हर वर्ष कुछ कहता है

इस साल के समाप्त होने में अब कुछ घंटे ही शेष हैं। सारी दुनिया पलकें बिछाकर नये साल के स्वागत में लगी हुई है। सभी के मन में बीते साल से बिछुड़ने की पीड़ा भी है और नये साल की नयी उम्मीदों से मिलने का उत्साह भी। एेसे में शायद यह सही समय है इस बात का अवलोकन करने का कि बीते हुए साल में हमने क्या खोया और क्या पाया।

कहते हैं कि समय इंसान को सब कुछ सिखा देता है बीते हुए साल ने भी बहुत कुछ सिखाया जिसे यहां साझा करके गुजरते हुए साल को विदा करना चाहता हूं।

इस वर्ष ने सिखाया है कि चीजें हमेशा वैसी नहीं होती हैं जैसा कि आप सोचते और चाहते हैं। यह भी अनुभव मिला है कि गलतियां होने का अर्थ यह नहीं है कि आपकी कोशिशें व्यर्थ थीं। यह भी सीखा कि कुछ टूटी हुई चीजें फिर दुबारा नहीं जुड़ती हैं। और मुश्किल वक्त से निकलने में आपके सच्चे मित्र एवं आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति ही सहायक साबित होती है।

इस साल ठोकरें खा कर यह भी सीखा कि जब आपको स्वयं अपनी क्षमताओं पर संदेह होने लगे तो बस पीछे मुड़कर यह देख लीजिए कि आपने अब तक क्या और कैसे हासिल किया है? एेसे समय पर खुद को याद दिलाइये उन लड़ाइयों के बारे में जिन्हें आपने जीता है और उन डरों को याद कीजिए जिन पर विजय प्राप्त करके आप यहां तक पहुंचे हैं।

यह साल जाते-जाते यह भी बता गया कि यह महत्वपूर्ण नहीं है कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं बल्कि उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप स्वयं अपने विषय में क्या विचार रखते हैं। इस साल यह भी जाना कि अंत में यह महत्व नहीं रखता कि आपने क्या खोया और क्या पाया बल्कि महत्व यह रखता है कि आपने किसी को कैसे खोया,और किसी को कैसे पाया।

कुछ ही घंटों में यह वर्ष घड़ी एवं कैलेण्डरों में हमेशा के लिए गुजर जाएगा। उम्मीद है कि इस वर्ष के खट्टे-मीठे अनुभवों से आपने बहुत कुछ सीखा होगा और यह कामना है कि आने वाला वर्ष के अनुभव आपको और बेहतर बनाएंगे।

कुछ बातें जिन्हें जान लेना अच्छा है

आनंद सुख एवं दुख से परे मन की एक अलग अवस्था है। सुख और दुख दोनों में एक समान बात यह है कि दोनों में ही उत्तेजना की प्रधानता होती है। हम स्वयं को अच्छी लगने वाली उत्तेजना का सुख एवं अप्रिय लगने वाली उत्तेजना का दुख के रूप में अनुभव करते हैं।

सुख चाहने वाला दुख में निरंतर पड़ता रहता है क्योंकि एक उत्तेजना के बाद दूसरी विपरीत उत्तेजना का आना वैसे ही अनिवार्य है जैसे दिन के बाद रात का और रात के बाद दिन का आना सुनिश्चित होता है। आनंद इन दोनों प्रकार की उत्तेजनाओं से पूरी तरह से भिन्न है, यह उत्तेजना की नहीं बल्कि आनंद की अवस्था है।

जीवन सब जीते हैं पर कितने लोग इसके प्रति सजग और सतर्क होते हैं? अधिकांश लोग जीवन में अपने उद्देश्य से अपरिचित होते हैं और लगभग बेहोशी में जीते चले जाते हैं। हममें से ज्यादातर लोगों के पास आत्मबल का आभाव होता है जिसके कारण समस्याओं को देखकर हम घबराते हैं और उनका सामना करने के बजाय हम उनसे भागते हैं या फिर बचने के उपाय में लग जाते हैं।

जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग ही जीवन का महामंत्र है। जीवन का सदुपयोग भी तभी संभव है जब जीवन के प्रति दृष्टिकोण सकारात्मक हो और सकारात्मक विचारों के क्रियान्वयन के लिए प्रबल पुरूषार्थ किया जाए। सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करके दूसरों को आकर्षित तो किया जा सकता है पर स्वयं खुद को समझाने के लिए यह पर्याप्त नहीं होती हैं।

किसी भी बात या सिद्धांत की सार्थकता उसकी व्यावहारिक अनुभूति में ही है। जब तक किसी बात को अपने जीवन में उतारकर उसके अच्छे-बुरे अहसास से गुजर नहीं लिया जाता है तब तक उसकी सार्थकता सिद्ध नहीं होती है। सिद्धांतों के साथ उसकी अनुभूति का होना जरूरी है। यह सही है कि अच्छी बातों की श्रेष्ठता में कोई संदेह नहीं होता है पर अच्छे कर्मों को उनसे भी श्रेष्ठ माना जाता है।

कभी खुद से भी बातें कीजिए

जब हम किसी दूसरे व्यक्ति को कोई सुझाव देते हैं तब हमें यह लगता है कि इससे उस व्यक्ति की समस्या का समाधान हो जाएगा। पर जब हम स्वयं जीवन में किसी समस्या में उलझते हैं तब अक्सर खुद को समझा नहीं पाते हैं। सुझाव हमेशा दूसरों को दिया जाए यह जरूरी नहीं जरूरत पड़ने पर हम खुद को भी समझा सकते हैं। खुद को सुझाव देना ही आत्मसुझाव कहलाता है।

हम जिदंगी में जो कुछ भी सोचते हैं या करते हैं उसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव हमारे अवचेतन मन पर पड़ता है। अपने ऊपर पड़ने वाले विचारों एवं कर्मो के प्रभावों की तीव्रता के अनुरूप हमारा अवचेतन मन तुरंत अथवा विलंब से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है जिसकी अनुभूति हमें क्रोध, भय, घबराहट अथवा प्रेम, शांति और खुशी आदि के रूप में होती रहती है।

जब हम किसी बात या विचार को बार-बार दोहराते हैं तब वह बात या विचार हमारे अवचेतन मन में गहराई से बैठ जाती है। इसकी प्रतिक्रिया विभिन्न परिस्थितियों में हमारे द्वारा किये जाने वाले व्यवहार के रूप में अभिव्यक्त होती है।

यदि मुश्किल परिस्थितियों से घिरा हुआ कोई व्यक्ति लगातार खुद को यह समझाता रहे कि परेशानियां और समस्याएं अस्थायी हैं और वह मुश्किलों का सामना करके एक दिन सफल होकर रहेगा तो यह बात उसके अवचेतन मन में घर कर जाती है और एेसा व्यक्ति प्रतिकूल समय में भी प्रयास करना नहीं छोड़ता है और अंततः परिस्थितियों को काबू में कर लेता है।

यह बात ध्यान में अवश्य रखनी चाहिए कि खुद को दिये जाने वाले सुझाव हमेशा व्यावहारिक व सकारात्मक हों क्योंकि सकारात्मकता में ही वह ताकत है जो हमारी क्षमताओं और आत्मविश्वास को बढ़ाती है। यदि हम आत्मसुझाव को अपनी आदत में शुमार कर लें तो हमारे अवचेतन मन की शक्तियां भी सुझाव की प्रकृति के अनुरूप काम करने लगती हैं।

कभी-कभी खुद से भी बातें कीजिए क्योंकि आपको आपसे बेहतर कोई नहीं जानता और समझता है।

जब अंधेरा होता है….

जिंदगी में अनेक अवसर एेसे आ जाते हैं जो पूरी तरह से अप्रत्याशित और प्राकृतिक नियमों के विपरीत दिखाई देते हैं। एक इंसान जो अच्छे कर्म करता है और बुराई से दूर रहता है उसके ऊपर अचानक एेसी घोर विपत्ति आ जाती है कि मानो उसे किसी बड़े भारी अपराध की सजा मिल रही हो। एक दूसरा व्यक्ति बुरे से बुरे कर्म करता है पर हर प्रकार के सुख और सौभाग्य उसे प्राप्त होते हैं। एक व्यक्ति थोड़ी सी मेहनत करके ही बड़ी सफलता प्राप्त कर लेता है वहीं दूसरा व्यक्ति कड़ी मेहनत करने और सही रास्ते पर चलने के बावजूद असफल रहता है।

जीवन में एेसे मौकों के आने पर हममें से अधिकांश लोग बहुत भ्रमित हो जाते हैं और अनेक एेसी धारणाएं बना लेते हैं जो जीवन के लिए बहुत घातक सिद्ध होती हैं। कुछ लोग ईश्वर पर कुपित हो जाते हैं और अपनी दुर्दशा के लिए उसे जिम्मेदार ठहराते हैं तो कई नास्तिक हो जाते हैं। कुछ लोगों को लगने लगता है कि अब कर्मों को करने का कोई फायदा नहीं जो भाग्य में लिखा होगा सो होकर रहेगा। एेसे अवसरों पर हममें से ज्यादातर लोग भाग्य की वेदी पर कर्मों की बलि चढ़ा देते हैं।

मुश्किल अवसरों पर हमारी एेसी सोच हो जाने का मुख्य कारण भाग्य के संबंध में हमारे मन में जमी हुई गलत धारणाएं हैं। बात को सही ढंग से न समझ पाने के कारण ही हमारे मन में एेसी बातें घर कर जाती हैं। जिंदगी में होने वाली आकस्मिक दुर्घटनाओं पर जब हमारा वश नहीं चलता है और अनचाहे प्रसंग सामने आ खड़े होते हैं तो हमारे मन में बड़ा विक्षोभ उत्पन्न होता है और हम सही – गलत की समझ खो बैठते हैं। सामने तो कोई दोषी दिखाई नहीं पड़ता है पर चोट लगने के कारण मन में रोष उत्पन्न होता है जिसके कारण हम आवेश में आकर दूसरों या फिर ईश्वर को अपनी विपत्तियों के लिए उत्तरदायी ठहराने लग जाते हैं। कर्मों की

कहते हैं कर्मों की गति गहन होती है जिसे समझ पाना मुश्किल है। किसी विषय की जानकारी न होने एवं गलत जानकारी होने में फर्क होता है। गलत धारणाएं जब हमारे जीवन में घुसकर गहरी पैठ बना लेती हैं तो जीवन का प्रवाह उल्टा और विकृत हो जाता है। सकारात्मक सोच रखकर लगातार कर्म करते रहना ही हमारे हाथ में है और यही जीवन जीने का सही नजरिया भी है। उम्मीद का दामन कभी मत छोड़िए क्योंकि जब तक साँस है तब तक आस है।

उम्मीदें कुछ बाकी हैं….

समय की बर्बादी का अर्थ है अपने जीवन को बर्बाद कर लेना। जीवन के जो पल यों ही आलस्य अथवा उन्माद में खो जाते हैं वो फिर कभी वापस लौटकर नहीं आते हैं। जिंदगी में सभी के पास समय सीमित है। जीवन के प्याले से समय की जितनी बूंदें छलक जाती हैं, प्याला उतना ही खाली रह जाता है। प्याले की वह रिक्तता फिर किसी भी तरह से भरी नहीं जा सकती है।

जीवन में हर एक पल एक नई संभावना को लेकर आता है। हर घड़ी एक बड़े बदलाव का समय हो सकती है। हमें यह पता नहीं होता है कि समय के जिस क्षण को हम व्यर्थ में खो रहे हैं वह पल ही हमारे भाग्य को बदलने वाला साबित हो सकता है।

कहते हैं कि समय की चूक ही पश्चाताप की हूक बन जाती है। जीवन में कुछ करने की इच्छा रखते हैं तो फिर भूल कर भी अपने किसी कार्य को, जो आज किया जाना चाहिए, कल पर मत टालिए। यह समझना आवश्यक है कि आज के काम के लिए आज का ही दिन निश्चित है और कल के कामों के लिए कल का दिन निर्धारित है।

गलतियां करना उतना बुरा नहीं है जितना कि गलतियों से सबक न लेकर उन्हें बार – बार दोहराते रहना है। गिनती गिनने में चूक हो जाने पर दोबारा नये सिरे से गिनना आरंभ करने में किसी समझदार को संकोच नहीं करना चाहिए। भूल समझ में आने पर उल्टे पैर लौट आने में भी कोई बुराई नहीं है।

यह सत्य है जो समय को नष्ट करते हैं, समय भी उनको नष्ट कर देता है परंतु यह भी सही है कि जो अपनी गलतियों से सबक लेकर आगे बढ़ने का साहस करते हैं उन्हें जिंदगी भूल सुधारने का एक दूसरा मौका जरूर देती है। आप की कोशिशें यदि सच्ची और सही हैं तो देर से ही सही पर यह दुनिया आपको रास्ता अवश्य देगी।

खुद को हल्के में मत लीजिए

भय और शक जिसके मन में जम जाते हैं वे हर वक्त उसे डराते रहते हैं, असफलता, भय और आशंका ही उन्हें हर तरफ दिखाई देती है। एेसे लोग अपने लिये कोई काम चुन नहीं पाते हैं। ये जो भी करते हैं उसमें सन्तुष्ट नहीं रहते, अपने काम को तुच्छ, निन्दनीय और हानिकारक मानते हैं और उसे छोड़ने की बात बार-बार कहते रहते हैं पर छोड़ भी नहीं पाते। क्योंकि नया कदम उठाने लायक साहस उनमें नहीं होता है। प्रत्येक काम में कोई नुक्स निकालने वाले, हर किसी की आलोचना करने वाले एेेसे व्यक्ति अपनी आन्तरिक दुर्बलता का ही परिचय देते हैं।

अपरिपक्व इंसान का एक चिन्ह यह भी है कि वह सदा अपने बारे में ही सोचता रहता है। एेसा व्यक्ति दूसरों से जब भी बात करेगा अपना रोना रोएगा, अपनी शेखी बघारेगा। वह यह भूल जाता है कि दूसरों के पास हमारा रोना- गाना सुनने की न तो फुरसत है और न ही उसमें उनकी कोई दिलचस्पी होती है। हर आदमी अपनी जिम्मेदारियों से लदा हुआ है, उसे दूसरे की सहानुभूति या सहायता चाहिए। यह जानते हुए भी जो लोग अपनी राम कहानी ऐसे लोगों को सुनाते हैं जो उसको हल नहीं कर सकते तो यह सब एक तरह से उनका और अपना समय नष्ट करना ही है।

लोगों के हाथों हमें अपनी खुशी एवं शांति बेच नहीं देनी चाहिए। कोई प्रशंसा करे तो हम प्रसन्न हों और निन्दा करने लगे तो दुखी हो जाएं? यह तो पूरी पराधीनता हुई। हमें इस संबंध में पूरी तरह से अपने ही ऊपर निर्भर रहना चाहिए और निष्पक्ष होकर अपनी समीक्षा करने की हिम्मत जुटानी चाहिए। यदि निन्दा से चोट पहुंचती हो तो हमें अपनी नजरों में अपने कामों को ऐसे घटिया स्तर का साबित नहीं होने देना चाहिये जिसकी निन्दा करनी पड़े। यदि प्रशंसा चाहते हैं तो अपने कार्यों को प्रशंसनीय बनाना होगा।

यह खेद का विषय है कि हम प्रतिदिन के जीवन में विचार शक्ति का बहुत अपव्यय करते हैं। जितनी शक्ति फालतू की बातों में बर्बाद होती है उसके थोड़े से भाग को भी हम यदि उचित रीति से इस्तेमाल कर सकें तो स्वभाव तथा आदतें आसानी से बदली जा सकती है। जब हमारे विचार नीचे से ऊपर की ओर चढ़ते हैं तो मनुष्य स्वयं अपना मित्र बन जाता है। वहीं जब विचारों की दिशा जब ऊपर से नीचे की तरफ गिरती है तो हम अपने शत्रु आप ही बन जाते हैं।

याद रखिये दूसरा दूसरों को न तो खींच सकता है और न दबा सकता है। बाहरी दबाव क्षणिक होता है। बदलता तो मनुष्य अपने आप ही है, अन्यथा रोज उपदेश-प्रवचन सुनकर भी इस कान से उस कान निकाल दिये जाते हैं।

निराशा के उस पार चलिए

सपने देखना मनुष्य की स्वाभाविक फितरत है। अक्सर हम अपनी क्षमता और अपने चारों ओर की परिस्थितियों का वास्तविक आकलन किये बगैर ही मन की चंचलता के वशीभूत होकर अनेक काल्पनिक योजनाओं के पूरा होने का सपना देखते रहते हैं।

जब किसी के मन में किसी चीज को पाने की तीव्र इच्छा हो पर अक्षमता, परिस्थितियों या भाग्यवश उसकी यह इच्छा अधूरी रह जाए तो मन के भीतर जिस घुटन, बेचैनी या झुंझलाहट का उदय होता है उसे ही निराशा कहते हैं।

अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, मान-सम्मान पाने की तीव्र इच्छा, जीवन में मिलने वाली असफलताएं, रिश्तों की टूटती हुई डोर आदि हमारे जीवन को निराशा के गहरे अंधकार में ढकेल देती हैं। एकांतप्रियता, गुमसुम रहना और नकारात्मक विचारों की प्रधानता हमारे व्यक्तित्व को बांध देती है। साथ ही नींद न आना , शुगर, हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।

भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि तेरा कर्म करने पर ही अधिकार है उसके फल पर नहीं। इसलिए लक्ष्य प्राप्ति के लिए किये गये संघर्ष को जीवन की सहज प्रक्रिया मानकर स्वीकार कीजिए। जिंदगी में सपनों को देखना मत छोड़िये पर अपनी क्षमताओं का सही मूल्यांकन कर उसके अनुरूप लक्ष्यों को फिर से निर्धारित कीजिए।

निराशा व्यक्ति की प्रबल शत्रु है यह हमारी प्रतिभा और गुणों का ह्रास करती है। हमेशा सोच को सकारात्मक रखिये। दिनचर्या को नियमित कीजिए और अच्छा साहित्य पढिये। बच्चों के साथ खेलिये और प्रकृति के सानिध्य में कुछ समय बताइये, यह सब आपको फिर से ऊर्जा और संभावनाओं से भर देगा।

कुछ बातें जो हमें समझनी चाहिए

दुनिया में दिखाई देने वाली हर चीज़, हर वस्तु के तीन आयाम होते हैं। यह तीन आयाम हैं – लंबाई, चौड़ाई और गहराई। हमारा मन भी त्रिआयामी है। हमारे मन के तीन आयाम चेतन, अचेतन और अतिचेतन हैं। मन की संरचना भी किसी भौतिक पदार्थ की भांति ही है बस फर्क इतना है कि मन सूक्ष्म होता है इसलिए दिखाई नहीं देता है जबकि भौतिक पदार्थ स्थूल होते हैं इसलिए दिखाई पड़ते हैं।

हमारा सामान्य जीवन क्रम मन की चेतन अवस्था से संबंधित होता है। हमारी दिनचर्या से जुड़े सभी कार्य चेतन मन से संचालित होते हैं। हमारी नींद व सपनों का संबंध अचेतन मन से है जब हम सो जाते हैं तब हमारा अचेतन मन जाग्रत रहता है। मन का अतिचेतन स्तर अत्यधिक सूक्ष्म है जिसका संबंध ध्यान, आंनद और निस्वार्थ भावना से होता है।

मन की संरचना काफी हद तक समुद्र में डूबी हुई विशालकाय बर्फ की चट्टान के जैसी होती है जिसका कुछ हिस्सा सतह के ऊपर होता है जिसे हम देख पाते हैं हालांकि यह संपूर्ण चट्टान का बहुत छोटा हिस्सा होता है इसे हम चेतन मन कह सकते हैं।

बर्फीली चट्टान का शेष भाग पानी में डूबा रहता है। इसे हम तब तक नहीं देख पाते हैं जब तक हम स्वयं गहराई में न जाएं। चट्टान के इस हिस्से की तुलना अचेतन मन से की जा सकती है। कठिन होता है अचेतन तक पहुंच पाना।

इन दो हिस्सों के अतिरिक्त बर्फीली चट्टान का एक हिस्सा वाष्प बन जाता है और आकाश में छोटे-छोटे बादल बनकर मंडराने लगता है। यही अतिचेतन मन है। उस बादल तक पहुंच पाना करीब – करीब असंभव है यही कारण है कि ध्यान कठिन है और समाधि दुसाध्य है।

जागरण व चिंतन की घटनाएं चेतन मन में सम्पन्न होती रहती हैं। जब हम गहरी नींद में होते हैं और चेतन मन शांत होता है जाता है तब अचेतन मन क्रियाशील होता है। जब अचेतन मन भी शून्य हो जाता है तब अतिचेतन में प्रवेश मिलता है हालांकि यह अवस्था बिरलों को ही प्राप्त हो पाती है।

किसी ने जग में करी बुराई, किसी ने जग में करी भलाई

भलाई के काम में बस एक ही कमी है कि अच्छे कार्यों का फल मिलने में हमेशा थोड़ा अधिक समय लगता है। भलाई की गति हमेशा मंद, स्थिर और शांत होती है। अच्छे कामों के फल भले ही देर से मिलते हों पर उनके प्राप्त होने में किसी तरह का कोई संदेह नहीं होता है।

भलाई के विपरीत बुराई हमेशा जल्दी विकसित होती है। बुराई का एक छोटा सा अंकुर भी बड़ी तेजी से फैलता है और हमारे समूचे व्यक्तित्व को अपने आगोश में ले लेता है। बुराई जल्दबाज होने के कारण उत्तेजना पूर्ण होती है और बार – बार लौटकर आती है एवं हमें दुख देती रहती है।

वासना अंतहीन होती है इसका कहीं कोई अंत नहीं है। वासना हमें तृप्ति का भरोसा दिलाती है पर वास्तव में यह अतृप्ति को और गहरा करती है। इसके पीछे भागने के लिए आंखों का बंद होना जरूरी है। हम बार-बार वहीं पहुंच जाते हैं जहां से हम चले थे। हम दोबारा फिर से वहीं से चलना प्रारंभ करते हैं और हर बार वहीं पहुंच जाते हैं।

बुराई के पीछे भागने वालों की दशा भी कुछ ऐसी होती है जो जीवन पर्यन्त यह जान ही नहीं पाते हैं कि जिस मार्ग पर वे चल रहे हैं उसका कोई अंत नहीं है। यह एक एेसी भूलभुलैया है जो बस गोल-गोल घुमाती है पहुंचाती कहीं नही है।

बुराई और उसके दुष्परिणामों का चिंतन करना और उससे बचना बहुत आवश्यक है। जिस तरह हम शरीर, वस्त्र एवं घर की नियमित सफाई करते रहते हैं उसी तरह बुरे विचारों का परिमार्जन भी करते रहना भी जरूरी है।

वासनाओं के पीछे चलकर भला कोई कब, कहां पहुंचा है? इस राह पर न तो तृप्ति है और न ही शांति। कम ही एेसे
सौभाग्यशाली होते हैं जो अपने जीवन में इस भटकाव से उबर कर विवेक का अनुसरण करने लगते हैं।

विवेक ही एकमात्र उपाय है बुराई एवं वासनाओं के आकर्षण से बचने का। विवेक के सम्मुख वासना कहीं ठहर नहीं पाती है और सूर्य की किरणों में ओस की बूंद के समान तिरोहित हो जाती है। जो होश में और आंखें खोलकर जीवन की राहों पर चलने का साहस करते हैं वे अपने विवेक को स्वतः ही पा लेते हैं। विवेक के उदय होने पर हमें यह पता चल जाता है कि हम किस रास्ते पर हैं और हमारी मंजिल कहां है?

यूं ही कट जाएगा सफर…

आज हर इंसान बहुत व्यस्त है। हर कोई अपने काम में लगा हुआ है, उसे पूरा करने में जुटा हुआ है। लेकिन कार्य हैं कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेते, एक काम खत्म होता नहीं कि दूसरे कई कार्य सामने आ जाते हैं। इस तरह काम करते रहने का अंतहीन सिलसिला जीवन भर चलता रहता है। लेकिन क्या ये काम हमारे उत्साह और आनंद को बढाते हैं या फिर हमें तनाव और परेशानी से भर देते हैं?

संसार में जीवित रहने के लिए कमाना जरूरी है और कमाने के लिए काम करना जरूरी है। अपनी व अपनों से जुड़े हुए लोगों की इच्छाओं को पूरा करने के लिए भी काम करना जरूरी है। लेकिन यह भी सत्य है कि काम की व्यस्तता और उससे उपजा तनाव आज हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है।

जिंदगी में हर कोई खुशियां, शांति और सुकून के पल चाहता है लेकिन आज हमारे काम करने का तरीका ही कुछ एेसा है जिससे हमारे जीवन से सुकून, शांति और खुशियां कोसों दूर होते जा रहे हैं।

काम की व्यस्तता में हम स्वयं को भूल से गए हैं और खुद से ही अनजान बनते जा रहे हैं। हमारा परिचय तो बस संसार के उन आकर्षणों से रह गया है जिन्हें हम पाना चाहते हैं लेकिन जिसे पाकर भी हम कभी तृप्त नहीं हो पाते हैं।

मनुष्य अपने जीवन में इतना श्रम करता है लेकिन उसके बाद भी जीवन से संतुष्ट नहीं हो पाता है। जिंदगी हमें वह खुशियां नहीं दे पाती है जो स्थायी हों बस कुछ पलों की खुशी के लिए हम भटकते रहते हैं और कार्यों में उलझे रहते हैं।

एेसी स्थिति में खुशियों को पाने का बस एक ही तरीका है कि जीवन के हर पल में, हर कार्य में इसे खोज लिया जाए। हमारा लक्ष्य यह बन जाए कि हमें खुशी या आनंद की प्राप्ति के लिए कोई कार्य नहीं करना है बल्कि अपने हर कार्य में ही आनंद को ढूंढ निकालना है। जिसने जीवन में यह कला सीख ली उसका जीवन सच में खुशियों से भर जाता है।

जब मन में उत्साह होता है तो उस उत्साह में व्यक्ति बहुत सा कार्य कर लेता है। काम को नये तरीकों और नए ढंग से करने पर तनाव भी कम होता है एवं रचनात्मकता भी बढ़ती है। एेसे कार्य पूर्ण पर औरों को भी पसंद आते हैं और हमें स्वयं भी आनंद मिलता है। यह सत्य है कभी-कभी दर्द भी दवा बन जाता है।