बस चलना जरूरी है

जीवन ताश के खेल की तरह है। हमने खेल का आविष्कार नहीं किया है और न ताश के पत्तों के नमूने ही हमने बनाये हैं। हमने इस खेल के नियम भी खुद नहीं बनाये और न हम ताश के पत्तों के बँटवारे पर ही नियंत्रण रख सकते हैं। पत्ते हमें बाँट दिये जाते हैं, चाहे वे अच्छे हों या बुरे। इस सीमा तक नियति या भाग्य की भूमिका है। परन्तु हम खेल को अच्छे या खराब ढंग से खेल सकते हैं। हो सकता है कि किसी कुशल खिलाड़ी के पास खराब पत्ते आये हों और फिर भी वह खेल में जीत जाये। यह भी संभव है कि किसी खराब खिलाड़ी के पास अच्छे पत्ते आये हों और फिर भी वह खेल का नाश करके रख दे। हमारी जिंदगी किस्मत और चुनाव का मिश्रण है।

हकीकत अक्सर निर्मम हुआ करती है हर सपने हर ख्वाब को कड़ी कसौटी पर आजमाती है और जो उस पर खरा नहीं उतरता उसे बिखरने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। पर सपने टूटने का मतलब ये नहीं कि वो बेकार थे दरअसल इस दुनिया के कुछ उसूल हैं और अपने सपने को जीने के लिए उन शर्तों को पूरा करना पड़ता है।

जब भी इन्सान कोई निर्णय लेता है तो वह यह सोच के नहीं लेता कि यह गलत साबित होगा। दरअसल निर्णय आज की परिस्थितियों में लिए जाते हैं जबकि कल की बदली हुई परिस्थितियां उन्हें सही या गलत साबित करती हैं। कल किसी ने नहीं देखा है पर इंसान की फितरत होती है अनुमान लगाने की और इसी आधार पर वह निर्णय लेता है।आप कितनी सटीकता से भविष्य का अनुमान लगा सकते हैं यह आपकी दूरदर्शिता को निर्धारित करता है और आपकी दूरदर्शिता निर्धारित करती है आपके निर्णय के सफल या असफल होने की संभावना को। अनुमान तो कोई भी लगा सकता है पर अनुभव के साथ अनुमान लगाने की संभावना बढ़ जाती है।

सफल होने और हार जाने में महज इतना फर्क है कि आप अपनी शर्तों पे जिए। सही या गलत कुछ नहीं है बस नजरिए का फर्क है। इतिहास गवाह है कि जो चीजों और घटनाओं को लेकर उदार रहा और जिसने दिल और दिमाग के दरवाजे खुले रखे सपने पूरे उसी के हुए। इसलिए खुद को उदार बनाइए और चीजों को आत्मसात करना सीखिए।

सदा दिन ही बना रहे रात कभी न आये भला यह कैसे संभव है? सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुःख के दिन कभी न आयें यह मानकर चलना सच्चाई से आंखें मूँद लेने के समान है। बुद्धिमान वे है जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुःख की घड़ी आने पर उसका सामना करने के लिए आवश्यक धैर्य और साधन इकट्ठा करते रहते हैं।

जीवन की सार्थकता चीजों, परिस्थितियों और व्यक्तियों को उनकी अच्छाई और कमियों के साथ स्वीकार कर लेने में है जब हम चीजों को उनकी अच्छाई और बुराई के साथ स्वीकार कर लेना सीख लेते हैं तब हम जीवन में आगे बढ़ जाते हैं। चीजों और परिस्थितियों को स्वीकार कर लेने के बाद हम ज्यादा बेहतर तरीके से समझ पाते हैं और उनकी कमियों को दूर करने के लिए ज्यादा गंभीर प्रयास कर पाते हैं।

किसी ने ठीक ही कहा है-
ना हारना जरूरी है, ना जीतना जरूरी है
ये जिंदगी एक खेल है,बस खेलना जरूरी है।




क्या ढूंढता है एे दिल, तू क्यूं उदास है

जिंदगी में हममें से अधिकांश लोगों के पास बहुत कुछ होते हुए भी हम असंतुष्ट दिखाई देते हैं। हमारी हर मुस्कान के पीछे एक गहरी उदासी छिपी होती है। हमें स्वयं पता नहीं होता है कि हम चाहते क्या हैं? एक अजीब सी बैचेनी के बीच जीवन गुजरता रहता है।

हमारी इस पीड़ा का मुख्य कारण हमारे व्यक्तित्व का विभाजित होना है। एक ओर तो हम लोगों और साधनों के बीच में अपने को सुरक्षित समझते हैं तो दूसरी ओर हमें अपनी उसी जिदंगी में एक खालीपन, एक शून्यता की भी अनुभूति होती है।

हमें लगता तो है कि हमें अपने भीतर प्रवेश करना चाहिए और यह जानना चाहिए कि वास्तव में हमारे जीवन का मकसद क्या है? पर हम इस सम्भावना से वह भयभीत हो जाते हैं कि आत्म निरीक्षण मुझे कहीं निराश न कर दे, मेरा सही स्वरूप न उजागर कर दे।

हम यह कहते तो हैं कि हम कुछ बड़ा काम करेंगे एवं दूसरों की भलाई एवं सहायता करेंगे पर कर नहीं पाते हैं । हम दूसरों की तरह बनना तो चाहते हैं पर स्वयं और अपने अहं को भुला नहीं पाते हैं। रह-रहकर वही मन में गहरे जमे हुए संस्कार आड़े आ जाते हैं जो हमारे अनगढ़ मन के महत्त्वपूर्ण घटक बन गये हैं।

हमारी मुस्कराहट में एक चिन्ता की झलक दिखाई पड़ती है। हम अपनी चिन्ताओं को दूर करने के लिए खुद को विभिन्न गतिविधियों में उलझाते हैं पर जब वह समाप्त होने लगती हैं तो संभावित खालीपन हमें भयभीत कर देता है।

संसार का यह विचित्र नियम है कि बाजार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते हैं पर मनुष्य अपना मूल्यांकन स्वयं करता है और हम अपना जितना मूल्यांकन करते हैं उससे अधिक सफलता हमें नहीं मिल पाती है।

हर वह व्यक्ति जो आगे बढ़ने की आकांक्षा रखता है उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि प्रकृति उसकी चेतना में समस्त सम्भावनाओं के बीज डाल दिये हैं। और साथ ही उनके अंकुरित होने की क्षमताएँ भी दी हैं। लेकिन अक्सर यही देखने में आता है कि हममें से अधिकांश लोग अपने प्रति ही अविश्वास से भरे होते हैं तथा उन्हें अपनी क्षमताओं और सम्भावनाओं पर संदेह होता है। अपने व्यक्तित्व को विकसित तथा संभावनाओं को अंकुरित करने की कोशिश करने के बजाय हम उनके सम्बन्ध में विचार तक नहीं करना चाहते हैं।

इसी संबंध में किसी ने खूब लिखा है –

आनंद स्रोत बह रहा, मन क्यूं उदास है
अचरज है कि जल में रहकर भी मछली को प्यास है।

जिंदगी में उतावलेपन से बचिये

उतावलापन मनुष्य स्वभाव का एक दोष है। इसीलिये एक कहावत प्रचलित है—उतावला सो बावला। जिस समय मनुष्य उतावला होता है उस समय उसमें लगभग वे सारी कमियाँ और विकृतियाँ आई रहती हैं जो किसी बावले व्यक्ति में पाई जाती हैं।

अक्सर होता यह है कि किसी काम को जल्दी से निपटाने के लिये लोग उतावले हो जाते हैं। किन्तु उसका परिणाम उल्टा ही होता है। उतावलेपन के साथ किये गये काम प्रायः जल्दी होने के बजाय देर में ही हो पाते हैं—वो भी अव्यवस्थित, अस्त-व्यस्त एवं त्रुटिपूर्ण ढंग से।

किसी काम को करने के लिये एक अपेक्षित गति तथा समय की आवश्यकता होती है। जब मनुष्य किसी काम के लिये आवश्यक गति में बढ़ोत्तरी और समय में कटौती करेगा—दो घंटे के काम को एक घंटे में पूरा करने की हड़बड़ी में अंधाधुँध लग जायेगा, तो उसका बिगड़ जाना स्वाभाविक है।

जब कोई काम उतावली के साथ किया जाता है तब मन अस्थिर और बुद्धि व्याकुल रहती है, जिससे न तो एकाग्रता प्राप्त होती है और न ही काम की व्यवस्था बन पाती है। उतावली के साथ काम करने वाले का ध्यान काम में लगे रहने के बजाय उसकी ज्यों-त्यों समाप्ति में लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति काम प्रारंभ करने से पूर्व ही उसकी समाप्ति के लिये उत्सुक होने लगता है, जिससे काम करने में बीच में लगने वाला समय उसके लिये एक भार बन जाता है।

उतावले व्यक्ति की काम में रुचि नहीं होती है। वह उसे ज्यों-त्यों निबटा कर अपना पीछा छुड़ाने का प्रयत्न किया करता है। काम करने का यह तरीका बिल्कुल गलत है। इससे न केवल काम ही बिगड़ता है बल्कि समय खराब होने के साथ-साथ काम करने की शक्तियों का ह्रास भी होता है। इस प्रकार उतावली करने वाला अपनी न जाने कितनी हानि किया करता है।

उतावले न होने का अर्थ यह भी नहीं है कि हर काम को अनावश्यक विलम्ब से किया जाये या इतना धीरे-धीरे किया जाये कि वह अपेक्षित समय में पूरा न होकर सिर पर बोझ बना रहे। उतावले न होने का मतलब यही है कि कोई काम करते समय मन में किसी तरह की हड़बड़ी न रहे। काम को ज्यों-त्यों निबटाने की नौबत न हो। काम को पूरी तरह मन लगाकर निरन्तरता के साथ करना ही उतावलेपन से विरक्त होना है।

हर काम को अभ्यास के अनुरूप इस प्रकार किया जाना चाहिये जिससे कि न तो वह बिगड़े और न अनावश्यक विलम्ब हो। काम का जल्दी अथवा देर में कर सकना अपने-अपने अभ्यास पर निर्भर होता है। यदि आप कोई काम दक्षतापूर्वक जल्दी करना चाहते हैं तो उचित रूप से धीरे-धीरे उसका अभ्यास बढ़ाइये। अभ्यास बढ़ जाने से काम स्वयं ही अपेक्षित समय में ठीक से होने लगेंगे।

कुछ बातें जो हमें दिखाई नहीं पड़ती हैं

जीवन में सौन्दर्य सर्वत्र व्याप्त हैै पर उसे देखने के लिए आंखें खोलनी पड़ती हैं। आकाश की नीलिमा में,रात की कालिमा में,टिमटिमाते हुएे सितारों में,उगते और ढलते हुए सूरज की लालिमा में, चन्द्रमा की चाँदनी में सुंदरता बिखरी हुई है। बदलती हुई ऋतुएं अपने-अपने ढंग से अपने सौन्दर्य का श्रृंगार करती हैं। फूलों के रंग,चिडियों के गीत,हवाओं के संगीत सभी में सौन्दर्य समाया हुआ है।

बचपन की किलकारियों,यौवन की उमंग,बुढापे की अनुभवी झुर्रियों में सौन्दर्य के अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं। पर्वतों की ऊंचाई में,सागर की गहराई में,नदियों के प्रवाह में,लहलहाते हुए खेतों में,झूमते हुए वृक्षों में सुंदरता के नित नये आयाम प्रकट होते हैं। पर न जाने क्यों हम यह सब देख नहीं पाते हैं।

हम राहों पर चलते हैं पर कहीं खोये हुए से लगते हैं। मानो हम किसी गहरी बेहोशी में जिये चले जा रहे हैं। हमें जीवन के असीम सौन्दर्य की अनुभूति होती ही नहीं या फिर उस तरफ हमारा ध्यान जाता ही नहीं है। जीवन में कितना संगीत है पर हमें सुनाई नहीं देता,जीवन में कितना सौन्दर्य है पर हमें दिखाई नहीं देता। हम इंसान से ज्यादा मशीन हो गए हैं,हम कितने संवेदनहीन हो गए हैं।

साधारण जीवन को छोड़ दीजिए,उन्हें देखिये जो प्रकृति का सौन्दर्य निहारने के लिए पर्यटन पर निकलते हैं पर कितने आभागे हैं वो कि प्रकृति के बीच होकर भी वे उसके अदभुत सौन्दर्य को देख नहीं पाते हैं और रोजमर्रा की फालतू बातों में उलझकर अपना समय नष्ट कर देते हैं। जिन बातों का कोई अर्थ नहीं है,जिनका होना या न होना बराबर है उन बातों के पीछे जीवन के बहुमूल्य अवसरों को गंवाते रहने में कहां की समझदारी है।

किसी ने क्या खूब कहा है-

आनंद स्रोत बह रहा,मन क्यूं उदास है
अचरज है जल में रहकर भी मछली को प्यास है।

जब चिड़ियों ने चुग खेत लिया तब हाथ कछु न आएगा

अक्सर हम आखों से दिखाई देने के बावजूद सच को समझ नहीं पाते हैं। देखकर भी हम सच को अनदेखा करते हैं। हमारी कोशिश यही रहती है कि जो कुछ भी हमारे पास है वो सदा बना रहे। सभी चीजें यहां एक बहते हुए प्रवाह के समान हैं और बहते हुए पानी को रोकने का प्रयास करना व्यर्थ ही है।

कोई सदा ही जवान बने रहना चाहता है, तो कोई अपने सौंदर्य को सदा ही बनाए रखने के प्रयास में लगा हुआ है।
कुर्सी पर बैठा व्यक्ति उससे सदा के लिए चिपके रहना चाहता है, तो कोई चाहता है धन-दौलत सदा ही उसके पास बनी रहे। जीवन नित्य परिवर्तनशील है और हम इस कोशिश में लगे हुए हैं कि हमारे हाथ कुछ शाश्वत लग जाए।

बदलाव से हमें डर लगता है। कल का कोई भरोसा नहीं है, क्या होगा और क्या नहीं होगा, सब अनजान मालूम पड़ता है। अंधेरे में हम चले जा रहे हैं। असुरक्षा की भावना और अनिश्चितता से घिरे हुए हैं हम। हमारी निरंतर यही चेष्टा है कि हमें सुरक्षा मिल जीवन में निश्चिंतता हासिल हो।

हम जो कुछ भी बनाते हैं जिदंगी उसे मिटा देती है। कुछ बचता नहीं है सब कुछ राख बन जाता है। लेकिन फिर भी हम स्थिरता को ढूंढने की कोशिश करते हैं। हमारे जीवन का विषाद यही है। यदि इस विषाद को दूर करना है तो हमें यह सीखना होगा और समझना होगा कि जीवन क्षणभंगुर है और यहां कुछ भी स्थिर नहीं है।

जब बात आत्मचिंतन और स्वाध्याय की आती है तो अक्सर समय के आभाव का बहाना बनाया जाता है लेकिन तमाम लोग जगह-जगह पर एेसे भी मिल जाते हैं जो समय काटने के लिए मोबाइल पर गेम खेलने में व्यस्त रहते हैं। एेसे लोगों के पास हर चीज के लिए समय है बस स्वयं के लिए समय नहीं है।

कभी-कभी लगता है कि जिदंगी में हमारे पास समय बहुत ज्यादा है, इतना ज्यादा है कि हम समय काटने के नये-नये उपाय खोजने में लगे हुए हैं। समय न काट पाने के कारण इसांन स्वयं को ही काट लेता है और अपने हाथों से खुद को ही नष्ट कर लेता है।

अखबार में नाम, बड़ा मकान, बैंक बैलेंस या फिर बड़ी कार क्या बस इसी में जीवन की सार्थकता है? जिस दिन हम संसार से विदा लेगें इनमें से कौन कितना सार्थक रह जाएगा? सारी जिंदगी हम को बेचते रहे और चीजें खरीदते रहे। हमने अपनी आत्मा गँवाई और समान को इकठ्ठा कर लिया।

ध्यान से देखें तो हम पाएंगे कि हम स्वयं को गँवाने में लगे हैं। हम सब स्वयं को मिटा रहे हैं वो भी नये और अलग अलग तरीकों से। जो हम बाहर देखते हैं वही भीतर भी दिखाई पड़ता है। बाहर और भीतर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस सत्य के बोध को ही जीवन दृष्टि कहते हैं, जिसके आते ही हम स्वयं को पा लेते हैं।





खुद को प्रेरित रखने के उपाय

यदि आप जीवन में अपने लक्ष्यों को पूरा करना चाहते हैं और अपने सपने सच साबित करना चाहते हैं तो इसके लिए आवश्यक है कि आप सदा स्वयं को प्रेरित रखिये ।

अपने पसंदीदा टीवी सीरियल को देखने अथवा अन्य बातों में अपने समय को नष्ट करने के बजाय, आपको अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए और उन चीजों की तलाश करनी चाहिए जो आपके लक्ष्यों को पूरा करने में आपकी सहायता कर सकें।

खुद को हमेशा प्रेरित रखना आसान नहीं होता है, लेकिन कुछ तरीके हैं जिसके माध्यम से आप सुनिश्चित कर सकते हैं कि आप सही मार्ग पर हैं।

असफल होने का डर उन सबसे बड़े कारणों में से है जो लोगों को प्रेरित होने से रोकता है। कुछ डर वास्तविक हैं और कुछ आभासी होते हैं। अकसर लोग इतने भयभीत होते हैं कि वे अपने सपनों को पूरा करने की एक कोशिश नहीं करना चाहते हैं। इसका मतलब यह है कि यदि आप वास्तव में पूरी तरह से प्रेरित होना चाहते हैं, तो आपको विफलता से डरना नहीं चाहिए । आपको अपनी तरफ से पूरी कोशिश करनी चाहिए और कड़ी मेहनत करनी चाहिए, लेकिन परिणाम को स्वीकार करने के लिए तैयार भी रहना चाहिए।

सफल होने के लिए जुनून जरूरी है। यह एक महत्वपूर्ण कारण है जिसके आभाव में कि बहुत से लोगों को प्रेरित नहीं किया जा सकता है क्योंकि वे जो कुछ कर रहे हैं उसमें उनकी रुचि नहीं है या उस काम के प्रति उनका भावनात्मक लगाव नहीं हैं। इसका मतलब यह है कि यदि आप वास्तव में यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आप उच्चतम स्तर से प्रेरित हों तो आपको एक लक्ष्य निर्धारित करके उसकी प्राप्ति के लिए प्रयास करना होगा लक्ष्य एेसा होना चाहिए जिसका आप के लिए कुछ मतलब हो। पूरी तरह से प्रेरित होने के लिए पूरी तरह से समर्पित होना जरूरी है।

आप कभी-कभी बहुत थक गए होंगे और प्रेरित नहीं हो पा रहे, लेकिन आप यह सोचकर मुकाबले में बने रह सकते हैं कि काम के साथ आप अपना ध्यान भी रखेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि समय समय पर आपको पर्याप्त आराम मिलता रहे । आपको यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि आपके पास कोई बहाना या नकारात्मक विचार नहीं रहे जो आपको कमजोर करके आगे बढ़ने से रोक सके।

समय का दबाव भी वह वजह है जो आपको लक्ष्य के प्रति समर्पित होने से रोकता है इससे बचने का सर्वश्रेष्ठ उपाय यही है कि शुरुआत में किसी काम को करते समय उसमें लगने वाले समय के बारे में नहीं सोचें बल्कि अपना ध्यान काम को पूरा करने पर केंद्रित रखिए धीरे-धीरे जब हम अभ्यस्त हो जाते हैं तब काम में लगने वाले समय में कमी आती है और हम लक्ष्यों को निर्धारित समय के भीतर प्राप्त करने लगते हैं।





खुद को गुमराह मत कीजिए

हममें से कुछ लोग समस्याओं से मुक्त भविष्य की चाह रखते हैं। एेसे लोग अपने जीवन में आने वाली हर परेशानी एवं बाधाओं को अंतिम मानकर उनसे पूरी शिद्दत के साथ जूझते हैं और जल्दी से जल्दी सभी समस्याओं से मुक्त होकर जीना चाहते हैं। समस्याओं से संघर्ष करने का यह आशावादी नजरिया है। इस दृष्टिकोण के चलते इंसान न तो जल्दी थकता है और न ही हार मानता है।

दूसरी तरफ एेसे लोगों की भी कमी नहीं है जो यह मानते हैं कि जब तक जीवन है तब तक समस्याएं एवं संघर्ष भी हैं। इस नजरिये के अनुसार यह मानना ही पूरी तरह से अव्यावहारिक है कि इंसान का जीवन एक दिन समस्याओं से मुक्त हो जाएगा।

परेशानियों से जूझते हुए मन में यह विचार आना स्वाभाविक ही है कि वर्तमान समस्या ही आखिरी है और उसके बाद जीवन पूरी तरह से समस्या रहित हो जाएगा। एेसी बातें हमारा हौसला तो बढ़ाती हैं लेकिन एक बाद एक आने वाली समस्याएं हमारे मनोबल को कमजोर भी करती रहती हैं।

दरअसल यह सारा खेल हमारी समझ का है जब जिंदगी में यह मानकर चलते हैं कि जीवन में एक समय ऐसा भी आएगा जो पूरी तरह से समस्याओं से मुक्त होगा तो फिर यह दिल को बहलाने जैसा है। हमें यह समझना चाहिए कि एेसी बातें जिदंगी में हमारे हौसला बनाए रखने का तरीका भर हैं और अंतिम सत्य नहीं हैं।

हमें यह समझना चाहिए कि जीवन के संघर्ष और समस्याएं कभी स्थायी रूप से समाप्त नहीं होती हैं बस समय के साथ उनका स्वरूप बदलता रहता है। समस्याओं के आने और जाने का खेल जीवन पर्यन्त चलता रहता है। हमें तो बस समस्याओं से जूझते रहने की अपनी इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए।

जब हम किसी भी तरह की समस्या से जूझने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर लेते हैं तब समस्या के आने पर हमें झटका नहीं लगता है और समस्या का सामना हम बेहतर आत्मविश्वास के साथ कर पाते हैं। जिन्दगी में आने वाली कुछ समस्याएं तो हमारे आत्मविश्वास को देखकर ही उल्टे पांव लौट जाती हैं ठीक वैसे ही जैसे चौकीदार को मुस्तैद देखकर चोर उस घर में घुसने की हिमाकत नहीं करता है।

हर गलती कुछ कहती है

कहते हैं इंसान गलतियों का पुतला होता है। जीवन में गलतियां होना स्वाभाविक है, गलतियां करना सीखने की प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा है। मैनेजमेंट की भाषा में इसे ही ट्रायल एंड एरर मैथेड कहते हैं। गलतियां समस्या तब बन जाती हैं जब हम गलतियों से कोई सबक न लेकर अपनी गलतियों को जस्टिफाई करने की कोशिश करने लगते हैं एवं दूसरों से उन्हें छिपाने के क्रम में और गलतियां करते चले जाते हैं।

जब मैने अपनी प्राइमरी क्लासेज में पहले-पहल पेसिंल के स्थान पर पेन का प्रयोग करना शुरू किया, तब मैं लिखने में अनेक गलतियां करता था, उस समय मैं अपने काम को अपने टीचर को सबमिट करने से पहले उन्हें मिटा देने की कोशिश करता था।

कभी-कभी मैं अपनी गलती को साफ करने के लिए चाक का उपयोग करता था लेकिन एेसा करने पर कुछ देर बाद गलतियां फिर से दिखाई देने लगतीं थीं फिर मैंनें लार का उपयोग करना शुरू कर दिया, इस आइडिया नें काम किया, लेकिन केवल मेरी कापियों के पन्नों में छेद छोड़ने के लिए। मेरे शिक्षक मेरा काम गंदा होने के कारण अक्सर मुझे डांटा भी करते थे। लेकिन इन सब बातों से बेखबर मैं अपनी गलतियों एवं त्रुटियों को छिपाने की कोशिश में लगा रहता था।

यह सिलसिला शायद लंबा चलता यदि एक दिन मेरी मुलाकत उदार ह्रदय वाले उन शिक्षक से नहीं होती जिन्होनें मुझे गलतियों के प्रति एक नजरिया दिया। इन शिक्षक महोदय ने जब मेरी कापियों को देखा तब मुझे अपने पास बुलाकर प्यार से समझाते हुए कहा कि बेटा जब कभी तुमसे कोई गलती हो जाए तो बस उसे काटो और आगे बढ़ जाओ।

अपनी बात को समझाते हुए उन्होनें आगे कहा कि अपनी गलतियों को मिटाने की कोशिश करने से कुछ नहीं होगा बस केवल तुम्हारी नोटबुक को नुकसान पहुंचेगा। मैंने उनकी बात का विरोध किया और कहा कि मैं नहीं चाहता कि लोग मेरी गलतियों को देखें। मेरी बात को सुनकर मेरे शिक्षक हँसने लगे और बोले कि जब तुम अपनी गलती को मिटाने की कोशिश करते हो तो पहले से ज्यादा लोगों को तुम्हारी गड़बड़ियों और धब्बों का पता चल जाता है।

क्या आपने जीवन में कुछ गलतियां की हैं? यदि की हैं तो अपने जीवन से उन्हें मिटाने की कोशिश मत कीजिए बस उन्हें काटिये और आगे बढ़िये।

जब आप अपनी गलतियों को कवर करने का प्रयास करते हैं तब आप दूसरी गलती करते हैं और उस गलती को छिपाने के क्रम में तीसरी गलती इस प्रकार हम गलतियां करते चले जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप हम स्वयं को दूसरों की नजरों में और अधिक एक्सपोज और बेनकाब करते चले जाते हैं।

गलतियां करना उतना बुरा नहीं है जितना कि उनसे सबक न लेकर उन्हें दोहराते रहना है। यह भी सत्य है कि गलतियां भी आपको सही दिशा दिखातीं हैं। हर गलती एक अवसर होती है सुधार का। यह बात समझने की है कि मंजिलें कभी-कभी रास्ते बदलने से नहीं बल्कि तरीके बदलने से मिल जाती है।

इस वर्ष खुद को और बेहतर बनाइये

संसार का यह विचित्र नियम है कि बाजार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते हैं पर मनुष्य अपना मूल्यांकन स्वयं करता है और हम अपना जितना मूल्यांकन करते हैं उससे अधिक सफलता हमें नहीं मिल पाती है।

हर वर्ष हम यह सोचते तो हैं कि इस साल हम कुछ बड़ा काम करेंगे एवं दूसरों की भलाई एवं सहायता करेंगे पर कर नहीं पाते हैं । हम दूसरों की तरह बनना तो चाहते हैं पर स्वयं को और अपनी अादतों को बदल नहीं पाते हैंं। अच्छी बात यह है कि गलत राहों को छोडकर सही मार्ग पर चलने में कभी देर नहीं होती । सुबह का भूला शाम को लौट आए तो वह भूला नहीं कहलता है। जीवन में आने वाला हर नया साल भी हमें यही पैगाम देता है कि जब जागो तभी सवेरा।

कुछ छोटी – छोटी बातों को अपनाकर एक नई शुरूआत की जा सकती है और इस नई शुरूआत को करने के लिए नये वर्ष से बेहतर दूसरा कोई अवसर नहीं हो सकता है।

अच्छी ऊर्जा संक्रामक होती है। लोगों को छोटी- छोटी खुशियां देने की कोशिश कीजिए। कभी अपनी माँ के लिए एक कप चाय बनाइये, कभी अपने किसी पुराने दोस्त जिससे लंबे समय से बात न की हो उसे फोन कीजिए, या फिर मुस्कुराकर लोगों का अभिवादन कीजिए। यह सब आप को सकारात्मक ऊर्जा से भर देगा।

छोटी-छोटी जीत पर खुद को शाबाशी भी दीजिए। जिन कामों को आप बेहतर ढंग से अंजाम नहीं दे पा रहें उन पर अत्यधिक ऊर्जा व समय नष्ट करने से बेहतर है आप उन कामों को पहले कीजिए जिसमें आप निपुण हों। ऐसा करने से आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा और आपको मुश्किल कामों को अंज़ाम देने के लिए आवश्यक उर्जा भी हासिल होगी।

कृतज्ञता का अभ्यास कीजिए। रोज सोने से पहले उन बातों के बारे में सोचिए जिनके प्रति आप कृतज्ञ हैं। जब आप उन चीजों की गिनती करने के लिए समय लेते हैं,जो आपको हासिल हैं तो आप यह महसूस करते हैं कि आपका जीवन वास्तव में बहुत सी चीजों से भरा हुआ है। बस आपका दिमाग ही बहुत व्यस्त है यह सब देख पाने के लिए।

कुछ नया सीखिए और अपने साथ पहले से अधिक समय व्यतीत कीजिए पहली बार में यह थोड़ा अजीब सकता है लेकिन अपनी खुद की कंपनी का आनंद लेने के लिए यह सीखना महत्वपूर्ण है । यह अपने स्वयं के विचारों और जरूरतों को जानने और समझने का एक अच्छा तरीका है।

यह कुछ उपाय हैं जिनकी सहायता से अच्छी आदतों को अपनाकर सही रास्ते पर वापस लौटा जा सकता है। जीवन अनमोल है इसकी परवाह कीजिए। जो सोचते हैं उस पर अमल भी कीजिए। उम्मीद है यह साल आपके लिए और खुशियां लाएगा एवं इस वर्ष मिलने वाले अनुभवों से आप और अधिक निखरेंगे और बेहतर बनेंगे।

जो सोचते हैं उस पर अमल भी कीजिए

एेसा कई बार होता है कि हम अपनी बुरी आदतों से पीछा छुड़ाना चाहते हैं पर उनहें छोड़ नहीं पाते हैं। सिगरेट, शराब और नशे का सेवन करने करने वालों में यह बात आए दिन चरितार्थ होती है। पारिवारिक दबाव, शरीर की बर्बादी, पारिवारिक क्लेश, बदनामी जैसे कारणों के कारण लोग नशे जैसी बुरी आदतों को छोड़ना भी चाहते हैं, पर जब तलब लगती है, तब सब सोचा समझा बेकार हो जाता है। आदत उभर आती है और अपना काम करने लगती है।

बार – बार आदत को छोड़ने का संकल्प लेना और समय आने पर उसे पूरा न कर पाने से मनोबल टूटता है। बार – बार टूटने से मनोबल इतना कमजोर हो जाता है कि हमें यह विश्वास ही नहीं होता कि हम बुरी आदतों को छोड़ भी सकते हैं। हमें लगने लगता है कि इन आदतों के साथ जीना ही अब हमारी नियति है।

यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है कि जो मनुष्य सामान्य जीवन में अपनी मर्जी के अनुसार सोचता है, काम करता है, अड़चनों और बाधाओं से निपटता है वही मनुष्य जब बुरी आदतों को छोड़ने की बात आती है तो वह खुद को असहाय और लाचार महसूस करने लगता है।

जिंदगी में तमाम एेसी बातें होती हैं, जिन्हें बुद्धि – विवेक के आधार पर हर कोई अस्वीकार करता है पर जब समय आता है तो सोचने का वही पुराना ढर्रा हावी हो जाता है और वही सब करना पड़ता है जिसको न करने की बात न जाने कितनी बार सोची थी, रिश्वत और खर्चीली शादियां इस सोच का ही परिणाम हैं।

साहस और इच्छाशक्ति की कमी ही वे मुख्य कारण हैं जिनकी वजह से बुरी आदतों को छोड़ने में हम सफल नहीं हो पाते हैं। जब नये लड़के सेना में भर्ती होते हैं तो वे सेना के अनुशासित जीवन के प्रति अभ्यस्त नहीं होते हैं लेकिन कुछ समय के पश्चात ही वे सेना के अनुशासित जीवन के साथ तालमेल बैठा लेते हैं। लड़की भी शादी के बाद अपना घर छोड़कर ससुराल में जाती है और शीघ्र ही वहां के अनभ्यस्त ढांचे में ढल जाती है।

ये उदाहरण हमें बताते हैं कि मजबूत इच्छाशक्ति और लगातार अभ्यास के साथ हमारे चारों ओर का माहौल भी हमें पुरानी आदतों को छोड़कर नयी आदतों को अपनाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह बात बुरी आदतों को छोड़ने के विषय में भी सत्य है। मजबूत इरादों और लगातार कोशिश करने के साथ साथ हमें बुरी लत वाले लोगों की संगत को भी छोड़ने का प्रयास करना चाहिए,अच्छी किताबों और अच्छे साहित्य का अध्ययन भी बुरी आदतों को छोड़ने में हमारी मदद करता है।

यह कुछ उपाय हैं जिनकी सहायता से बुरी आदतों को छोड़कर सही रास्ते पर वापस लौटा जा सकता है। जीवन अनमोल है इसकी परवाह कीजिए। जो सोचते हैं उस पर अमल भी कीजिए।