मुश्किलों से कह दो मेरा खुदा बड़ा है

अपने जीवन के सामान्य क्रम में हम दूषित ऊर्जाओं एवं नकारात्मक तत्वों के संपर्क में आते रहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि दूषित नकारात्मकता का यह प्रदूषण हमारे विचारों, हमारी भावनाओं और हमारी जीवनशैली में घुल-मिल जाता है। इसकी झलक हमारे व्यवहार एवं कार्यों में भी दिखाई पड़ती है। इस प्रकार पहले मन रोगी बनता है फिर शरीर भी रोगी बन जाता है।

मन के कारण शरीर में जो बीमारियां उत्पन्न होती हैं उन्हें साइकोसोमेटिक डिसआर्डर कहते हैं। साइको अर्थात मन और सोमा का मतलब होता है शरीर। सामान्य रूप से हम एक मानसिक व्यवस्था में जीते हैं पर जब यह व्यवस्था टूटती है तो इससे शरीर एवं मन में एक अव्यवस्था पैदा होती है जिसका असर तन और मन दोनों पर होता है।

कई बार एेसा होता है कि सब कुछ वैसे का वैसा ही होता है हम वही भोजन करते हैं एवं वही जीवनशैली जीते हैं फिर भी हम स्वयं को थका हुआ, कमजोर और बीमार महसूस करते हैं। एेसा इसलिए होता है क्योंकि कभी-कभी शरीर एवं मन में एेसी विसंगतियां पैदा हो जाती हैं जिसके कारण सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह से हमारा संपर्क टूट जाता है। बाहरी जीवन के घटनाक्रम में कोई परिवर्तन न होने पर भी हमारे आंतरिक जीवन में विचलन आ जाता है।

जो बिगड़ गया है उसे फिर से सहेजना, जो असंतुलित हो गया है उसे फिर से संतुलित करना, जो भटक गया है उसे फिर से रास्ता दिखाना इसमें ही जीवन की सार्थकता और सीख है। यूं तो अव्यवस्थित जीवन को व्यवस्थित करने के अनेक उपाय एवं रास्ते हैं पर मेरी समझ से इन उपायों में से जो उपाय सबसे कारगर साबित होता है उसका नाम प्रार्थना है।

हमें यह बात समझनी चाहिए कि प्रार्थना और याचना में फर्क होता है। याचना का उद्देश्य हमेशा दूसरों से कुछ हासिल करना होता है जबकि प्रार्थना में हमारी चाहत सिर्फ मार्गदर्शन प्राप्त करने की होती है जिसके बाद हम सही रास्ते पर चलकर अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न और पुरूषार्थ करते हैं।

सच्चे और पवित्र मन से की गई प्रार्थना में बड़ी शक्ति होती है। प्रार्थना से हमें अपने आंतरिक एवं वाह्य जीवन में नई ऊर्जा प्राप्त होती है और मन में जमा हुई नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होने लगती है। धीरे-धीरे हमारे विचार पुनः सकारात्मक होकर शक्तिशाली हो जाते हैं और खोये हुए आत्मविश्वास को फिर से प्राप्त कर लेते हैं।

जैसे ही हमारी चेतना नकारात्मक तत्वों से मुक्त होती है वैसे ही हम पर रोगों का प्रभाव भी कम होने लगता है और हमारे भटके हुए जीवन को एक दिशा मिल जाती है। यह सत्य है कि जीवन में कभी न कभी हर इंसान को दवा के साथ दुआ की भी जरूरत होती है।

ये सफर बहुत है कठिन मगर

जिन्दगी की राहों जब हम आगे बढते हैं तो मार्ग में हमें कहीं न कहीं ठोकर जरूर लगती है ये ठोकरें न केवल हमें चोटिल करती हैं बल्कि हमारे मनोबल को भी तोड़ देती हैं। जीवन में अनेक परिस्थितियां हमारे सामने एेसी आ जाती हैं जिनसे हमारी भावनाएं आहत होकर लहुलुहान हो जाती हैं और हमारे लिए एक-एक कदम उठाना भी मुश्किल हो जाता है।

जीवन की एेसी परिस्थितियों में ठहरना बिलकुल उचित नहीं है बल्कि उनसे उबरकर आगे बढ़ना अत्यंत जरूरी होता है अन्यथा हमारा आंतरिक विकास वहीं अवरूद्ध हो जाता है।

ये इन्सान की फितरत है कि अक्सर हम उन बातों को ही अधिक याद करते हैं जो हमें चोट पहुंचाती हैं लेकिन उन बातों में ही अटक कर रह जाना कुछ एेसा है जैसे ठहरा हुआ पानी। जीवन के कडुए अनुभव भी कुछ समय बाद अतीत बन जाते हैं फिर उन्हें बार—बार याद करके हम अपने वर्तमान को ही दुखद बनाते हैं। मुश्किल समय से सीख लेकर व्यक्तियों और परिस्थितियों को माफ करते हुए हमें आगे बढ़ जाना चाहिए।

जिस तरह किसी नाटक की कहानी में अच्छे-बुरे सभी तरह के पात्र होते हैं जिनके बिना न तो कहानी आगे बढ़ती है और न ही नाटक में आनंद आता है। उसी तरह हमारा जीवन भी एक नाटक की भांति है जिसमें स्वतः ही अच्छी व बुरी परिस्थितियां आती रहती हैं और हमारे जीवन को सुखी व दुखी बनाती रहती हैं। हमें इन्हें स्वीकार करना चाहिए और जीवन में आगे बढ़ने की कला सीखनी चाहिए।

सकारात्मक चिंतन की बात तो सभी करते हैं लेकिन यह भली भांति समझते हैं कि यह इतना भी आसान नहीं है। चिंतन को सकारात्मक बनाने के आरंभिक प्रयासों में हम कितना भी अच्छा सोचने और करने का प्रयास करते हैं पर फिर भी इन प्रयासों में बाधाएं आती हैं जिनसे घबराकर और परेशान होकर हम प्रयास करना छोड़ देते हैं।

जिस प्रकार राह में आने वाले हर कंकड़ पत्थर को बीन कर हम हटा नहीं सकते हैं लेकिन पावों में जूते पहनकर उनसे अपनी रक्षा कर सकते हैं उसी तरह जिदंगी में परेशान करने वाली हर बाधा को हम दूर नहीं कर सकते हैं परंतु अपने मन – मस्तिष्क को इतना सशक्त बना सकते हैं कि परिस्थितियां बार – बार उन्हें चोटिल न पाएं और हमारे आत्मविश्वास को पग – पग पर डिगा न सकें।

खोदी खाई को पाटना ही प्रायश्चित है

कई बार ऐसा होता है जब मनुष्य जानबूझकर या फिर अनजाने में ही कुछ अनुचित कार्य कर बैठता है। ये बुरे कार्य न सिर्फ उसकी आत्मिक प्रगति एवं व्यक्तित्व के विकास में बाधक बनते हैं, अपितु उसकी भौतिक सफलताओं में भी अवरोध पैदा करते हैं। इस व्यथा से मुक्त होने का एकमात्र मार्ग प्रायश्चित ही है।

दुष्कर्मों एवं कुविचारों के संस्कार एक प्रकार से विषैली परतों के रूप में हमारे मस्तिष्क एवं अचेतन मन पर जमते रहते हैं। बाद में ये ही मन की चंचलता,अस्थिरता, आवेश एवं विक्षोभ के रूप में प्रकट होते हैं और व्यक्ति को विक्षिप्त जैसा बना देते हैं। ऐसी दशा में किसी भी कार्य को एकाग्रचित्त होकर नहीं कर पाने के कारण पग-पग पर असफल होना पड़ता है। हमारे असंतुलित व्यवहार से असंतुष्ट होकर अपने भी विरोधी बन जाते हैं। भटकता हुआ मन जीवन को कँटीली झाड़ियों में उलझा देता है, जहाँ केवल दुख एवं पछतावा ही हासिल होता है।

यही कारण है कि अपने अपराधों को स्वीकार कर उनके लिए प्रायश्चित करने की प्रथा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। पापों के प्रायश्चित के बिना मुक्ति तो दूर सामान्य सुखी-संतुष्ट जीवन भी संभव नहीं, इसीलिए प्रत्येक धर्म में पाप के बोध को प्रमुख स्थान दिया गया है। यह बोध सिर्फ व्यक्ति की मनोवेदना या पश्चाताप तक सीमित नहीं है, अपितु किए गए अपराध का प्रायश्चित भी इसमें शामिल है। रास्ते में खाई खोदी गई है, तो उसके लिए सिर्फ पश्चाताप या वेदना प्रकट करने मात्र से कुछ नहीं होता बल्कि उसे पाटने के लिए भी उतना ही प्रयत्न करना चाहिए, जितना खोदने के लिए किया गया था।

अपने दोषों को स्वीकार करना, उसके लिए दुःखी होना, लज्जित होना और भविष्य में इस तरह की भूलों की पुनरावृत्ति न करना, यह मनोभूमि प्रायश्चित करने वाले की होनी ही चाहिए। एक तरफ प्रायश्चित की बात सोची जाए और दूसरी तरफ उन्हीं भूलों को दुहराते रहा जाए, तो प्रायश्चित करने का प्रयोजन ही नहीं रह जाता है। सच्चे मन से किए गए प्रायश्चित से मन हल्का हो जाता है और जीवन में खोया हुआ आत्मविश्वासफिर से हासिल हो जाता है।

कुछ बातें जो हमें समझनी चाहिए

आजकल जब रमेश आफिस से वापस घर लौटाता है तो अक्सर उसका मूड खराब रहता है . वह अपने ही ख्यालों में खोया रहता है और उसकी किसी से बात करने इच्छा नहीं होती है. वह न तो बच्चों पर ध्यान दे पा रहा है न ही अपने मन की पीड़ा अपनी पत्नी के साथ शेयर कर पा रहा है. वह छोटी- छोटी बातों पर क्रोधित हो जाता है. कभी वह छोटी सी बातों पर बच्चों को झिड़क देता है तो कभी आफिस का गुस्सा पत्नी पर फूट पड़ता है.

रमेश हमेशा से एेसा नहीं था अभी कुछ दिन पहले ही उसने कंपनी बदली है कुछ दिनों तक सब कुछ ठीक चल रहा था पर जब से नया चीफ़ मैनेजर आया है रमेश की मानो दुनि‍या ही बदल गयी है. वह चिड़चिड़ा और क्रोधी हो गया है. निश्चित रूप से रमेश किसी बात से परेशान है और इसका प्रत्यक्ष असर उसके मनोबल पर और परोक्ष असर उसके पारिवारिक जीवन पर पड़ रहा है. निश्चित रूप से रमेश की कष्ट उसके साथ – साथ उसका परिवार भी भोग रहा है.

रमेश की ही तरह कोई व्यक्ति अचानक दुर्योधन कैसे बन जाता है. उसके भीतर इतनी कड़वाहट और इतना गुस्सा है कि उसे अपने पास बिखरी खुशियाँ, माता-पिता, पत्नी, बच्चे, नहीं दिखाई देते हैं. उसकी आँख सदा दूसरों के हितों पर गड़ी रहती है.उनसे तुलना करते-करते वह खुद को हीन अनुभव करने लगता है और इसके फलस्वरूप वह स्वयं को दुखी,और दुखी करता जाता है.

वर्कप्लेस में भी बहुत से दुर्योधन होते हैं. ये ऐसे कर्मचारी होते हैं जिनके भीतर हीन भावनाएं और क्रोध पनपता रहता है, जिसका निर्णय लेने की काबिलियत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. अपनी कंपनी के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करने के बजाय पर वे उस पर अपने व्यक्तित्व को थोपने लगते हैं. एेसे व्यक्ति, बड़े केबिन, बड़े पैकेज, या बड़ी टीम के लिए आपस में लड़ते हैं, बिजनेस को बड़ा करने के लिए नहीं.

उनकी आँखें ग्राहक को नहीं बल्कि खुद को ही देखती रहतीं हैं. वे हर समय दूसरों का ध्यान खींचना चाहते हैं. उन्हें सब कुछ मैनेजमेंट से मिलता है पर मैनेजमेंट या तो उन्हें देख नहीं सकता या उन्हें देखना नहीं चाहता. कर्मचारी भी या तो मैनेजमेंट को देख नहीं पाते या उसे देखना नहीं चाहते.

ऐसी ही एक कंपनी में रमेश दुर्योधन की भांति है. वह मानता है कि वह उसकी कंपनी का सबसे अच्छा सेल्स मैनेजर है. उसने गुण और मात्रा की दृष्टि से कंपनी के किसी भी दूसरे सेल्स मैनेजर से बेहतर काम किया है. लेकिन रमेश को यह लगता है कि उसका चीफ़ मैनेजर उसे देखता भी नहीं. चीफ़ मैनेजर सारे सेल्स मैनेजरों से एक समान बर्ताव करता है और सभी को समान बोनस और सुविधाएँ देता है.

चीफ़ मैनेजर का कोई चहेता सेल्स मैनेजर नहीं है. रमेश चाहता है कि उसकी ओर ध्यान दिया जाए. वह चाहता है कि उसकी सराहना हो और उसे ख़ास माना जाए. लेकिन चीफ़ मैनेजर को तो रमेश की इन भावनाओं का पता भी नहीं है. वह तो सिर्फ यह चाहता है कि उसकी टीम के सभी सदस्य प्रोफेशनल रवैये से अपना-अपना काम करें. रमेश की भावनात्मक ज़रूरतों को या तो वह देख नहीं पाता या उन्हें नज़रंदाज़ कर देता है.

रमेश के साथ-साथ कंपनी को भी रमेश के भीतर पनपती विषमताओं और क्रोध का खामियाजा भरना पड़ता है. सभी यह आश्चर्य करते हैं कि रमेश भी औरों की तरह प्रोफेशनली अपना काम पूरा करके शांति से घर क्यों नहीं जाता. वे यह भूल जाते हैं कि रमेश कोई मशीन नहीं है. उसकी भी कुछ भावनात्मक ज़रूरतें हैं. वह चाहता है कि उसके काम को सराहकर उसे महत्वपूर्ण समझा जाए.

कुछ लोग रमेश की इस सोच को अतार्किक और फ़िज़ूल कह सकते हैं पर यह सोच उसके भीतर गहरी पैठ बना चुकी है. हम हमेशा ही यह उम्मीद करते हैं कि दफ्तर में घुसते समय कर्मचारियों को अपनी भावनाएं बाहर छोड़ देनी चाहिए पर वास्तविकता में ऐसा नहीं होता. इंसान की भावनाएं और मानसिकता लॉजिक और प्रेक्टिकल के परे हैं. हर मनुष्य को दुलार और सराहना की ज़रुरत होती है भले ही यह कितनी ही बचकानी बात क्यों न लगे.

हर कंपनी में उच्च अधिकारियों को ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की ज़रुरत है. वहीं रमेश को भी अपनी अति प्रोफेशनल सोच से बाहर निकलने और वास्तविकता को समझने की जरूरत है. याद रखिए कि कोई भी जीवन में बहुत कुछ हो सकती है पर सबकुछ नहीं, जीवन संतुलन का ही दूसरा नाम है.




लेकिन ये राहें ले जाएंगी कहां

इस दुनिया की एक खास बात है कि यहां हर कोई दूसरे व्यक्ति से कुछ लेना चाहता है। यहां हर इंसान अपना फायदा चाहता है और इस फेर में अपनी बुद्धि को लगाए रखता है। दूसरों से कुछ पाने की चाहत में हमारा मन हमेशा रिक्त रहता है। दूसरों से कुछ हासिल करने की इच्छा अक्सर जब पूरी नहीं होती है तब इसकी परिणति घोर निराशा और अतृप्ति के रूप में होती है।

मनोविज्ञान की भाषा में इंसान की जीवन से संबंधित 90% समस्याएं मन से संबंधित होती हैं। मन की उथल-पुथल, भावनाओं की आंतरिक चुभन, दबाव, घुटन, चिंता आदि व्यक्ति को मानसिक तौर पर परेशान करने के साथ-साथ शारीरिक रोगों को भी उभरती हैं जिसका असर हमारे जीवन, चिंतन और व्यवहार पर पड़ता है।

जीवन में खुशियां और प्यार बांटने पर बढ़ते हैं लेकिन बटोरने पर बिखर जाते हैं लेकिन हम जीवन में इस बात का अनुसरण न करते हुए प्यार और खुशियां बटोरने में अपना सब कुछ गवांते रहते हैं और अतृप्ति और अशांति से भर जाते हैं।

जब इंसान को कहीं से भावनात्मक तृप्ति या इमोशनल सैटिसफैकशन नहीं मिलती है तो वह स्वयं को तृप्त करने के लिए नशे का सहारा लेता है और इसमें इतनी गहराई से डूबता चला जाता है कि उससे बाहर निकलना उसके लिए आसान नहीं होता है।

किसी भी कार्य को करने के लिए भावनात्मक स्थिरता का होना जरूरी है। भावनात्मक स्थिरता के आभाव में व्यक्ति के अंदर अनजाना भय व हिचकिचाहट होती है उसके अंदर आत्मविश्वास की कमी और असुरक्षा की भावना प्रबल होती है।

स्वयं में भावनात्मक स्थिरता लाने के लिए आवश्यक है हम अपने जीवन में आने वाले उतार – चढ़ाव का निरीक्षण करना सीखें और इनसे घबराने के बजाय सीखने की कोशिश करते रहें। हमें अपनी बुद्धि का उपयोग इनसे उबरने में करना चाहिए।

यदि व्यक्ति सकारात्मक सोच को अपनाता है, सही लोगों के साथ रहता है तो धीरे-धीरे अपनेआप ही वह भावनात्मक रूप से स्थिर होने लगता है। हमारा जीवन हमें बहुत कुछ सिखा देता है। अपने एवं दूसरों के जीवन में घटित होने वाली घटनाएं, इतिहास की घटनाएं हमें यह बताती हैं कि हमें क्या करना चाहिए, किसे अपनाना और किसे त्यागना चाहिए बशर्ते हम सीखने, सुनने और देखने के लिए तैयार हों।

क्षमा करने वाला चैन की नींद सोता है

जीवन में अच्छी और बुरी घटनाएं आती रहती हैं। संसार में भले और बुरे सभी तरह के लोग हैं, हर आदमी के अन्दर कुछ बुराई और कुछ अच्छाई है, यह समझते हुए जो लोग अपने मस्तिष्क को सन्तुलित रखते हैं वे ही बुद्धिमान हैं।

जरा-जरा सी बात पर उत्तेजित हो उठना, क्रोधित हो जाना, कडवे शब्द कहने लगना या दूसरों पर उग्र भाषा में दोषारोपण करने लगना, इस बात का प्रतीक है कि वह मनुष्य बहुत उथला और ओछा है।

जो लोग छोटी-छोटी बातों को बहुत बड़ी मान बैठते हैं वे ही अधीर और उत्तेजित होते हैं। खिन्नता, निराशा या उत्तेजना उन्हें ही आती है। यदि हमारा मानसिक स्तर अपरिपक्व न हो, उसमें आवश्यक संजीदगी और गंभीरता हो तो आपा खो देने का कोई कारण नहीं है।

क्रोध में लिया गया फैसला अक्सर गलत ही साबित होता है, इसीलिए खुद पर काबू रखना बहुत जरुरी है। गुस्से में हमेशा अक्सर वो काम हो जाता है जिस से हम दूसरों को और खुद को भी नुकसान पहुंचाने के साथ लोगों के दिलों में नफरत पैदा कर देते हैं। जिसका हमें बाद में खुद भी बहुत पछतावा होता है। अक्सर व्यक्ति बदला लेकर दूसरे को नीचा दिखाना चाहता है, पर इस प्रयास में कभी कभी वो खुद भी बहुत नीचे उतर जाता है।

जल्दबाजी, क्षणिक विचार, अभी यह, अभी वह, अभी क्रोध, अभी प्यार, अभी प्रशंसा, अभी निन्दा, अभी विरोध, अभी समर्थन, ऐसे अव्यवस्थित, अस्त-व्यस्त स्वभाव का होना दर्शाता है कि वह व्यक्ति भीतर से खोखला है, उसका कोई सिद्धान्त नहीं है ,अपनी कोई निर्णय शक्ति नहीं है ,जब जो बात समझ में आ जाती है तब वही कहने या करने लगता है। इस प्रकार के हल्के व्यक्ति दूसरों की आँखों में अपना कोई स्थान नहीं बना सकते हैं ।

गम्भीरता प्रभावशाली व्यक्तित्व का सबसे बड़ा आधार है। जो लोग आवेश में नहीं आते, गम्भीर रहते हैं उनकी संजीदगी दूसरों की दृष्टि में उनका मूल्य बढ़ा देती है।

क्षमा हमें उठाती है और आगे बढने में मदद करती है। क्षमा करने से गुजरा हुआ कल तो नहीं बदलता है लेकिन इससे आने वाला कल सुनहरा हो जाता है।

हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम

एक साथ बहुत सारे काम निबटाने के चक्कर में मनोयोग से कोई कार्य पूरा नहीं हो पाता। आधा- अधूरा कार्य छोडक़र मन दूसरे कार्यों की ओर दौडऩे लगता है। यहीं से श्रम, समय की बर्बादी प्रारंभ होती है तथा मन में खीझ उत्पन्न होती है।

विचार और कार्य सीमित एवं संतुलित कर लेने से श्रम और शक्ति का अपव्यय रूक जाता है और व्यक्ति सफलता के सोपानों पर चढ़ता चला जाता है।

कोई भी काम करते समय अपने मन को उच्च भावों से और संस्कारों से ओत- प्रोत रखना ही साँसारिक जीवन में सफलता का मूल मंत्र है। हम जहाँ रह रहे हैं उसे नहीं बदल सकते पर अपने आपको बदल कर हर स्थिति में आनंद ले सकते हैं।

समझदारी इसी में है कि जीवन चक्र के बदलते क्रम के अनुरूप अपनी मनोस्थिति को तैयार रखा जाए। लाभ, सुख, सफलता, प्रगति, वैभव आदि मिलने पर अहंकार से ऐंठने की जरूरत नहीं है। कहा नहीं जा सकता कि वह स्थिति कब तक रहेगी।

ऐसी दशा में रोने-झींकने ,खीजने, निराश होने में शक्ति नष्ट करना व्यर्थ है। परिवर्तन के अनुरूप अपने को ढालने में,विपन्नता को सुधारने में, समस्या का हल निकालने और तालमेल बिठाने में मस्तिष्क को लगाया जाए तो यह प्रयत्न रोने और सिर धुनने की अपेक्षा अधिक बेहतर होगा।

आपके विषय में, आपकी योजनाओं के विषय में, आपके उद्देश्यों के विषय में अन्य लोग क्या सोचते और विचार करते हैं, उस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। यदि वे आपको कल्पनाओं के पीछे दौडऩे वाला अथवा स्वप्न देखने वाला कहें तो उसकी परवाह मत कीजिए।

आप अपने व्यक्तित्व पर विश्वास को बनाए रहिये। किसी के कुछ कहने से,किसी आपत्ति के आने से अपने आत्मविश्वास को डगमगाने मत दीजिये। आत्मविश्वास को कायम रखिए और आगे बढ़ते रहिये तो जल्दी या देर में यह संसार आपको रास्ता देगा ही। निरन्तर कर्तव्य करते रहिये, आज नहीं तो कल आप सफल होकर रहेगें।

गिर कर भी उठना सीखिये

जीवन में आने वाली प्रत्येक कठिनाई और बाधा की सबसे पहली चोट हमारी आशा और भविष्य के प्रति हमारे उत्साह पर होती है। इनका सीधा वार हमारे हृदय पर होता है किन्तु कहीं हमारे दिल टूट न जांए, इसके लिए यह सोच लीजिए कि जिस प्रकार घोर अन्धकार के बाद सूर्य का प्रकाश प्राप्त होता है उसी प्रकार आपका उज्ज्वल भविष्य आने वाला है।

अमावस की काली रात के पश्चात् चन्द्रमा की चाँदनी सहज ही फूट पड़ती है। आज का कठिन समय भी गुजर जाएगा, इसे मन में बैठा लीजिए। अपने आशावादी दृष्टिकोण, आकाँक्षाओं, उत्साह की दौलत को यों ही न गंवाइये। उनका बचाव कीजिए और प्रगति के पथ पर आशा और उत्साह के साथ आगे बढ़ते रहिये।

जिंदगी में अक्सर समस्याएं आती हैं, हमको झटका मारती हैं और हम गिर जाते हैं, हिम्मत पस्त हो जाती है पर इससे काम नहीं चलेगा। गिरकर भी उठना सीखिये फिर चलने का प्रयास कीजिए। एक बार नहीं अनेकों बार आपको गिरना पड़े पर बार-बार गिर कर भी उठिये और आगे बढ़िये।

उस छोटे बच्चे को देखिये जो बार-बार गिरता है पर फिर उठने का प्रयास करता है और एक दिन चलना सीख जाता है। आप की सफलता, विकास, उत्थान भी उतना ही सुनिश्चित है। इसलिये रुकिए नहीं, उठिए। ठोकरें खा कर भी आगे बढ़िये, सफलता एक दिन आपका स्वागत करने को तैयार मिलेगी।

मनुष्य दूसरों की दृष्टि में कैसा जँचता है, यह बहुत कुछ उसके अपने व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। हम पढ़ने, धन कमाने, कपडों और साज सज्जा बनाने पर तो ध्यान देते हैं, पर अपने व्यक्तित्व का निर्माण करने की दिशा में उपेक्षा ही बरतते हैं।

हम यह भूल जाते हैं कि जितना महत्व योग्यता और पद का है उससे कम मूल्य व्यक्तित्व का नहीं है। व्यक्तित्व का प्रभावशाली होना बड़ी से बड़ी सम्पदा और योग्यता से कम नहीं है।

यदि कोई किसी से प्रभावित होता है तो उसका मूल आधार उसका व्यक्तित्व ही होता है। शरीर का सुडौल या रूपवान् होना, दूसरों को कुछ हद तक प्रभावित करता है, पर सच्चा प्रभाव तो व्यक्ति के उन लक्षणों का पड़ता है जो उसके मन की भीतरी स्थिति के अनुरूप क्रिया और चेष्टाओं से पल-पल पर झलकते रहते हैं।