तू रहता कहां क्या तेरा पता

बुरा काम करने वाला पहले यह भली प्रकार देखता है कि मुझे देखने वाला या पकड़ने वाला तो कोई यहाँ नहीं है ? जब वह भली-भाँति विश्वास कर लेता है कि उसका पाप कर्म किसी की भी दृष्टि या पकड़ में नहीं आ रहा है तभी वह अपने काम में हाथ डालता है।

इस प्रकार जो व्यक्ति अपने आप को परमात्मा की दृष्टि या पकड़ से बाहर मानते हैं वे ही गलत काम करने को तत्पर हो सकते हैं। पाप कर्म करने का स्पष्ट अर्थ यह है कि वह व्यक्ति ईश्वर का मानने का दिखावा भले ही करता हो पर वास्तव में वह परमात्मा के आस्तित्व से इन्कार करता है। उसके मन को इस बात पर भरोसा नहीं होता है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है।

जो व्यक्ति पुलिस के चपरासी को भी देखकर भय से थर-थर कापा करते हैं वे लोग इतने दुस्साहसी नहीं हो सकते कि परमात्मा की आँखों के आगे, न करने योग्य काम करें, उसके कानून को तोड़े, उसके धैर्य की परीक्षा लें और उसका अपमान करें। ऐसा दुस्साहस तो सिर्फ वही कर सकता है जो यह समझता हो कि ईश्वर कहने, सुनने भर की चीज है। वह पोथी पत्रों में, मन्दिर मठों में,नदी, तालाबों में या कहीं स्वर्ग नरक में भले ही रहता हो, पर हर जगह वह नहीं है। मैं उसकी दृष्टि और पकड़ से बाहर हूँ।

जो लोग परमात्मा की सर्व व्यापकता पर विश्वास नहीं करते, वे ही नास्तिक है। इन नास्तिकों में कुछ तो भजन या पूजा बिल्कुल नहीं करते, कुछ करते हैं। जो नहीं करते हैं वे सोचते हैं व्यर्थ का झंझट मोल लेकर उसमें समय गंवाने से क्या फायदा? जो पूजन भजन करते हैं वे भीतर से तो न करने वालों के समान ही होते हैं पर व्यापार बुद्धि से रोजगार के रूप में ईश्वर की खाल ओढ़ लेते हैं। कितने ही लोग ईश्वर के नाम के बहाने ही अपने जीविका चलाते हैं हमारे देश में न जाने कितने आदमी ऐसे हैं जिनकी कमाई, पेशा और रोजगार ईश्वर के नाम पर है।

यदि ये लोग यह प्रकट करें कि हम ईश्वर को नहीं मानते तो उसी दिन उनकी ऐश आराम देने वाली बिना परिश्रम की कमाई हाथ से चली जायेगी। इसलिए इन्हें ईश्वर को उसी प्रकार ओढ़े रहना पड़ता है। जैसे जाड़े से बचने के लिए गर्मी देने वाले कम्बल को ओढ़े रहते हैं जैसे ही वह जरूरत पूरी हुई वैसे ही कम्बल को एक कोने में पटक देते हैं। एेसे लोग अपना उद्देश्य पूरा होते ही अपने असली रूप में आ जाते हैं। एकान्त में पापों से खुलकर खेलते हुए उन्हें जरा भी झिझक नहीं होती है।

लोगों को धोखा देकर अपना स्वार्थ साधना, छल, प्रपंच, माया, दंभ, भय, अत्याचार, कपट और धूर्तता से दूसरों के अधिकारों को अपहरण कर स्वयं सम्पन्न बनना नास्तिकता का स्पष्ट प्रमाण है। जो पाप करने का दुस्साहस करता है वह आस्तिक नहीं हो सकता, भले ही वह आस्तिकता का कितना ही बड़ा प्रदर्शन क्यों न करता हो

आस्तिकता का दृष्टिकोण बनते ही मनुष्य भीतर और बाहर से निष्पाप होने लगता है। वह सबसे नम्रता का मधुरता का स्नेह का आदर का सेवा का सरलता शुद्धता और निष्कपटता से भरा हुआ व्यवहार करता है। वह अपने स्वार्थों की उतनी परवाह नहीं करता है, खुद कुछ कष्ट भी उठाना पड़े तो उठाता है पर दूसरों का बुरा और अहित कभी नहीं करता है ।

सच्चे अर्थों में जीवित वही है जिसमें इंसानियत बची है

सच्चे अर्थों में जीवित वही है जो अत्याचार से लड़ सकता है। अन्याय और अनीति से टकरा सकता है, रोष प्रदर्शित कर सकता है। सामने अनीति होती रहे और चुपचाप खड़े देखते रहे, यह कायरता का प्रमुख चिह्न है। वीरतापूर्वक जीने की नीति में ही मानवीय प्रगति का आधार छिपा हुआ है। हमें दुनिया की जिन्दादिल कौम की तरह अपना वर्चस्व बनाए रखना है, तो इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं कि हम भीतर और बाहर की बुराइयों से लड़ने के लिए एक तत्पर सिपाही की भाँति अपना प्रत्येक मोर्चा मजबूत बनाये और आज से, अभी से अनीति को मिटाने में जुट जायें।

मुलायम मिट्टी के बिछौने में पड़ा हुआ बीज यदि ऊपर ढके पत्थरों को ढकेलने की हिम्मत नहीं दिखलाता, तो बीज से वृक्ष बनने का गौरव उसे कैसे मिल पाता? आगे बढ़ने वाली जातियों का इतिहास जिन्होंने भी ध्यान पूर्वक पढ़ा है, तो यही पाया है कि उन्नति के शिखर के लिए उन्हें संघर्ष के बीच बढ़ना और रास्ता बनाना पड़ा और यह सिद्ध करना पड़ा कि बाधाओं के मुकाबले उनका साहस और संघर्ष की शक्ति खत्म नहीं हो सकती। तब कहीं जाकर उन्हें सफलता का राजसिंहासन मिल पाया।

आगे बढ़ने की इच्छा और नये जन्म में कोई अन्तर नहीं है। अन्तरात्मा कहे कि उन्नति करनी चाहिए तो यह समझना चाहिए कि हमारी जीवनी-शक्ति अदम्य साहस और विश्वास से ओत-प्रोत है। अब एक ही बात शेष रहती है, वह यह कि उठिये और बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते चलिए। फिर जब तक मंजिल नहीं मिल जाती, संघर्ष का संबल मत छोड़िये।

साहसी व्यक्तियों को शक्ति उधार नहीं माँगनी पड़ती, उनकी अन्तरात्मा ही उन्हें बल प्रदान करती है। नीति के पथ पर बढ़ने वाले को ईश्वर पर विश्वास और उसका सहारा ही काफी है। ऐसा व्यक्ति जब बुराइयों को, अन्ध परम्पराओं को और सामाजिक कुरीतियों को रौंदता हुआ आगे बढ़ता है, तो उसका अनुसरण करने वाले अपने आप उमड पड़ते है। फिर संसार की कोई शक्ति उसे पराजित करने में समर्थ नहीं होती है।

एक बात याद रखने की है, वह यह कि सच्चाई और ईमानदारी से प्रेरित संघर्ष ही स्थायी प्रगति का आधार है। अकेला संघर्ष ही काफी नहीं, उसमें सत्य का साथ होगा, तो ही भीतरी शक्ति का आशीर्वाद मिलेगा।

अन्याय एक चुनौती है, जो इन्सान की इंसानियत को ललकारती है। उसका उत्तर कोई डरपोक और कायर नहीं दे सकता। उस बेचारे को अपने स्वार्थ, अपने लालच से ही फुर्सत कहाँ? पर जिसमें इंसानियत बची है, वे अनीति और अन्याय के खिलाफ जान की बाजी लगाते हैं। मानव जीवन की सच्ची शोभा भी यही है।

हर परेशानी का अंत होता है

जिन्दगी में कई बार ऐसा होता है कि हमारा बेहद करीबी कोई एकदम से हमारा साथ छोड कर चला जाता है। उससे हमें भारी सदमा पहुँचता है। उस समय हमें ऐसा लगता है कि हम जिसका हाथ पकड़कर चल रहे थे वही हमारा हाथ छोडकर चला जा गया है । यकायक पैरों तले से जमीन खिसकती हुई मालूम पड़ती है, आँखों के सामने अँधेरा छाने लगता है। हमें किसी मजबूत सहारे की जरूरत महसूस होती है।

दूर से चींटी की तरह महसूस होने वाली परेशानी हमारे नजदीक आते-आते हाथी के जैसा रूप धारण कर लेती है और हम उसकी विशालता और भयावहता के आगे समर्पण कर परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी हो जाने देते हैं, वो परिस्थिति हमारे पूरे वजूद को हिला डालती है, हमें हताशा,निराशा के भंवर में उलझा जाती है।

एक-एक क्षण पहाड़ सा प्रतीत होता है और हममे से ज्यादातर लोग आशा की कोई किरण ना देख पाने के कारण हताश होकर परिस्थिति के आगे हथियार डाल देते हैं।

कभी कभी हम जान बूझकर गलत काम करते हैं तो कभी अनजाने में गलत काम कर जाते हैं। जिसके कारण हमें आगे चलकर परेशानी उठानी पड़ती हैं। और जब हम पर कोई परेशानी आती हैं तब हम पछताते हैं कि काश हमने ऐसा काम ना किया होता तो शायद आज हम इस मुश्किल में ना पड़ते।

संसार जो है, जैसा भी है, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन हम अपनी दृष्टि और वाणी को बदल सकते हैं। इन दोनों के बदलने से जीवन की दिशा और दशा, दोनों बदल जाती है ।

हम अच्छे कर्म करते है तो हमें उसके अच्छे फल मिलते है और अगर हम बुरे कर्म करते है तो हमें उसके बुरे फल मिलते है। हमारे जीवन में जो भी परेशानियां आती हैं, उनका संबंध कहीं ना कहीं हमारे कर्मों से होता है।

अगर हम किसी अनजान, निर्जन रेगिस्तान मे फँस जाएँ तो उससे निकलने का एक ही उपाए है, बस -चलते रहो अगर आप नदी के बीच जाकर हाथ पैर नहीं चलाएँगे तो निश्चित ही डूब जाएंगे, जीवन मे कभी ऐसा क्षण भी आता है, जब लगता है की बस अब कुछ भी बाकी नहीं है, ऐसी परिस्थिति मे अपने आत्मविश्वास और साहस के साथ सिर्फ डटे रहें क्योंकि- हर चीज का अंत होता है,आज नहीं तो कल होता है।

वह जो खुद से ही अनजान है

सुख कब दुख में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता है। लालच, ईर्ष्या, इच्छाएं और वासनाएं हमें जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने कहां देतीं हैं? क्या हमारा जीवन भ्रम, भटकावे में पड़कर अवसर को गंवा देने के लिए ही है? क्या हमारे जीवन का यही सार है कि दुनिया के छल-कपट और माया बार बार उसे छलते रहें और अपना शिकार बनाते रहें?

जीवन की छोटी-छोटी घटनाएं भी हमारी शांति और एकाग्रता को आंधी में उड़ते हुए पत्ते की भांति हर लेती हैं। हम वर्तमान में उपस्थित तो होते हैं पर उपलब्ध नहीं होते क्योंकि हमारे मन में उठने वाले विचार अलग-अलग दिशाओं में भटकते फिरते हैं, विचारों की भीड़ हमें एक दिशा में सोचने ही नहीं देती है।

भटकाव या भ्रम कभी मनुष्य के जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता है। अक्सर हमारे विचारों की दिशा भावनाओं की दिशा से भिन्न होती है और भावनाओं की दिशा कर्मों की दिशा से अलग होती है, एेसे में व्यक्तित्व में संतुलन की कल्पना कैसे की जा सकती है? पर यह भी अटल सत्य है कि यदि जीवन में लक्ष्य को पाना है तो व्यक्तित्व में संतुलन तो लाना ही होगा।

जीवन में संतुलन बनाने के लिए सर्वप्रथम हमें अपनी एकाग्रता को साधना होगा। जिंदगी में अपनी खोई हुई एकाग्रता को वापस पाने के लिए आवश्यक है कि हमारे जीवन की दृष्टि बाहर की जगह भीतर की ओर लौटे। हम दूसरों का अंधा अनुकरण करने की बजाय खुद को समझें, अपने व्यक्तित्व एवं विचारों की समीक्षा करें और उन विचारों एवं आदतों का अभ्यास करें जो हमें हमारे केन्द्र की ओर लौटाने में सहायक सिद्ध हों।

धनुष पर तीर चढ़ाकर उसे लक्ष्य की दिशा में तान देने मात्र से ही लक्ष्य को भेदा नहीं जा सकता है, इसके लिए तीर को उस दिशा में आवश्यक बल के साथ गति देना भी जरूरी है। उसी तरह जिदंगी में प्रयासों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए एकाग्रता के साथ प्रबल इच्छाशक्ति, प्रचंड पुरूषार्थ और लगातार अभ्यास की आवश्यकता भी पड़ती है।

जीवन का उद्देश्य अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाना है। प्रयास और पुरूषार्थ तो गलत मार्ग का अनुसरण करने वाले भी करते हैं पर उनके जीवन की दिशा सही न होने के कारण उससे उत्पन्न ऊर्जा उनके स्वयं के लिए और दूसरों के लिए विनाशकारी ही साबित होती है।

जब हमारे मन में यह भाव आता है कि हमारे द्वारा किया जा रहा प्रत्येक कार्य स्वयं व दूसरों की भलाई के लिए है तो मन में एक समर्पण की भावना पैदा होती है और जहां समर्पण होता है वहां अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं होता।

खोदी गई खाई को पाटना ही प्रायश्चित है

कई बार ऐसा होता है जब मनुष्य जानबूझकर या फिर अनजाने में ही कुछ अनुचित कार्य कर बैठता है। ये बुरे कार्य न सिर्फ उसकी आत्मिक प्रगति एवं व्यक्तित्व के विकास में बाधक बनते हैं, अपितु उसकी भौतिक सफलताओं में भी अवरोध पैदा करते हैं। इस व्यथा से मुक्त होने का एकमात्र मार्ग प्रायश्चित ही है।

दुष्कर्मों एवं कुविचारों के संस्कार एक प्रकार से विषैली परतों के रूप में हमारे मस्तिष्क एवं अचेतन मन पर जमते रहते हैं। बाद में ये ही मन की चंचलता,अस्थिरता, आवेश एवं विक्षोभ के रूप में प्रकट होते हैं और व्यक्ति को विक्षिप्त जैसा बना देते हैं। ऐसी दशा में किसी भी कार्य को एकाग्रचित्त होकर नहीं कर पाने के कारण पग-पग पर असफल होना पड़ता है। हमारे असंतुलित व्यवहार से असंतुष्ट होकर अपने भी विरोधी बन जाते हैं। भटकता हुआ मन जीवन को कँटीली झाड़ियों में उलझा देता है, जहाँ केवल दुख एवं पछतावा ही हासिल होता है।

यही कारण है कि अपने अपराधों को स्वीकार कर उनके लिए प्रायश्चित करने की प्रथा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। पापों के प्रायश्चित के बिना मुक्ति तो दूर सामान्य सुखी-संतुष्ट जीवन भी संभव नहीं, इसीलिए प्रत्येक धर्म में पाप के बोध को प्रमुख स्थान दिया गया है। यह बोध सिर्फ व्यक्ति की मनोवेदना या पश्चाताप तक सीमित नहीं है, अपितु किए गए अपराध का प्रायश्चित भी इसमें शामिल है। रास्ते में खाई खोदी गई है, तो उसके लिए सिर्फ पश्चाताप या वेदना प्रकट करने मात्र से कुछ नहीं होता बल्कि उसे पाटने के लिए भी उतना ही प्रयत्न करना चाहिए, जितना खोदने के लिए किया गया था।

अपने दोषों को स्वीकार करना, उसके लिए दुःखी होना, लज्जित होना और भविष्य में इस तरह की भूलों की पुनरावृत्ति न करना, यह मनोभूमि प्रायश्चित करने वाले की होनी ही चाहिए। एक तरफ प्रायश्चित की बात सोची जाए और दूसरी तरफ उन्हीं भूलों को दुहराते रहा जाए, तो प्रायश्चित करने का प्रयोजन ही नहीं रह जाता है। सच्चे मन से किए गए प्रायश्चित से मन हल्का हो जाता है और जीवन में खोया हुआ आत्मविश्वासफिर से हासिल हो जाता है।

प्रार्थना और याचना में अंतर है

हममें से बहुत से लोगों को यह शिकायत रहती है कि हम प्रार्थना तो बहुत करते हैं पर उसका उचित फल नहीं मिलता है। हम प्रार्थना तो करते हैं पर हमारा चेहरा इच्छाओं के बोझ से और मन कामनाओं के बोझ से मुरझाया और दबा रहता है, हमें जिदंगी से शिकायतें भी बहुत रहती हैं, किसी भी बात से खुशी नहीं मिलती है और लोगों में कमियां निकालना हमारा स्वभाव बन जाता है।

वहीं दूसरी तरफ हममें से कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें जिदंगी से कोई शिकायत नहीं है, वो हर परिस्थितियों में प्रसन्न और संतुष्ट रहते हैं। एेसे व्यक्तियों से जितना संभव होता है वो दूसरों की मदद करते हैं, उन्हें जीवन में जो कुछ भी मिला है उसके लिए वे ईश्वर के शुक्रगुजार रहते हैं।

प्रार्थना और याचना में बड़ा अंतर है, याचना में हम अनुभव करते हैं कि हम बड़े दीन हीन हैं और जो भी हमारे सामने खड़ा है, हम उसके सामने गिड़गिड़ाते हैं और भीख मांगते हैं।

याचना करते समय हम अपनी इच्छाओं की लिस्ट बनाकर ईश्वर या सामने वाले के सम्मुख रखकर मांग करते हैं कि वह उन्हें बस किसी तरह पूरा कर दे। याचना एक प्रकार की दुर्बलता है जो हमें हीनता से भर देती है।

प्रार्थना याचना से पूरी तरह से भिन्न है। प्रार्थना मांगने वाले और देने वाले का मिलन है। जिस बिंदु पर हमारी भावनाओं एवं संवेदनाओं का, उस परम शक्ति जिसके हाथ में हमारे जीवन के समस्त सूत्र हैं, से मिलन होता है वही प्रार्थना है।

सामान्य जीवन में हमारी भावनाएं कई दिशाओं में, कई स्थानों पर बंटी – बिखरी हुई होती है। पर जब हम अपनी भावनाओं को एकत्रित और संगठित कर लेते हैं तब हमारी भावनाएं ऊपर की तरफ उठती हैं, सच्चे मन से उस परम शक्ति को पुकारने पर जब भावनाएं ऊपर उठती हैं तो प्रार्थना फलित होती है।

प्रार्थना में चमत्कार होता है, जिसे बुद्धि असंभव मानती है वह भी संभव होता है। दुनिया के समस्त असंभव प्रार्थना के माध्यम से संभव होते हैं। आवश्यकता है तो बस अपने मन को साफ रखने की और प्रार्थना एवं याचना के बीच में अंतर को समझने की।

ये दुनिया बस एक रंगमंच है

हम निराश इसलिए हैं कयोंकि भय और संदेह ने हमारे अन्तःकरण पर अधिकार कर लिया है। हमें अपनी योग्यता के प्रति अविश्वास हो गया है विचारों की यह विवशता ही हमें डूबो रही है। याद रखिए जब तक हम किसी कार्य में हाथ नहीं डालेगें, तब-तक अपनी शक्ति का अनुमान कभी नहीं होगा। मनुष्य जब तक अपने आपको यह न समझा ले कि वह कार्य करने की क्षमता रखता है, तब-तक दूसरों पर निर्भर ही बना रहेगा।

हमें जो कुछ करना ठीक लगता है, जो कुछ हमारी अन्तरात्मा हमसे कहती है उसे दृढ़ संकल्प के साथ प्रारंभ करना चाहिए। डरिए नहीं, शंका, संदेह या अविश्वास की कोई बात मत सोचिए बल्कि कार्य शुरू करिए। प्रत्येक मनुष्य कुछ न कुछ जरूर कर सकता है और करेगा यदि वह हिम्मत न हारे। हिम्मत हमेशा बाजी मारती है। संसार में जो करोड़ों मनुष्य निराश हो रहे हैं उसका प्रधान कारण आत्मविश्वास की कमी है।

जिस वस्तु को हमें प्राप्त करना है उसके लिए जितनी मानसिक क्रिया होगी, जितना उसकी प्राप्ति का विचार किया जायगा, उतनी ही शीघ्रता से वह वस्तु हमारी ओर आकर्षित होगी। प्रत्येक वस्तु पहले मन में उत्पन्न की जाती है फिर संसार में उसकी प्राप्ति होती है। हम अपने बारे में अयोग्यता की भावना रखते हैं ,हमारे भय और डर की कल्पनाएं ही हमारे मन में निराशा के काले बादलों की सृष्टि कर रही है। मनःस्थिति के अनुसार ही अन्य व्यक्ति हमसे नफरत अथवा प्रेम करते हैं। और संसार की, समस्त वस्तुएं हमारे पास आकर्षित होकर आती या मुड़कर दूर भागती हैं।

जब हम यह निश्चय कर लेगें कि हमारा निराशा से कोई संबंध नहीं होगा। हमें नाउम्मीदी से कोई सरोकार नहीं है, हम अब से अपने व्यवहार और कार्यों में निराशा का कोई चिन्ह भी नहीं रहने देंगे हमें संसार की कठिनाईयां अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकतीं हैं तब याद रखिए यह अभिनय करते-करते एक दिन हमें अपने -आप कार्य को पूर्ण करने की क्षमता प्राप्त कर लेगेंं और हमें सफल होने का मार्ग मिल जाएेगा।

इस रात की कभी सुबह नहीं होती है

पानी के बुलबुलों में कोई आशियाना नहीं बुन सकता है। बुलबुलों की सत्ता तो क्षण भर की है। मजबूत इमारत बनाने के लिए नींव भी गहरी और सुदृढ़ होनी चाहिए। दो पल की चकाचौंध भरी जिंदगी से आत्मसंतोष नहीं मिल सकता है।

आज हर वह व्यक्ति जिसका समाज में नाम है, जो मंहगे और डिजाइनर कपड़े पहनता है और एक विशेष प्रकार की लाइफ स्टाइल जीता है, वही समाज में प्रतिष्ठित है। और जो एेसा नहीं कर पा रहा है वह एक अजीब सी बैचेनी में जी रहा है। कोई भी इस दौड़ में पिछड़ना नहीं चाहता है।

समाज में एेसे व्यक्ति आज भी हैं जो समाज के हितों के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं पर उस तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता है। इसी जगह ग्लैमरस छवि वाला कोई नेता या सितारा हाथ में झाडू लेकर खड़ा भी हो जाए तो यह बहुत बड़ी खबर बन जाती है। आज कौन कितना प्रतिभाशाली है इसका महत्व कम है बल्कि कौन कितना आकर्षक दिखता है, यही सफलता की कसौटी है।

समाज में जिस चीज को प्रतिष्ठा मिलेगी उसी के प्रति लोगों का रुझान भी होगा और उसे पाने की चाहत भी बढेगी। मानवीय मूल्यों वाले अपने इस देश में ग्लैमर पहले कभी इतना प्रचलित और बिकाऊ नहीं था।

आज परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। आज धर्म से लेकर कपड़ों तक हर चीज का बाजारीकरण हो चुका है। हमें इंसान की देह तो दिखती है पर उसके भीतर की संवेदनाएं और मानवीय गुण नहीं दिखते हैं और बाजार में जो दिखता नहीं वह बिकता नहीं । यही कारण है कि आज ईमानदारी जैसे आंतरिक गुणों का कोई मूल्य नहीं रह गया है।

आज समाज बदलाव के कगार पर खड़ा है। हममें से ज्यादातर लोग चंद पलों की प्रसिद्धि पाकर संतुष्ट हो जाना चाहते हैं पर यह प्रवृत्ति न तो समाज और न ही स्वयं हमारे लिए ही हितकारी है। ग्लैमर की खुमारी और नशा हमें किसी मुकाम पर नहीं पहुंचने देता है बल्कि अपनी चकाचौंध में उलझाकर जीवन को और बदतर बना देता है।

जिंदगी में प्रसिद्ध होने की चाहत रखना गलत नहीं है। पर यह प्रसिद्धि हमें हमारी कड़ी मेहनत और श्रेष्ठ विचारों के बल पर मिलनी चाहिए, किसी सेलिब्रिटी का अंधा अनुकरण करने के बजाय हमें हम जैसे हैं वैसे ही रहकर अपनी मौलिकता और सामर्थ्य को बढ़ाने की कोशिश करते रहना चाहिए।

यदि जीवन में शरीर का सौन्दर्य और आकर्षण आवश्यक है तो आंतरिक गुणों का विकास भी उतना ही जरूरी है। केवल शरीर का आकर्षण ही पर्याप्त नहीं है, ईमानदारी और मेहनत से मिलने वाली सफलता किसी भी ग्लैमर से बढ़ कर है। ग्लैमर तो बस एक नशा है, यह एक एेसी अंधेरी रात है जिसकी कभी सुबह नहीं होती है।

राजी है हम उसी में जिसमे तेरी रज़ा है

जिन्दगी में हमें वह सबकुछ क्यों नहीं मिलता है जिसकी हमें चाह होती है? क्या एेसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी चाहतें अत्यधिक होती हैं? या फिर एेसा इसलिए होता है क्योंकि कहीं कोई है जो यह जानता है कि हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत?, वह यह सुनिश्चित करता है कि हमें वह मिले जो हमें मिलना चाहिए परंतु हमें वह सबकुछ नहीं मिल सकता है जिसकी हमें चाह होती है।

यह मानव स्वभाव है कि वह हमेशा स्वयं की तुलना दूसरों से करता है। अपने से अधिक सुखी और सम्पन्न लोगों को देखकर यह इच्छा अक्सर मन में उठती है कि हमारे पास भी इतना वैभव, इतनी संपन्नता क्यों न हो? इस प्रकार की इच्छा ही अक्सर असंतोष और पतन का कारण बनती है।

हमें कभी-कभी अपनी तुलना एेसे लोगों से भी करनी चाहिए जिनका जीवन स्तर हमसे भी नीचे है, जो हमसे भी अधिक दुखी, गरीब और परेशान हैं। प्रकृति ने हमें अनेकों से कमजोर भले ही बनाया हो पर असंख्य लोगों से ऊपर भी रखा है। जिदंगी से असंतुष्ट होने के यदि दस कारण होते हैं तो संतोष के भी सौ कारण उसी जीवन में मौजूद रहते हैं।

नजरिया बदलते ही दुनिया बदली हुई दिखाई देती है, मन की सारी खिन्नता प्रसन्नता में बदल जाती है। जिदंगी में महत्वाकांक्षी अवश्य होना चाहिए पर यह महत्वाकांक्षा गुणों की होनी चाहिए। हमें दूसरों की अपेक्षा अधिक विनम्र,अधिक स्वस्थ,अधिक बुद्धिमान,अधिक योग्य,अधिक संयमी, अधिक सभ्य एवं अधिक सेवाभावी बनने का प्रयत्न करना चाहिए । एेसी प्रतिस्पर्धा करने से व्यक्ति का पतन नहीं होता है बल्कि उत्थान के ही अधिक अवसर प्राप्त होते हैं।

हर इच्छा कभी किसी की पूरी नहीं हुई है। सब को जो कुछ भी मिला है उसी में सब्र करके अधिक की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करते रहना पड़ता है। जिंदगी का यही नियम है जिसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता, जीवन का यही क्रम हमें शांति देता है इसे अपनाकर हम अपना खोया हुआ सुख और चैन वापस पा सकते हैं।

केवल बातें करने से कुछ हासिल नहीं होता है

सेवा का अर्थ मात्र उपदेश देना नहीं है। सच्ची सेवा वह है जो लोगों को उनके दुखों और परेशानियों से निजात दिलाने का काम करे। जिसे भूख लगी हो वह भला भोजन के अलावा क्या सोच सकता है? जिसके सिर पर छत नहीं है वह कैसे ध्यान की बात को समझ सकता है? जिसकी दैनिक समस्याएं इतनी गहरी हों वह भला आध्यात्म को क्या समझेगा? लोगों के कष्टों एवं समस्याओं का समाधान ही उन्हें ध्यान और आध्यात्म की तरफ ले जाएगा।

हम दुनिया को अपने नजरिये से देखते हैं। जो व्यक्ति हमारी नहीं सुनते या जिनसे हमारे विचार नहीं मिलते उनके प्रति हम मन में एक धारणा बना लेते हैं कि कैसे ढीठ लोग हैं जो कुछ सुनना ही नहीं चाहते हैं, जब सुनेंगे ही नहीं तो समझेंगे कैसे? एेसे लोग जीवन में भला क्या हासिल कर पाएंगे? परंतु हकीकत प्रायः इससे भिन्न होती है दरअसल हमारी दृष्टि, हमारे विचार ही इतने परिपक्व नहीं होते हैं जो चीजों को, घटनाओं को आरपार उनकी वस्तुस्थिति में देख पाएं और उन्हें समझ सकें।

केवल बातें करने से कुछ हासिल नहीं होता है। उन बातों को को जीवन में उतारकर कर्म के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सके तभी जीवन में कुछ उद्देश्य पूर्ण हासिल किया जा सकता है। बातों से अधिक प्रभाव उसे कर दिखाने में होता है।

जब मन के भीतर अकुलाहट होती है तब उपकार, परोपकार और सेवा स्वयं होने लगती है। तब अपने पराये का भेद समाप्त हो जाता है और प्रेम की लहर मनुष्य ही नहीं समस्त प्राणिजगत को अपने आगोश में ले लेती है। हम दूसरों के सुख-दुख में सुखी और दुखी होते हैं और यह सब करने के लिए हमें अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता है बल्कि यह परिवर्तन स्वयं, अपने-आप ही घटित होता है।

जब परोपकार प्रदर्शन नहीं जीवन का दर्शन बन जाता है। तब दूसरों की सेवा के नाम पर प्रदर्शन, अहंकार, मिथ्या उपदेश जैसे खेल नहीं खेले जाते हैं। जब भीतर की व्याकुलता ही स्वभाव बन जाती है तब परसेवा की यही पुकार जीवन को सार्थक बना देती है।