कुछ गलतियों को माफी नहीं मिलती है

कभी-कभी हम जल्दबाजी में आकर ऐसी प्रतिक्रिया दे देते हैं जो बाद में जाकर हमें दुःख देती है। कई बार हम दूसरों की पूरी बात को सुने बिना ही अपनी प्रतिक्रिया दे देते हैं। हम दूसरों में खोट, कमियां और बेईमानी के लक्षण ढूँढते रहते हैं पर स्वयं की गलतियाँ मानने में हमारा अहंकार हमें रोकता है।

एक बड़े बिजनेसमैन ने अपने युवा पुत्र से यह वायदा किया था कि अगर वह अच्छे नंबरों से पास हो जाता है और अपने बल पर नौकरी प्राप्त कर लेता है तब उसे वो कार जरूर लेकर देंगे। उस लड़के ने काफी दिनों से एक विशेष मॉडल की कार के सपने देखे थे और वह चाहता था कि पिता वही कार उसे दें।

अच्छे नंबरों से पास होने के बाद उस युवा की अच्छी कंपनी में नौकरी लगती है।पास होने के बाद एक दिन पिता ने पुत्र को बुलाया। पुत्र समझ गया था कि आज उसे निश्चित रूप से कार मिलेगी। उसने अपने सभी साथियों से पहले ही कह दिया था कि सभी कार से लांग ड्राइव पर चलेंगे। वह पिता से मिलने जाता है। पिता उसे शाबासी देते हैं, साथ ही एक किताब बाक्स में रखकर देते हैं और कहते हैं कि बेटा तुम पास हो गए हो और अब आगे की जिंदगी कठिनाईयों से भरी होगी इस कारण तुम इस किताब को जरूर पढ़ना।

कार के सपनों में खोया वह युवा किताब की बात सुनकर ही भड़क जाता है और उस बाक्स को वहीं फेंक देता है और वहाँ से बाहर आ जाता है। वह काफी मायूस होता है कि क्या सोचा था और क्या हो गया? उसके मन में ऐसे विचार आने लगते हैं कि क्यों न घर ही छोड़ दे? काफी विचार करने के बाद वह नौकरी करने दूसरे शहर चले जाता है और पिता के काफी संपर्क करने के बाद भी वापस नहीं आता।

कई वर्षों तक वह पिता से संपर्क हीं नहीं करता है। एक दिन उसके पास खबर आती है कि पिता की मृत्यु हो गई है। अपनी पत्नी के कहने पर वह पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने जाता है। अंतिम संस्कार के बाद वह पिता के कमरे में जाता है जहाँ पर वहीं बाक्स रखा होता है।

वह उस बाक्स को उठाता है और किताब के पन्ने पलटता है तब उसमें से चाबी गिरती है। यह उसी कार की चाबी होती है जो उसके पिता ने वर्षों पूर्व उसके लिए खरीदी थी और यह वही कार होती है जिसके सपने वह देखा करता था। साथ ही किताब के नीचे कुछ कागजात रहते हैं जिनमें पूरी संपत्ति व जायदाद उसके नाम की होती है। यह देखकर उस लड़के को जोरदार झटका लगता है वह गश खाकर वहीं गिर जाता है।

जब वह होश में आता है तो स्वयं को लोगों से घिरा हुआ पाता है। वह किसी से कुछ कह नहीं पाता है उसकी आँखों से लगातार आँसू बहते रहते हैं। बड़ी मुश्किल से वह स्वयं से ही इतना कह पाता है कि मैं मैं अपने आपको कभी माफ नहीं कर पाऊँगा।

कुछ सबक जिन्हें हम देर से सीखते हैं

1-आपका रंग-रूप,आपकी हाइट,आपका चेहरा आदि आपकी सफलता में मात्र 1 प्रतिशत का योगदान देते हैं आपकी सफलता में शेष 99 प्रतिशत का योगदान आपकी कड़ी मेहनत का होता है।
2-समय ही किसी भी इंसान को बनाता है और मिटाता भी है। यदि आप अपने समय को यूं ही नष्ट करते हैं तो आगे चलकर यह पछताने का कारण बनता है।
3-बिना सोचे समझे लोगों का अन्धा अनुकरण करना आपकी असफलता की मुख्य वजह होती है।
4-शुरूआत में सही समय पर जोखिम नहीं उठाना एवं कड़ी मेहनत से बचने की प्रवृत्ति आगे चलकर आपके जीवन को दयनीय बना देती है।
5-पैसों के पीछे नहीं बल्कि अपने सपनों के पीछे भागिए और अपने सपनों को कभी मरने मत दीजिये।
6-हर चीज़ की शिकायत करते रहने से आपकी समस्याएं समाप्त नहीं होती हैं। आपकी समस्याएं तब कम होना शुरू होती हैं जब उन्हें सुलझाने के लिए आप स्वयं प्रयास करना शुरू कर देते हैं।
7-जिंदगी में हर कोई आपको पसंद नहीं करता है पर इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि हर कोई आपको नापंसद करता है।
8-हमेशा चीजें वैसी नहीं होती हैं जैसा आप चाहते हैं। आप किसी से भले ही बेइंतिहां मोहब्त करते हों पर यदि वह आपके लिए सही नहीं है तो वह आपके जीवन से जरूर चला जाएगा।
9-लोग आपके साथ हमेशा नहीं रह सकते कोई कब साथ छोड़ देगा पता नहीं होता अक्सर हमें लोगों की अहमियत तब पता चलती है जब वे चले जाते हैं।

खेल चलता रहता है पर खिलाड़ी बदल जाते हैं

दिन में रात की तलाश, रात में सुबह की तलाश । साथ में अकेलेपन की और अकेलेपन में साथ की तलाश। यही सिलसिला चलता रहता है और हम गोल- गोल घूमते रहते हैं।सफर पर जाते हैं पर शाम को खुद को वहीं पाते हैं। रास्ते बदले, साथ बदले, मँजिल बदली,पर हम नहीं बदले। कभी किस्मत को तो कभी खुद को दोषी ठहराया। बेचैनी बढ़ती गई और हम कुछ ढूंढता रहे जितना ढूंढा उतना खोया ।लोग बढते गये मैं ठहरता गया.अभी भी कुछ ढूंढ रहे हैं पर किसी ने बताया है ये रास्ता हमारे अंदर से हो कर जाता है।

दूसरों में खुद को ढूंढना हमेशा आसान होता है । मुश्किल है तो बस खुद को ढूंढना जो सबसे करीब है वो नजर नहीं आता और जो दूर दिखता है वो सबसे आसान लगता है ।यही देखने का नजरिया ही तो कारण था उसकी उदासी का शायद किसी ने इसे समझा था और लिखा दिया था “आनंद श्रोत बह रहा फिर मन क्यूं उदास है? अचरज है कि जल में रह कर भी मछली को प्यास है।

लोग क्या सोचेंगे ? कल उनका सामना कैसे करूंगा ? झूठ बोला नहीं जाता ,सच परेशान होता है ।असमंजस,दोहरा रास्ता,संकोच.शायद हम सभी एेसे ही जीते हैं यह ङर है नकारे जाने का ङर,अपमानित होने का ङर,असफल हो जाने का ङर,अज्ञात का डर… कैसे सामना करें? क्या फैसला करें? सही फैसला क्या होता है? यहाँ विरोधाभास है,सही को गलत और गलत को सही बताने और उसकी व्याख्या करने के सबके अपने नजरिये हैं जितना गहराई में जाओगे उतना अकेला पाओगे।

जीने के लिए मकसद होना चाहिए। बिन मकसद क्या जीना ? पर मकसद क्या होना चाहिए? कुछ भी जो दिल को सुकून दे। मकसद क्या छोटा-बड़ा या अच्छा-बुरा होता है? नहीं छोटी या बड़ी, अच्छी या बुरी तो सोच होती है। जैसी सोच वैसा मकसद, बुरी सोच बुरा मकसद, अच्छी सोच अच्छा मकसद । सोच कहां होती है? हमारे भीतर, मकसद कहां? सोच के भीतर और सुकून कहां? दिल के भीतर । जरूरत है तो बस खुद को टटोलने की फिर मिल जाएगी वो सोच जो ले जाएगी जीवन के मकसद के पास और जीवन का वो मकसद देगा दिल का सुकुन जिसकी आपको न जाने कब से तलाश थी।

जो भी फैसला लोगे वो न तो सही और न ही गलत होगा.सब मन का खेल है निश्चिंत होकर खेलो क्योंकि खेल हमेशा चलता रहता है पर खिलाड़ी बदल जाते हैं।

जिंदगी ने जो बात सिखाई है

1-आप जैसे हैं वैसे ही रहिये , किसी को इम्प्रेस करने की आप जितनी ज्यादा कोशिश करते हैं,वह आपसे उतनी ही दूर भागता है।
2-आप जिंदगी में किसी चीज को जितना ज्यादा सीखते हैं, आपका यह अहसास कि आप उसके बारे में कितना कम जानते हैं उतना ही गहरा होता जाता है।
3-आप अपनी कमियों और गलतियों को जितनी अधिक स्वीकार करते हैं,लोग आपको उतना ही अधिक पंसद करते हैं।
4-जिदंगी में आपके पास जितनी ज्यादा च्वाईस होगीं, जीवन में संतुष्टि उतनी ही कम होगी।
5- किसी घटना का होना या न होना उतना महत्व नहीं रखता है जितनी महत्वपूर्ण उस घटना के प्रति आपकी प्रतिक्रिया होती है।
6- जो चीज आपके लिए नियति ने लिखी होती है, उसे पाने के लिए आपको अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता है।
7-दूसरों पर नियंत्रण की कोशिश मत कीजिए,खुद पर नियंत्रण करना सीखिए लोग अपने-आप आपके नियंत्रण में आ जाएंगे।
8- दूसरों से प्रतिस्पर्धा मत कीजिए, आपने खुद को कल की तुलना में कितना बेहतर किया है यही आपका वास्तविक मूल्यांकन होता है।
9-जिदंगी में मिलने जख्मों को खुद पर कभी इतना हावी मत होने दीजिए कि आप इतने बदल जाएं कि खुद को भी पहचान न पाएं।

सब की यही कहानी है

हमारा जीवन दुखों से भरा हुआ दिखाई देता है। दुखों से बचने और सुखी जीवन जीने के लिए हम कोशिश भी बहुत करते हैं पर यह निराशाजनक है कि इसमें सफलता गिने-चुने लोगों को ही मिल पाती है शेष लोगों की झोली खाली ही रह जाती है। लोग भटकते हैं सुख के लिए और मिलता है दुःख। हर इंसान की यही कहानी है।

खुशियों की तालाश में भटकते हुए हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि दुख कहीं बाहर से नहीं आता है। हम चाहे जितना भी दुखों के कारण को कहीं बाहर ढूढं लें किसी इंसान में, किसी घटना में, किसी परिस्थिति में चाहे जितना तलाश लें पर हाथ कुछ ठोस नहीं आएगा। बाहर ढूंढने पर कारण तो पर्याप्त मिल सकते हैं पर समाधान नहीं मिलता है। समाधान परिस्थितियां बदलने से नहीं बल्कि मनःस्थिति बदलने से मिलता है।

दुखों से छुटकारा पाने के लिए सबसे पहले हमें जिम्मेदारी लेना सीखना होगा। एेसा इसलिए क्योंकि जब हम स्वयं की जिम्मेदारी लेते हैं तब हम जैसे भी हैं खुद को पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं। सुख मिले या दुख, सम्मान मिले या अपमान सबको समान रूप से स्वीकार करने के लिए हमें अपनी परिस्थिति की जिम्मेदारी स्वयं लेनी होगी जब हम स्वयं की जिम्मेदारी ले लेते हैं तब हमारी मुश्किल परिस्थितियों से लड़ने की ताकत भी बढ़ जाती है।

दूसरों पर जिम्मेदारी थोपने वाले, अपनी परिस्थितियों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते रहने से हम कभी स्वयं को बदलने की शुरुआत नहीं कर पाते हैं।

जो स्वयं की जिम्मेदारी लेना जानते हैं, जो दुख के कारणों की तालाश बाहर नहीं भीतर करते हैं और परिस्थितियों को नहीं बल्कि मनःस्थिति को बदलने की कोशिश करते हैं परिवर्तन उन्हीं के जीवन में घटित होता है। नजरिया बदलते ही जीवन समाधान स्वयं प्रस्तुत कर दिया करता है।

प्रेम जिद नहीं है

प्रियांश और प्रिया की मुलाकात कुछ वर्षों पहले कालेज में हुई थी। दोनों के विचारों में काफी समानता थी वे एक-दूसरे का साथ पसंद करते थे। वक्त के साथ उनकी मित्रता घनिष्ठता में बदल रही थी। यह घनिष्ठता कब प्रेम में रूपांतरित हो गई इसका खुद उन्हें भी पता नहीं चला था।

वक्त तेजी से बीत रहा था। आखिरकार वह कालेज का अंतिम दिन भी आ गया जब उन्हें अलग होना था। भारी मन से प्रियांश प्रिया को छोड़ने स्टेशन आया था। ट्रेन छूटने में कुछ समय शेष था। तभी प्रियांश ने प्रियांश ने प्रिया से अपने मन बात कही थी उसने प्रिया से विवाह का निवेदन किया था जिसे प्रिया ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि इन सब बातों का अभी सही वक्त नहीं है।

खुद को अस्वीकार किया जाना आसान नहीं होता है। यह प्रियांश के लिए अप्रत्याशित था। उसने प्रिया के इन्कार की वजह का आकलन करने के स्थान पर इसे अपने अपना अपमान समझ लिया और इसके लिए प्रिया को दोषी ठहरा दिया। इस घटना को हुए कई वर्ष बीत गए थे पर प्रियांश की वेदना कम नहीं हुई थी। समय के साथ गहरे घाव भी भर जाते हैं पर चोट के निशान शेष रह जाते हैं।

प्रियांश की पीड़ा गहरी थी जो वक्त के साथ प्रिया की निंदा और स्वयं की प्रशंसा में परिणित हो गई थी। प्रियांश को जब भी अवसर मिलता वह प्रिया की निंदा शुरू कर देता था। यदि अवसर नहीं मिलता तो अवसर बना लेता यदि तर्क नहीं मिलता तो कुतर्क करता था यदि कोई श्रोता नहीं मिलता तो स्वयं ही वक्ता व श्रोता बन जाता था।

इस तरह वह प्रिया की निंदा का कोई मौका नहीं छोड़ता था। इतने पर भी जब उसका अहंकार संतुष्ट नहीं होता तो वह दूसरों के सामने अपनी प्रशंसा करने लग जाता और दूसरों की नजरों में प्रिया को हीन और खुद को श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास करता था।

यह बातें धीरे-धीरे प्रिया तक भी पहुंच गयीं शुरुआत में तो उसने शुरुआत में इन बातों को महत्व नहीं दिया पर जब निंदा का स्तर गिरकर मर्यादा की सीमा को लांघने लगा तो उसने प्रियांश से मिलने का निश्चय किया। वर्षों बाद आज प्रियांश से प्रिया मिल रही थी उसने महसूस किया कि प्रियांश में बदलाव आ गया था उसकी आँखों में जिद और व्यवहार में अहंकार था।

प्रिया ने धीमे स्वर में कहा प्रियांश आज जीतकर भी तुम हार गए हो। जीत तुम्हारे अहंकार की हुई है और हार तुम्हारे प्रेम की हुई है। अपनी बातों से तुमने मेरा ही नहीं बल्कि स्वयं का भी उपहास उड़ाया है अपनी बातों से तुमने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रेम के विषय में तुम अभी भी अपरिपक्व और अधूरे हो।

किसी का जीवन में आना और जिदंगी से चले जाना प्रकृति का नियम है पर प्रेम के उसूल समय से परे हैं जिसकी अनिवार्य शर्त पवित्रता और समर्पण हैं। इसमें में जो जितना खोता है उतना ही पाता है, बिना त्याग प्रेम अधूरा है। उस दिन का मेरा निर्णय परिस्थितियों के अनुसार था पर अपनी अपरिपक्वता और व्यवहार से तुमने आज साबित कर दिया है कि मेरा वह निर्णय सही था।

प्रिया जा चुकी थी प्रियांश वहीं अवाक् बैठा था वह जीतकर भी हार गया था और प्रिया हारकर भी जीत गयी थी। प्रियांश समझ चुका था प्रेम जिद नहीं है,यह वह पवित्र समर्पण है जिसमें लोग जीतकर भी हार जाते हैं और कुछ लोग हारकर भी जीत जाते हैं आज प्रियांश को जीवन का सबसे बड़ा सबक मिला था, उसकी पीड़ा समाप्त हो गई थी।

बस खुद को संभाले रखिये

कठिनाई या असफलता के लक्षण देखते ही हड़बड़ा जाना ठीक बात नहीं है। सफलता की हल्की सी झलक देखते ही फूले न समाना और अहंकारी बन जाना छोटी सोच का लक्षण है। ऐसे लोग बड़े काम कभी पूरा नहीं कर पाते हैं। उन्हें आधी अधूरी स्थिति में ही काम को छोडना पड़ता है। बिगड़ा हुआ संतुलन पूरी बात सोचने और मंजिल के अन्तिम चरण तक पहुँचने की स्थितिबनने ही नहीं देता है।

जीवन कर्मभूमि है। इसमें खिलाड़ी का मन लेकर उतरना चाहिये। खिलाड़ियों के सामने पग पग पर हार -जीत भी आती रहती है। अभी लगता है कि हार अभी दिखता है कि जीत। दोनोँ ही परिस्थितियों में वे समान रूप से जुटे रहते हैं। हार जाने पर जीतने वाले से लड़ने- मरने पर उतारू नहीं होते बल्कि हाथ मिलाते और बधाई देते हैं। जीत जाने पर इस तरह इठला कर नहीं चलते मानों कोई किला जीत कर आये हों। हारने वालों का तिरस्कार करना बेहूदों का काम है। एेसे लोग कुशल खिलाड़ी नहीं माने जाते हैं।

प्रतिकूलताओं का दबाव और भी अधिक बढ़ सकता है। यह अनुमान लगाकर चलेंगे तो आप जीवन संग्राम के अच्छे खिलाड़ी कहे जा सकते हैं। खिलाड़ी का पहला और आवश्यक गुण यह है कि वह हारती हुई बाजी में भी संतुलित और स्थिर होना चाहिए। उसके लिए तैश, आवेश किन्हीं भी परिस्थितियों में उचित नहीं है। हर आदमी खिलाड़ी तो नहीं हो सकता, पर उसे समझदार तो होना ही चाहिए। समझदारी की जिम्मेदारियाँ खिलाड़ी जिम्मेदारी से किसी भी प्रकार कम नहीं है।

जीवन एक संग्राम है जिसमें कदम-कदम पर चुनौतियों का सामना करते हुए चलना पड़ता है। इस यात्रा के लिए अटूट धैर्य और साहस की आवश्यकता है, इससे भी अधिक इस बात की जरूरत है कि हर हालत में सन्तुलन बना रहे। सन्तुलन डगमगा जाना आधी सफलता हाथ से गवाँ देना और वजन को दूना बढ़ा लेना है।

कछुए और खरगोश की दौड़ में खरगोश इसलिए बाजी हरा कि उसके अंहकार ने उसे लगातार श्रम नहीं करने दिया और थोड़ी सी सफलता को ही काम का बन जाना मान बैठा ।कछुआ इसलिए जाीता क्योंकि अपनी धीमी चाल और लम्बी मंजिल की बात को भली प्रकार समझते हुए भी निराश नहीं हुआ और लगातार हिम्मत के साथ चलते रहने में ढीला नहीं पड़ा। धीरज और हिम्मत बनाए रहने वाला हर कछुआ बाजी जीतता है जब कि उतावले खरगोश सक्षम होते हुए भी मात खाते रहते हैं।

यह बात सोचने की है

यह बात सोचने की है कि जब हम अपनी समस्याओं में से अधिकांश को, अपना भीतरी सुधार करके, अपनी विचार शैली में थोड़ा परिवर्तन करके हल कर सकते हैं तो फिर इतना उलझन भरा जीवन क्यों व्यतीत करते हैं? मनुष्य बहुत चतुर है, विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण चतुराई का परिचय देता है, उसकी बुद्धिमत्ता की जितनी सराहना की जाए उतनी कम है।

इतना सब होते हुए भी जब हम अपने नजरिए को सुधारने की आवश्यकता को नहीं समझ पाते हैं और उस पर समुचित ध्यान नहीं देते हैं तो हमारी बुद्धिमत्ता पर सन्देह होना स्वाभाविक ही है। जब हम कोशिश करके बड़े-बड़े कार्यों को पूरा करते हैं तब यह बात हमारे लिए क्यों कठिन होनी चाहिये कि हम अपनी भीतरी कमियों और त्रुटियों पर विचार करें और उन्हें सुधारने के लिए तैयार हो जाएं।

लोगों के हाथों हमें अपना सुख और चैन बेच नहीं देना चाहिए। कोई प्रशंसा करे तो हम खुश हों और निन्दा करने लगे तो हम दुःखी हो जाएं? यह तो पूरी पराधीनता हुई। हमें इस संबंध में पूरी तरह से अपने ही ऊपर निर्भर रहना चाहिए और निष्पक्ष होकर लगातार अपनी समीक्षा करनी चाहिए। निन्दा से दुःख होता हो तो अपनी नजर में अपने कामों को ऐसे घटिया स्तर का साबित न होने दीजिए जिसकी निन्दा करनी पड़े। यदि प्रशंसा चाहते हैं तो अपने कार्यों को प्रशंसनीय बनाइये।

जब हम अपनी प्रसन्नता को अपनी मुट्ठी में रख सकते हैं फिर क्यों इस बात पर निर्भर रहा जाए कि जब कभी सफलता मिलेगी या अभीष्ट वस्तु प्राप्त होगी तब हम खुश होंगें? इस प्रतीक्षा में मुद्दतें गुजर सकती हैं और यह भी हो सकता है कि सफलता न मिलने पर वह इंतजार ही जीवन भर रहे। इसलिये गीता में भी हमें यह समझाया गया है कि फल की प्रतीक्षा मत करो, उस पर बहुत ध्यान भी मत दो, न तो सफलता के लिए आतुरता दिखाओ और न ही असफलता मिलने पर परेशान होओ। मन को शान्त और संयमित रखकर बस अपने कर्तव्यों का एक पुरुषार्थी व्यक्ति की तरह ठीक तरह से पालन करो।

गलती करना बुरा नहीं है; बल्कि गलती को न सुधारना बुरा है। संसार के महान् पुरुषों ने अनेक प्रकार की गलतियाँ की हैं। लेकिन इन्होंने गलती को सुधारा और आगे बढ़कर महापुरुष बने। याद रखिए कि एक गलती को सुधारकर आप किसी न किसी क्षेत्र में आगे बढ़ जाते हैं।

आत्मचिन्तन, आत्मसुधार और आत्मनिर्माण का कार्य उतना ही सरल है जितना शरीर को योग के विभिन्न आसनों के लिए अभ्यस्त कर लेना। आरम्भ में इस झंझट में पड़ने से मन आनाकानी करता है, पुराने अभ्यास को छोड़कर नया अभ्यास करना अखरता है, कुछ कठिनाई एवं परेशानी भी होती है। इसी प्रकार यदि आत्म-निरीक्षण करने में, अपने दोष ढूंढ़ने में मन के संस्कार एवं अंहकार आडे आते हैं अपनी बुरी आदतों का भी समर्थन करने के लिये दिमाग कुछ तर्क और कारण ढूंढ़ता रहता है जिससे दोषी होते हुए भी अपनी निर्दोषिता प्रमाणित की जा सके।

अच्छाई का नाटक भी अच्छा है पर काम तो इतने मात्र से चलता नहीं है। अपने सुधार के बिना परिस्थितियाँ नहीं सुधर सकतीं। अपना दृष्टिकोण बदले बिना जीवन की गतिविधियाँ नहीं बदली जा सकतीं। इस तथ्य को हम जितना जल्दी समझ ले उतना ही अच्छा है।

अपनी गलतियों को स्वीकार करना सीखिये

जब हमसे कोई भूल हो जाती है और कालांतर में यदि हमें उस गलती का पछतावा होता है तो इस मनोवृत्ति को पश्चाताप कहते हैं। जब हम अपनी कमियों को स्वीकार करके दोषमुक्त होने का प्रयास करते हैं एवं अनुचित कार्यों के बदले लोकहित के कार्य करते हैं तब हमारे यह कार्य पश्चाताप की श्रेणी में आते हैं।

जब कभी अधिकार प्राप्त कोई व्यक्ति अपने अधीनस्थ सहयोगियों को अनावश्यक प्रताड़ित करता है और कुछ समय बाद जब उसे अपनी गलती का एहसास होता है और वह शपथ लेता है कि वह भविष्य में एेसी गलती नहीं करेगा तो यह भी अपनी भूल का पश्चाताप करने जैसा ही है। कुछ लोग समय रहते चेत जाते हैं और गलतियों को सुधारने की कोशिश करते हैं वहीं कुछ लोगों को अपनी गलतियों का अहसास काफी देर बाद होता है और प्रायः तब नुकसान की भरपाई नहीं हो पाती है।

जब अग्निपरीक्षा देने के पश्चात मां सीता धरती की गोद में समा गईं तब भगवान राम ने जो पश्चाताप किया वह अद्वितीय है। जब द्रौपदी का भरी सभा में अपमान हुआ तो भीष्म और द्रोणाचार्य आंखें झुकाए देखते रहे, यह अनुचित प्रकरण दोनों महारथियों को जीवन भर पश्चाताप की अग्नि में जलते रहे। कलिंग युद्ध में मानव त्रासदी से आहत सम्राट अशोक को पश्चाताप ने रणभूमि से विरक्त कर बुद्ध के चरणों में लाकर अहिंसामय बौद्ध प्रचारक के जीवन में रूपांतरित कर दिया। रावण ने पश्चाताप नहीं किया तो अपने साथ ही संपूर्ण असुर जाति के विनाश करवा लिया।

पश्चाताप का मनोविज्ञान सरल भी है और जटिल भी। यदि हम किसी से कुछ अपेक्षा रखते हैं तो हमें भी उसकी इच्छाओं और भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। पश्चाताप करना साहस का काम है क्योंकि अपनी भूलों को स्वीकार करने और उसे सुधारने का प्रयत्न करने के लिए हिम्मत चाहिए क्योंकि एेसा करने के लिए हमें अपने अहं को दरकिनार करना पड़ता है। किसी भी भूल, गलती और अनुचित कार्य का सर्वोच्च दंड पश्चाताप ही है जो मनुष्य की आत्मा स्वयं उसे देती है।

अपनी गलतियों को स्वीकार करना सीखिये और और यदि आप गलत हैं तो झुकना भी सीखिये एेसा करने से आपका व्यक्तित्व और अधिक निखरता है और आप अधिक व्यवहार कुशल बनते हैं।

जो न समझे वो अनाड़ी है

हमारे चारों तरफ़ के वातावरण का हम पर बहुत प्रभाव पड़ता है। हम प्रति दिन जो देखते हैं और सुनते हैं उसका हमारे मन पर गहरा असर होता है। हम अंततः वही बनते हैं जो गढ़ कर हमें बनाया जाता है।

हमारी शिक्षा अधूरी है जो हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व को विकसित करने में असमर्थ है। हमारी पाठ्य पुस्तकें हमें ईमानदार बनना और दूसरों के प्रति संवेदनशील होना नहीं सिखाती हैं।

हमारा देश और समाज अपेक्षा के अनुरूप उन्नति क्यों नहीं कर पा रहा है? क्योंकि हमारे चारों तरफ़ झूठ और बेईमानी का बोलबाला है। यदि हम ईमानदारी और नियमों के पालन को ही धर्म समझें तो हमें आगे बढ़ने से भला कौन रोक सकता है।

हममें से अधिकांश लोग वस्तुओं और परिस्थितियों का अनुचित लाभ उठाने के लिए अपनों और दूसरों से झूठ बोलते हैं। हमें खुद पर और आने वाले कल पर भरोसा नहीं है। कल नौकरी रहेगी या नहीं? बिजनेस में फायदा होगा या नुकसान? ये विचार मन को भयभीत करते हैं और इसीलिए हम झूठ बोलते हैं और छल-कपट से पैसा कमाने चाहते हैं।

समाज को स्वस्थ बनाना है तो हमें संदेह से ऊपर उठना होगा और एेसे समाज की संरचना करनी होगी जहां झूठ और बेईमानी की आवश्यकता ही न रहे। एक एेसे समाज को बनाने की जरूरत है जहां मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं सहज ही पूरी हो सकें एवं रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत सुविधाएं सभी को हासिल हों।

जो पहले कभी नहीं हुआ है वह आज भी नहीं हो सकता है एेसी सोच नासमझ लोग ही रखते हैं। दूसरों का हक मारना और आवश्यकता से अधिक संचय करने की प्रवृत्ति कहीं ले नहीं जाती है बस जिदंगी भर भटकती रहती है

मन में हो कुछ, कहें और जताएं कुछ तो फिर यह बेईमानी है और बेईमानी किसी के भी नाम पर, किसी भी विचार से की जाए उससे किसी का भला नहीं होता है भले ही हम सच समझें या फिर अनजान बने रहें।