सारा खेल हमारी समझ का है जब जिंदगी में यह मानकर चलते हैं कि जीवन में एक समय ऐसा भी आएगा जो पूरी तरह से समस्याओं से मुक्त होगा तो फिर यह दिल को बहलाने जैसा है। हमें यह समझना चाहिए कि एेसी बातें जिदंगी में हमारे हौसला बनाए रखने का तरीका भर हैं और अंतिम सत्य नहीं हैं।

हमें यह समझना चाहिए कि जीवन के संघर्ष और समस्याएं कभी स्थायी रूप से समाप्त नहीं होती हैं बस समय के साथ उनका स्वरूप बदलता रहता है। समस्याओं के आने और जाने का खेल जीवन पर्यन्त चलता रहता है। हमें तो बस समस्याओं से जूझते रहने की अपनी इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए।

जब हम किसी भी तरह की समस्या से जूझने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर लेते हैं तब समस्या के आने पर हमें झटका नहीं लगता है और समस्या का सामना हम बेहतर आत्मविश्वास के साथ कर पाते हैं। जिन्दगी में आने वाली कुछ समस्याएं तो हमारे आत्मविश्वास को देखकर ही उल्टे पांव लौट जाती हैं ठीक वैसे ही जैसे चौकीदार को मुस्तैद देखकर चोर उस घर में घुसने की हिमाकत नहीं करता है।

कुछ बातें जिन्हें जान लेना अच्छा है

आनंद सुख एवं दुख से परे मन की एक अलग अवस्था है। सुख और दुख दोनों में एक समान बात यह है कि दोनों में ही उत्तेजना की प्रधानता होती है। हम स्वयं को अच्छी लगने वाली उत्तेजना का सुख एवं अप्रिय लगने वाली उत्तेजना का दुख के रूप में अनुभव करते हैं।

सुख चाहने वाला दुख में निरंतर पड़ता रहता है क्योंकि एक उत्तेजना के बाद दूसरी विपरीत उत्तेजना का आना वैसे ही अनिवार्य है जैसे दिन के बाद रात का और रात के बाद दिन का आना सुनिश्चित होता है। आनंद इन दोनों प्रकार की उत्तेजनाओं से पूरी तरह से भिन्न है, यह उत्तेजना की नहीं बल्कि आनंद की अवस्था है।

जीवन सब जीते हैं पर कितने लोग इसके प्रति सजग और सतर्क होते हैं? अधिकांश लोग जीवन में अपने उद्देश्य से अपरिचित होते हैं और लगभग बेहोशी में जीते चले जाते हैं। हममें से ज्यादातर लोगों के पास आत्मबल का आभाव होता है जिसके कारण समस्याओं को देखकर हम घबराते हैं और उनका सामना करने के बजाय हम उनसे भागते हैं या फिर बचने के उपाय में लग जाते हैं।

जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग ही जीवन का महामंत्र है। जीवन का सदुपयोग भी तभी संभव है जब जीवन के प्रति दृष्टिकोण सकारात्मक हो और सकारात्मक विचारों के क्रियान्वयन के लिए प्रबल पुरूषार्थ किया जाए। सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करके दूसरों को आकर्षित तो किया जा सकता है पर स्वयं खुद को समझाने के लिए यह पर्याप्त नहीं होती हैं।

किसी भी बात या सिद्धांत की सार्थकता उसकी व्यावहारिक अनुभूति में ही है। जब तक किसी बात को अपने जीवन में उतारकर उसके अच्छे-बुरे अहसास से गुजर नहीं लिया जाता है तब तक उसकी सार्थकता सिद्ध नहीं होती है। सिद्धांतों के साथ उसकी अनुभूति का होना जरूरी है। यह सही है कि अच्छी बातों की श्रेष्ठता में कोई संदेह नहीं होता है पर अच्छे कर्मों को उनसे भी श्रेष्ठ माना जाता है।

उम्मीदें कुछ बाकी हैं….

समय की बर्बादी का अर्थ है अपने जीवन को बर्बाद कर लेना। जीवन के जो पल यों ही आलस्य अथवा उन्माद में खो जाते हैं वो फिर कभी वापस लौटकर नहीं आते हैं। जिंदगी में सभी के पास समय सीमित है। जीवन के प्याले से समय की जितनी बूंदें छलक जाती हैं, प्याला उतना ही खाली रह जाता है। प्याले की वह रिक्तता फिर किसी भी तरह से भरी नहीं जा सकती है।

जीवन में हर एक पल एक नई संभावना को लेकर आता है। हर घड़ी एक बड़े बदलाव का समय हो सकती है। हमें यह पता नहीं होता है कि समय के जिस क्षण को हम व्यर्थ में खो रहे हैं वह पल ही हमारे भाग्य को बदलने वाला साबित हो सकता है।

कहते हैं कि समय की चूक ही पश्चाताप की हूक बन जाती है। जीवन में कुछ करने की इच्छा रखते हैं तो फिर भूल कर भी अपने किसी कार्य को, जो आज किया जाना चाहिए, कल पर मत टालिए। यह समझना आवश्यक है कि आज के काम के लिए आज का ही दिन निश्चित है और कल के कामों के लिए कल का दिन निर्धारित है।

गलतियां करना उतना बुरा नहीं है जितना कि गलतियों से सबक न लेकर उन्हें बार – बार दोहराते रहना है। गिनती गिनने में चूक हो जाने पर दोबारा नये सिरे से गिनना आरंभ करने में किसी समझदार को संकोच नहीं करना चाहिए। भूल समझ में आने पर उल्टे पैर लौट आने में भी कोई बुराई नहीं है।

यह सत्य है जो समय को नष्ट करते हैं, समय भी उनको नष्ट कर देता है परंतु यह भी सही है कि जो अपनी गलतियों से सबक लेकर आगे बढ़ने का साहस करते हैं उन्हें जिंदगी भूल सुधारने का एक दूसरा मौका जरूर देती है। आप की कोशिशें यदि सच्ची और सही हैं तो देर से ही सही पर यह दुनिया आपको रास्ता अवश्य देगी।