वो दर्द भी अच्छा है

एक प्रसिद्ध कहावत है कि जीवन में आपको सबसे ज्यादा प्यार वो करता है जिसे जिंदगी में सबसे ज्यादा चोट लगी होती है। वे लोग शायद आप के साथ दूसरों की तुलना में बेहतर व्यवहार करेंगे यदि उन्होंने पूर्व में चोट खायी है।

ऐसा क्यों होता है? दरअसल जिन लोगों के अपने दिल कभी टूट चुके हों, अक्सर उन्हें पता होता है कि टूटे हुए टुकड़ों को कैसे जोड़ा जा सकता है। यही कारण है कि दूसरों से व्यवहार करते समय एेसे लोग भावनात्मक रूप से कटौती नहीं करते हैं।

यह संभव है कि कुछ अच्छे लोग निराशावादी होते हों लेकिन समय के साथ, वे आम तौर पर सीखते हैं कि कठिन रास्तों पर चलते हुए सकारात्मक कैसे बनें?

अच्छे लोग कभी नहीं चाहते हैं कि दूसरों को भी वो चोट लगे जिस तरह की चोट उन्हें लगी हैं।

एेसा हो सकता है कि अच्छे लोगों को को उनकी शारीरिक बनावट,रंग-रूप या फिर शारीरिक अक्षमता के लिए परेशान किया जाता हो, फिर भी समय के साथ वे लोगों को माफ करके आगे बढ़ जाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि यह पीड़ा महसूस करने की तरह है, वे कभी भी किसी और को ऐसा ही दर्द नहीं होने देना चाहते हैं।

दूसरों को परेशान करने के बजाय, अच्छे लोग असंवेदनशीलता की चक्रीय प्रकृति को तोड़ते हैं। वे प्रशंसा और प्रोत्साहन के शब्द कहते हैं। वे चाहते हैं कि दूसरों को उनकी बदसूरती और चोटों को दिखाने के बजाय उनमें गुणों की सुंदरता और आत्मविश्वास महसूस हो। वे पहले से ही जानते हैं कि यह सब सहना कैसा है, और वे अपने सबसे खराब दुश्मनों पर भी इसका प्रयोग नहीं करना चाहते हैं।

अच्छे लोग बचे रहना पसंद करते हैं जो दूसरों को भी बचे रहने में सहायता करते हैं। एेसे लोग किसी भी परिस्थिति में और किसी भी स्थिति से अपना रास्ता निकाल सकते हैं। उनकी चोटों के निशान सबूत हैं कि वे पहले भी एेसी पीड़ा से गुजर चुके हैं।

जीवन की दौड़ में, अधिकांश लोग आमतौर पर केवल खुद पर ध्यान देते हैं लेकिन कुछ लोग हैं जो इस तरह के संघर्षों से गुजर चुके हैं, ये लोगों के जख्मों को सहलाते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं और अपने साथ चलने के लिए दूसरों को प्रेरित करते हैं।

एेसे लोग मदद करने वाले हाथ बन जाते हैं जैसा कि वे कभी खुद के लिए चाहते थे। शायद जीना इसी का नाम है।

जीवन में मैच्योरिटी का क्या मतलब है

जिन्दगी में मैच्योर होने के लोगों की समझ के अनुसार बहुत से मतलब हो सकते हैं। मेरी समझ में किसी भी इंसान को मैच्योर या परिपक्व होने के लिए बहुत कड़ी मेहनत करनी होती है। मेहनती होना हमारे जीवन के लिए भोजन की तरह ही एक आवश्यकता है, क्योंकि भोजन के बिना आप अस्वस्थ हो सकते हैं और कभी-कभी बीमार होने से मौत भी हो सकती है। एक कहावत है कि जो तुम्हें मार नहीं सकता वह आपको मजबूत बनाता है।

मुझे लगता है कि मैच्योरिटी का मतलब अपने सभी कार्यों की ज़िम्मेदारी स्वयं लेना है।अपनी तारीफों और विफलताओं को समान रूप से स्वीकार करना और अपनी कमियों को नजरांदाज नहीं करते हुए भविष्य की रूपरेखा बनाना ही परिपक्वता है। यही वह कुछ चीजें हैं जहां हमें सबसे ज्यादा मेहनत करनी होती है।

मैच्योरिटी का मतलब खुद को नियंत्रित करना भी है। खुद पर नियंत्रण रखने से मेरा आश्य है कि आप अपने फैसले खुद लेने की योग्यता रखते हों, अपने हितों के आधार पर जहां पर जरूरी हो आपको यह मालूम होना चाहिए कि कहां हां और कहां ना कहना है वह भी किसी झगड़े के बिना मेरी समझ से यही आत्म नियंत्रण है । यदि आप यह जानने की क्षमता रखते है कि कब आपको कब रूकना है और कब काम करना है तो यह आत्म नियंत्रण है। यहां तक कि अगर किसी समय आपको महसूस हो कि आपको रूक जाना चाहिये है कि तो आपका आत्म नियंत्रण ही आपको बताता है कि एेसा करना उस पल में आपके लिए सर्वश्रेष्ठ होगा या नहीं।

परिपक्वता बुराई में अच्छाई ढूढ़ना भी है। यदि आपके पिता आपको कुछ करने के लिए कहते हैं और आपको अपने लिए वह उचित नहीं लगता है तो परिपक्वता सम्मान के साथ मना कर देने में है। परिपक्व होना आपको शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाता है, आप लगातार अपने आप को बेहतर बनाते और विकसित करते हैं और भविष्य की चुनौतियां से निपटने में आपको आसानी होती है।

समय सब घावों को भर देता है

समय सब घावों को भर देता है एक प्रचलित कहावत है पर यह पूरी तरह से सही नहीं है। समय आप के लिए कुछ नहीं करता यदि आप समय का सही तरह से उपयोग नहीं करते हैं। समय आपके घावों को भरता है लेकिन यह आगे बढ़ने के लिए मुख्य प्रेरणा नहीं है? चोट खाने के बाद जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए कोशिश आपको स्वयं करनी पड़ती है।

वक्त के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा एेसा सोचना पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि समय हमारा नहीं बल्कि हम समय के ऋणी हैं। हर दिन आप निर्णय लेते हैं कि अपने मूल्यवान समय का उपयोग कैसे करेंगे। जब हम समय के उपयोग की बात करते हैं तब निश्चित रूप से हाथ पर हाथ रखकर बैठना और चीजों के ठीक होने का इंतजार करना इसमें शामिल नहीं होता बल्कि आप चीजों को ठीक करने के लिए आप स्वयं पहल करते हैं।

घड़ी की टिक-टिक को देखने से आपका कुछ भला नहीं होगा ,अपने हुए नुकसान की भरपाई करने का यह सबसे कम प्रभावी तरीका है।बिना किसी कड़ी मेहनत के सिर्फ इंतजार करने से कुछ हासिल नहीं होता है।

समय सभी घावों को ठीक कर देगा एेसी सोच हमारे चारों तरफ ऐसा विषाक्त चक्र बनाती है जो आपको सिर्फ गोल-गोल घुमाती है पहुंचाती कहीं नहीं है। अपने आप को शोक करने का समय देने और खुद को बहुत अधिक समय देने के बीच एक बड़ा अंतर होता है। जब आप खुद को किसी दुख से उबारने के लिए असीमित समय दे देते हैं तो फिर एक अंतराल के बाद आपको पछताना पड़ सकता है।

जब आप अपनी खुशी और अपने घावों की ज़िम्मेदारी समय पर छोड़ देते हैं, तो आप बहुत कुछ खो देते हैं क्योंकि समय का उद्देश्य दर्द, यादें या लोगों को मिटाना नहीं है बल्कि समय का उद्देश्य नए परिप्रेक्ष्य ,नए लोगों, नए अवसरों और नए अनुभव सीखने में है।

समय और भावनाओं पर नियंत्रण होना चाहिए पर उन्हें लंबे अंतराल तक रोकना नहीं चाहिये। आपको अपने समय के महत्व को समझना चाहिये और उसके सर्वोत्तम उपयोग का प्रयास करना चाहिये । खुद को मिले हुए समय को नियंत्रित करने का प्रयास कीजिये विश्वास कीजिए,एेसा करके भविष्य में आप अपने आप को बहुत ज्यादा अनावश्यक मिलने वाले दर्द से बचा लेंगे।

दिल ने मांगी है दुआ

जब जीवन में घना अंधेरा होता है और कोई राह नहीं सूझती है तब प्रार्थना से फूटती है प्रकाश की किरण जो डूबते को तिनके का सहारा साबित होकर हमारे टूटे हुए आत्मविश्वास को धीरे-धीरे फिर से जोड़ने का काम करती है।

प्रार्थना हमारी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होती है। शोध से पता चला है कि सर्जरी के बाद होने वाले घावों के भरने में प्रार्थना मरहम का काम करती है। यह हमारे दिल को मजबूत बनाकर हमारी धड़कनों को सामान्य करती है। प्रार्थना करने से हमारा इम्यूनिटी सिस्टम बेहतर होता है।

प्रार्थना करने से न केवल हमारी एकाग्रता बढ़ती है बल्कि इससे हमें अपने मन में झांकने का मौका मिलता है। इससे हममें सही-गलत में फर्क करने की समझ बढ़ती है और बेचैनी से निजात मिलती है। एक शोध से पता चला है कि जो लोग नियमित रूप से प्रार्थना करते हैं उनमें अवसाद की समस्या कम होती है और वे दूसरों की तुलना में अपनी भावनाओं को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर पाते हैं।

प्रार्थना इंसान द्वारा उत्पन्न की जाने वाली ऊर्जा का सबसे सशक्त रूप है। दिल से निकली हुई प्रार्थना कभी निरर्थक नहीं जाती है। विज्ञान भी प्रार्थना की ताकत को मानता है और जिदंगी के अनेक अवसरों पर यह साबित भी हुआ है कि इंसान को दवा के साथ-साथ दुआ की भी जरूरत होती है

जरूरी नहीं है कि प्रार्थना अपने लिए ही की जाए, हम प्रार्थना दूसरों के लिए भी कर सकते हैं। कहते हैं कि दूसरों के लिए की गई दुआ जल्दी कुबूल होती है। प्रार्थना हमें यह अहसास दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं, कहीं कोई है जो हमारा बोझ उठाने में हमारी मदद कर रहा है।

हम जीवन में असफल क्यों होते हैं

जीवन वास्तव में एक परीक्षा है, लेकिन स्कूल की परीक्षा के विपरीत, आपको खुद को सबक निकालना पड़ता है, जहां आपको परीक्षा देने के पहले सीखने के लिए मौका मिलता है। जिंदगी की परीक्षा में कोई भी हमेशा पास या हमेशा फेल नहीं होता है। वास्तव में यह हमारे द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों का संग्रह है कुछ निर्णय आपको अस्थायी रूप से सहज बनाते हैं और कुछ नहीं।
हम जिंदगी में असफल क्यों होते हैं इसके पीछे बहुत से कारण हो सकते हैं पर मेरी समझ से जीवन की परीक्षा में असफल रहने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं-
1-जिंदगी में हम असफल इसलिए होते हैं क्योंकि किसी भी वजह से हम अपनी क्षमता को पूरी तरह से उपयोग नहीं कर पाते हैं।
2- हम जीवन में मिलने वाले अंसख्य अनुभवों और मौकों का भरपूर उपयोग नहीं कर पाते हैं।
3-हम जिंदगी में स्पष्ट लक्ष्यों को निर्धारित नहीं करते हैं और न ही उन चीजों को हासिल करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं।
4-हम स्वयं को बेहतर बनाने के लिए हमारे चारों तरफ के वातावरण में उपलब्ध संसाधनों,रणनीतियों और युक्तियों का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाते हैं।
5-हम जो भी सोचते हैं और करते हैं उसकी पूरी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही लेने की बजाय हम लोगों को दोष देनें में और जिम्मेदार ठहराने में अधिक विश्वास रखते हैं।
6-हम इसलिए भी असफल हो जाते हैं क्योंकि अक्सर हम अपनी असफलताओं से जरूरी सबक सीख नहीं पाते हैं, और एेसा इसलिए होता है क्योंकि हम इस सबक को सीखने के लिए पर्याप्त सतर्क नहीं रहते हैं।
7- हम असफल इसलिए भी होते हैं क्योंकि हम हमेशा बीते हुए कल में जीते हैं। जब हम हमेशा सोच रहे होते हैं तो अतीत हमारा भविष्य बन जाता है और हम वास्तव में कुछ नया नहीं कर पाते हैं।
8- हम अक्सर असफल इसलिए होते हैं क्योंकि हमारा सारा ध्यान गलतियां करने से बचने पर होता है। हमें जीवन में क्या करना चाहिए यह सोचने की बजाय हमें क्या नहीं करना चाहिए यह हम अधिक सोचते हैं।

जिंदगी ने जो सिखाया है

1-अपने बच्चों को अमीर होने के लिए शिक्षित मत कीजिए,उन्हें खुश रहने के लिए शिक्षित करिये। ताकि जब वे बड़े हों तब वे चीजों का मूल्य समझेेकीमत नहीं।
2-अपने खाने को दवाइयों के की तरह खाइये अन्यथा आपको दवाएं अपने भोजन की तरह खानी होंगी।
3-जो आपको प्यार करता है वह आपको कभी नहीं छोड़ेगा क्योंकि भले ही आपको छोड़ेने के उसके पास 100 कारण हों पर वह आपके पास रूके रहने के एक कारण को ढूढ़ लेगा।
4- इंसान होना और इंसानियत का होना इसमें बहुत फर्क होता है,बहुत कम लोग ही इस अंतर को समझ पाते हैं।
5- जब आप पैदा होते हैं आपको प्यार किया जाता है,आपको प्यार मिलेगा जब आप मरेंगे। इन दोनों के बीच के अंतराल में आपकों मैनेज करना होता है।
6- यदि आप तेज़ चलना चाहते हैं तो अकेले चलिये पर अगर आप दूर तक चलना चाहते हैं तो साथ में चलिए।
7-यदि आप चाँद देखते हैं तब आप ईश्वर की सुंदरता देख रहे हैं। अगर आप सूर्य देख रहे हैं तब आप ईश्वर की शक्ति देख रहे हैं। और जब आप दर्पण देखते हैं तब आप ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ निर्माण देखते हैं।
8- हम सभी पर्यटक हैं और ईश्वर हमारा ट्रैवल एजेंट, जिसने पहले से ही हमारे सभी रास्ते,आरक्षण और मंजिलें तय कर दी हैं।


हम दूसरों से तुलना क्यों करते हैं

बिहेवियरल सांइस में एक थ्योरी है जिसे इक्विटी थ्योरी कहते हैं। इस के अनुसार व्यक्ति चार तरह से तुलना कराता है – खुद की खुद से, खुद की दूसरों से, दूसरों की खुद से, और दूसरों की दूसरों से। इस तुलना में वो दो कारकों को इस्तेमाल करता है- आन्तरिक और वाह्य कारक। व्यक्ति अपनी सफलता के लिए आन्तरिक और असफलता के लिए वाह्य कारकों को जिम्मेदार मानता है। इन दो कारकों को इस्तेमाल करके वह एक सन्तुलन बना लेता है और उसी के अनुसार उसकी सोच बन जाती है।

आज जाऊं या नहीं जाऊं.लोग क्या सोचेंगे.कल उनका सामना कैसे करूंगा.झूठ बोला नहीं जाता.सच परेशान होता है.असमंजस,दोहरा रास्ता,संकोच.शायद हम सभी एेसे ही जीते हैं. यह ङर है.नकारे जाने का ङर,अपमानित होने का ङर,असफल हो जाने का ङर,अज्ञात का डर आदि .कैसे सामना करें? क्या फैसला करें? सही फैसला क्या होता है? यहाँ विरोधाभास है,सही को गलत और गलत को सही बताने और उसकी व्याख्या करने के सबके अपने नजरिये हैं.

जब कभी यह सन्तुलन बिगड़ जाता है तब वह उत्तेजित, निराश या परेशान हो जाता है। उसकी परेशानी तब तक रहती है जब तक उसे सन्तुलन बनाने के लिए उचित कारक नहीं मिल जाता है। वह तलाश कराता है इन कारकों की बाहर और भीतर और चैन की तलाश में और बेचैन हो जाता है। उसकी तलाश पूरी होती है जब वह पूरी ईमानदारी से तलाशता है

दिन में रात की तलाश. रात में सुबह की तलाश. साथ में अकेलेपन की और अकेलेपन में साथ की तलाश. यही सिलसिला चलता रहता है और हम सब गोल गोल घूमता रहते हैं. हम रोज सफर पर जाते हैं पर शाम को खुद को वहीं पाते हैं. हम रास्ते बदलते हैं, साथ बदलते हैं, मँजिल बदलते हैं,पर हम खुद को नहीं बदलते हैं. हम कभी किस्मत को तो कभी खुद को दोषी ठहराते हैं .बेचैनी बढ़ती जाती है और हम ढूंढते रहते हैं . हम जितना ढूंढते जाते हैं उतना ही खोते जाते हैं .

जितना गहराई में जाओगे खुद को उतना अकेला पाओगे.आज जो भी फैसला लोगे वो न तो सही और न ही गलत होगा.सब मन का खेल है.निश्चिंत होकर खेलो क्योंकि खेल चलता रहता है और खिलाड़ी बदल जाते हैं.जब इन्सान खुद के लिए ईमानदार हो जाता है तब उसे अपना अक्स साफ दिखने लगता है। फिर उसकी मुलाकात होती है खुद से और वो जान जाता है कि अपने दुखों का कारण और निवारण दोनों वह खुद है। इसे ही साइकॉलजी की भाषा में सेल्फ रिलाइजेशन कहते हैं.मैं भी कुछ ढूंढ रहा हूँ पर किसी ने बताया है ये रास्ता मेरे अंदर से हो कर जाता है.

अगर आप सफल होना चाहते हैं

1- अपना 10% समय समस्याओं के बारे में सोचने में और शेष 90% समय उन्हें सुलझाने में लगाइये।

2- अपने लक्ष्यों के प्रति अडिग रहिये पर अपनी सोच और एप्रोच को हमेशा उदार एवं लचीला बनाए रखिये।

3- महत्वपूर्ण और जरूरी के बीच फर्क कीजिए, जीवन में प्राथमिकता हमेशा उन लोगों और कामों को दीजिये जो आपके लिए महत्वपूर्ण हैं न कि उन लोगों और कामों को जो सिर्फ आपके लिए जरूरी हैं।

4- हममें से बहुत कम लोग जिदंगी में वह प्राप्त कर पाते हैं जो वो चाहते हैं क्योंकि मंजिल की तालाश में हम अक्सर भटक जाते हैं और अपना ध्यान लक्ष्यों और अपनी खूबियों पर केंद्रित नहीं कर पाते हैं।

5- वह नहीं जो हम कभी-कभी करते हैं बल्कि वह जो हम नियमित रूप से करते हैं वह हमारी आदतों का निर्माण करता है और हमारी आदतें निश्चित रूप से हमारे भविष्य को बदल देती हैं।

6 जैसा हम सोचते हैं वैसा हम करते हैं और जैसा हम करते हैं वैसे हम बन जाते हैं।

7- यदि आप अपनी सोच नहीं बदलते हैं तो आपको बार-बार आपको वही परिणाम प्राप्त होते हैं जैसे अब तक मिलते रहे हैं। यदि आप मिलने वाले परिणामों को बदलना चाहते हैं तो पहले अपनी सोच बदलिये।

8- दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, आप स्वयं अपने बारे में क्या सोचते हैं यही सबसे महत्वपूर्ण है।

9- जिदंगी के सफर में एेसे लोग भी मिलते हैं जिनके साथ हमारा अनुभव अच्छा नहीं होता है पर यही लोग हमें जीवन के सबसे मुश्किल सबक सिखाकर हमें पहले से मजबूत बना जाते हैं।