अपनों से दूर करता है अहंकार

क्रोध और अहंकार के बीच में गहरा संबंध है। चोट खाए हुए अहंकार की ही अभिव्यक्ति अनियंत्रित क्रोध के रूप में होती है। क्रोध की उग्र अवस्था में विवेक कहीं खो जाता है, उचित और अनुचित का भेद समाप्त हो जाता है। एेसा होते ही हमारा स्तर गिर जाता है और हम वो बन जाते हैं जो हम वास्तव में होते नहीं हैं।

पारिवारिक कलह एवं अन्य झगड़ों विवादों की जड़ में मुख्य वजह अक्सर अंहकार एवं लालच होता है। जिन घरों में नित्य लड़ाई-झगड़े, तू-तू, मैं-मैं होती है, जहां लोग एक-दूसरे को समझना नहीं चाहते हैं और दूसरों को पीड़ा और दुख देने में आनंद महसूस करते हैं, एेसे घरों का वातावरण भी नारकीय बन जाता है जहां से सुख के पलायन और दुख के आगमन में देर नहीं लगती है।

पारिवारिक झगड़ों और विवादों के कारण न जाने कितने परिवार टूटें हैं कितने लोग अपनों से अलग होकर बेघर हुए हैं। पारिवारिक रंजिश में न जाने कितने रिश्तों की हत्या हुई है और न जाने कितने लोगों को शारीरिक और मानसिक पीड़ा पहुंची है।

जिन लोगों के लिए झूठा अहंकार और निजी स्वार्थ ही सर्वोपरि हैं उनका दिल छोटा और उद्देश्य संकीर्ण होता है। एेसे व्यक्ति जीवन में स्वयं या समाज के लिए कुछ भी सार्थक और उद्देश्य पूर्ण कार्य नहीं कर पाते हैं और अपना सारा जीवन छल-कपट, बेईमानी और षड्यंत्र रचने में ही बिता देते हैं।

जब तक लालच की पूर्ति एवं अहंकार की तुष्टि मनुष्य के जीवन का उद्देश्य बना रहेगा तब तक चाहे राजतंत्र हो या लोकतंत्र समाज को बिखरे और भटके हुए व्यक्ति मिलते रहेगें जिनके लालच और अहंकार की कीमत समाज चुकाता रहेगा।

आपस में प्रेम, परस्पर विश्वास, बड़ों को सम्मान और छोटों को प्यार, यही नीवं है किसी भी सुखी समाज की, इन्हीं के आधार पर एक सभ्य समाज का निर्माण होता है जो सही अर्थों में लोकतंत्र की संरचना करते हैं।

मंजिलें अपनी जगह हैं, रास्ते अपनी जगह

रास्ता वह भूलता है जिसे बताने वाला कोई नहीं होता है या फिर बताने वाले की बात सुनने की फुर्सत जिसके पास नहीं होती है। हमारी अंतरात्मा भी हमें उचित और अनुचित की, सही और गलत की प्रेरणा निरंतर देती रहती है।

जो अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं, उसके महत्व को समझते हैं और उसे सम्मान देते हैं, उन्हें सीधे रास्ते पर चलने में कोई कठिनाई नहीं होती है। इसके विपरीत जो अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को अनदेखा और अनसुना करते हैं उनका मार्गदर्शन दुनिया की कोई भी ताकत नहीं कर सकती है।

दुनिया अक्सर हमारा मूल्यांकन दौलत और रुतबे से करती है। जो सही रास्ते पर चलता है भले ही धन की दृष्टि से वह अमीर न हो पाए पर एेसे व्यक्ति को ईश्वर का हाथ और अपनों का साथ अवश्य मिलता है। एेसे व्यक्ति के काम कभी नहीं रूकते हैं, जो सीधे रास्ते पर चलता है वह देर से ही सही पर अपनी मंजिल पर पहुंचता अवश्य है।

अपनी अंतरात्मा की आवाज़ लगातार अनसुनी करते रहने पर, उसकी लगातार उपेक्षा करते रहने पर आत्मा के स्वर मंद पड़ जाते हैं और फिर एक वक्त एेसा भी आता है जब हमें अपनी आत्मा की आवाज़ सुनाई नहीं देती है। हमारे जीवन में फिर जो कुछ भी अच्छा बुरा होता है उसके प्रति हमारी अंतरात्मा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती है, जब हमारा मार्गदर्शन करने वाला मौन हो जाता है तब रास्ता भटकने की संभावना बढ़ जाती है।

सदाचार, कर्तव्यों का पालन, आत्मविश्वास, निर्भयता, शांति और आंनद उसी को नसीब होते हैं जिसने जिंदगी भर सही रास्ते पर चलने का साहस किया हो। अंतिम समय पर जब विदाई का वक्त आता है तब अक्सर आंखें खुलती हैं और यह अहसास होता है कि हमने जीवन भर जिस झूठ, छल प्रपंच का सहारा लिया है उसका समग्र मूल्य महज कागज के टुकड़ों से ज्यादा कुछ नहीं है। याद रखिए कि जहां पर हमारी स्वतंत्रता समाप्त होती है वहीं से महाकाल की स्वतंत्रता प्रारंभ होती है।

कभी किसी की प्रशंसा भी कीजिए

हममें से ज्यादातर लोग सपने तो बहुत देखते हैं,काबिलियत भी होती है पर फिर भी अधिकांश लोग अपने सपनों को मुकाम तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जिन्दगी की टेढ़ी मेढ़ी उलझन भरी राहों में उलझ कर सपने मंजिल से पहले ही दम तोड़ देते हैं।

सपने टूटने की यूं तो अनेक वजहें हो सकती हैं पर इसकी एक बड़ी वजह समय पर मिलने वाले प्रोत्साहन का आभाव होता है। जिंदगी में हमेशा प्रोत्साहित करने वाले लोगों की संख्या सीमित होती है, निरूत्साहित करने वाले तो हजारों मिल जाते हैं। हमारी नकारात्मक सोच भी एक बड़ी बाधा है जो लोगों की निराशावादी बातों को सच मान बैठती है लोगों की बातों में आकर हमें अपनी क्षमता पर संदेह होने लगता है और अंत में प्रतिभा का फूल खिलने से पहले ही मुरझा जाता है।

यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि समुचित प्रोत्साहन और सहानुभूति पूर्ण प्रशंसा से प्रतिभा का समुचित विकास किया जा सकता है। थोड़ी सी शाबाशी, थोड़ी सी सराहना किसी की जिंदगी बदल सकती है। सहानुभूति पूर्ण प्रोत्साहन से प्रतिभा विकसित होकर सर्वोच्च शिखर छू लेती है।

इतिहास गवाह है कि जिन व्यक्तियों की आरंभ में समाज ने उपेक्षा की, उन्हें बेकार और कमजोर बताकर उनकी प्रतिभा पर कई प्रश्नचिह्न लगा दिए कालान्तर में उन्हीं लोगों ने अनवरत अभ्यास और प्रोत्साहन के बल पर सफलता की नई इबारत लिख कर इतिहास को नये सिरे से रच दिया।

सच्ची प्रशंसा वह प्रेरक शक्ति है जो हमारे भीतर छिपी हुई शक्तियों को उभार कर उन्हें कई गुना बढ़ा देती है। हौसला बढ़ाने वाले कुछ शब्दों को सुनकर हारता हुआ खिलाड़ी बाजी जीतने लगता है। थोड़ी सी हिम्मत बंधाने पर आदमी पर्वत भी लांघ जाता है। प्रशंसा के दो शब्द आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बदल सकते हैं। प्रशंसा की यह मिठाई चाहे कोई भी क्यों न दे हर किसी को मीठी ही लगती है। कभी किसी की प्रशंसा भी कीजिए क्योंकि आपकी प्रशंसा के दो बोल किसी की जिंदगी बदल सकते हैं ।




ये दुनिया एक दर्पण है

एक अजनबी भटकते हुए एक गांव पहुंचा। उसने गांव के बाहर बने कुएं के पास बैठे हुए एक फकीर से पूछा कि इस गांव में रहने वाले लोगों का स्वभाव कैसा है? क्या यहां के लोग अच्छे और मैत्रीपूर्ण हैं?

उत्तर देने के बजाय उस फकीर ने अजनबी से प्रश्न किया कि जहां से तुम आ रहे हो वहां के लोग कैसे हैं? अजनबी दुखी होकर कहने लगा वहाँ के लोग अत्यंत क्रूर, दुष्ट और अन्यायी हैं। मेरी सारी परेशानियों के लिए वे लोग ही जिम्मेदार हैं। इस पर फकीर ने थोड़ी देर चुप रहने के बाद कहा – यहां के लोग भी तुम्हारे लिए वैसे ही साबित होगें।

थोड़ी देर बाद एक दूसरा राहगीर आया और उसने भी फकीर से वही सवाल किया कि यहां के लोग कैसे हैं? इस पर फकीर ने कहा कि मित्र क्या तुम पहले यह बता सकते हो कि पहले तुम जहां रहते थे वहां के लोग कैसे थे? यह सुनकर उस अजनबी के चेहरे पर आनंद छलक उठा। वह कहने लगा कि वे सभी बहुत मित्रवत और दयालु थे उन्होंने मेरी बहुत बार सहायता की थी और मेरी खुशियों का कारण वे लोग ही थे। यह सुनकर फकीर कहने लगा कि यहां के लोग भी तुम्हारे लिए वैसे ही साबित होगें।

जब राहगीर आगे बढ़ गया तब फकीर के पास बैठ उनके शागिर्द ने कहा उस्ताद आपने एक ही गांव के लोगों के बारे में दो विपरीत बातें क्यों कहीं? फकीर मुस्कुराते हुए कहने लगे कि मैंने एक गांव के लोगों के बारे में नहीं बल्कि दो विपरीत व्यक्तियों के बारे में ये विरोधी बातें कहीं हैं। यह संसार एक दर्पण है, हम दूसरों में अपना ही अक्स देखते हैं।

फूलों के लिए सारा संसार फूल है और काटों के लिए सर्वत्र काटें ही हैं। मन के अनुरूप ही संसार प्रतीत और अनुभव होता है। जो स्वयं में नहीं है उसे दर्पण में भी देखा नहीं जा सकता है। यह संसार एक विशाल दर्पण के समान है जब तक सर्वत्र सत्य, शिव और सुन्दर के दर्शन न होने लगें तब तक यह जानना चाहिए कि स्वयं में ही कोई खोट अभी शेष है।

समय बड़ा बलवान होता है

दुख की अपनी कोई अलग सत्ता नहीं होती है। इसकी अनुभूति मानसिक स्तर पर होती है। यदि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से दृढ़ और मजबूत है तो उसे दुख की अनुभूति या तो नहीं होगी और यदि होगी भी तो बहुत क्षीण रूप में होगी।

सामान्य जनजीवन में दुख से पार पाने के लिए आवश्यक मानसिक दृढ़ता का आभाव होता है। कहते हैं इन्सान भावनाओं का पुतला होता है, हम आसानी से बिना विवेक का उपयोग किए भावनाओं में बह जाते हैं और इसीलिए दुख की सत्ता को सच समझ बैठते हैं और अधीर होकर अपने दुखों के लिए कभी दूसरों को तो कभी ईश्वर को जिम्मेदार ठहराने लगते हैं।

प्रकृति के नियम ही कुछ एेसे हैं कि हर जीव को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जीवन की परिस्थितियां हर पल, हर क्षण हमें परीक्षा की कसौटी पर आजमाती हैं। जीवन के इन संघर्षों में कभी सफलता मिलती है तो कभी असफलता हाथ आती है। असफलता से उपजने वाली निराशा से बचने का अमोघ उपाय आशा, उत्साह और साहस के दीपक को हर परिस्थिति में जलाए रखना है।

जीवन में बहुत से भय अकारण भी होते हैं जिनका कोई आधार नहीं होता है। अंधकार की विदाई और प्रकाश का आगमन एेसे डर को सिरे से खारिज कर देता है। मन का भ्रम दूर होते ही हमें समस्या और उलझन स्पष्ट रूप से दिखने और समझ आने लगती हैं और उनके सुलझने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।

समय से बड़ा चिकित्सक कोई नहीं होता है, बड़े से बड़े घाव भी वक्त के साथ भर जाते हैं। धैर्य रखने पर समय संकट को एेसे टाल देता है कि मानो उसका कभी कोई अस्तित्व नहीं था।

संकट, मुश्किल परिस्थितियों और विपत्तियों को देखकर घबराना कायरता है। खुद पर विश्वास रखते हुए धैर्य, साहस, आशा और विश्वास के साथ मुश्किलों का सामना करने में ही जीवन की सार्थकता है।

जब तक साँस है तब तक आस है

जिन्दगी में प्रेम की तलाश सभी को होती है इसके बिना जीवन एेसे मुरझा जाता है जैसे बिना पानी के पौधा पर अक्सर यह तालाश अधूरी रह जाती है क्योंकि इसकी तालाश हम करते हैं दूसरे व्यक्ति में, हमें लगता है कि दूसरा व्यक्ति ही हमें वह सब कुछ दे सकता है जिससे हमें शांति मिल जाएगी। हमारी उम्मीद अक्सर टूट जाती है क्योंकि हम यह भूल जाते हैं कि कोई भी व्यक्ति हमें वही दे सकता है जो कि उसके खुद के पास हो। हम जिस दूसरे व्यक्ति में प्रेम को ढूंढ रहे हैं वो भी किसी तीसरे व्यक्ति में उसे तालाश कर रहा है और तीसरा व्यक्ति किसी चौथे व्यक्ति को ढूंढ रहा है इस तरह यह अंतहीन सिलसिला जारी है।

हमारे हाथ में तो बस प्रयास करना या मेहनत करना होता है। कर्मों का फल हमारे हाथ में नहीं होता है। हमारे प्रयासों के फल हमारे भाग्य के अनुरूप होते हैं। जीवन में कभी कभी बहुत प्रयास करने के बाद भी वांछित सफलता नहीं मिल पाती है। हमारे भाग्य के अनुरूप ही बाहर की परिस्थितियां परिवर्तित होने लगती हैं इनका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है और हमारी किस्मत हमें वहां पहुंचा देती है जहां हमें पहुंचाना होता है। भाग्य प्रबल और शक्तिशाली होता है।

जो जीवन में जितना संघर्ष करता है वो उतना ही सीखता है। सफल या असफल हो जाना अन्य कारणों पर भी निर्भर करता है। पर सीखने के लिए, सत्य का अनुभव करने के लिए, अपनी क्षमताओं को समझने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। जो जितना संघर्ष करता है और विकास करता है। प्रकृति भी उसके सामने और कठिन परिस्थितियां एवं चुनौतियां प्रस्तुत करती जाती है। यह अनवरत जारी रहने वाली प्रक्रिया है।

भाग्य प्रबल और शक्तिशाली अवश्य है पर बिना पुरूषार्थ के वह अधूरा है। भाग्य और पुरूषार्थ एक दूसरे के पूरक हैं। जहां पुरूषार्थ है भाग्य भी उसी के साथ होता है। इतिहास की किताबों से लेकर हमारे वर्तमान समय में अनेक एेसे उदाहरण मिल जाएगें जिन्होंने अपने भाग्य को प्रबल पुरूषार्थ से बदल दिया। पुरूषार्थ ही वह ईधन है जिसकी शक्ति से जीवन की गाड़ी दौड़ती है।

जब जीवन में सबकुछ बुरा होते हुए दिखाई दे रहा हो, चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार नज़र आ रहा हो, अपने भी पराये लगने लगें तो भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए, हमें उम्मीद हमेशा रखनी चाहिए क्योंकि इसमें इतनी शक्ति है कि ये हर खोई हुई चीज हमें वापस दिल सकती है। जो हमसे दूर हो गया है उसे वापस पा सकते हैं क्योंकि जब तक साँस है तब तक आस है।

मेरी आंखों का ख्याल रखना

दिल्ली संकेत के लिए नई थी,अभी कुछ दिन पहले ही उसका सेलेक्शन बतौर साफ्टवेयर इंजीनियर गुड़गांव स्थित एक मल्टीनेशनल कंपनी में हुआ था। संकेत अपने कालेज के कुछ दोस्तों के साथ दिल्ली में रहता था और रोजाना मेट्रो ट्रेन से गुड़गांव अप-डाउन करता था।

हजारों लोग की भीड़ संकेत के साथ प्रतिदिन सफर करती थी। वह अक्टूबर महीने की शुरुआत के दिन थे, दिन जल्दी ढलने लगे थे और मौसम में हल्की ठंड का आगाज़ हुआ था। प्रतिदिन की तरह संकेत मेट्रो ट्रेन से वापस लौट रहा था, उसका स्टेशन आने ही वाला था कि एक स्टेशन पहले ट्रेन रूकी और एक लड़की ने उसके डिब्बे में प्रवेश किया और सामने वाली सीट पर बैठ गयी।

अगले दिन से संकेत ने महसूस किया कि न जाने क्यूं अब उसका आफिस से घर और घर से आफिस तक का समय आसानी से नहीं कटता, आते और जाते समय सफर के दौरान और स्टेशन पर हजारों की भीड़ में उसकी आँखें न जाने किसको ढूंढा करती हैं?

कुछ दिनों तक संकेत को वह लड़की नहीं दिखाई दी, एक दिन अचानक जब उसकी ट्रेन गंतव्य से एक स्टेशन पहले पहुंची तो ट्रेन की खिड़की से बाहर संकेत की निगाह गई, उसने देखा कि वही लड़की एक दूसरी लड़की का हाथ पकड़े हुए स्वचालित सीढ़ियों पर खड़ी हुई थी और रात में भी काला चश्मा पहने हुए थी। संकेत ने महसूस किया कि उसके दिल की धड़कन बढ़ गई है।

उस लड़की का नाम श्रुति था। श्रुति जन्म से ही कुछ देख नहीं सकती थी, उसने अपने मजबूत इरादों के बल पर उच्च शिक्षा प्राप्त की थी, वह सरकारी स्कूल में टीचर थी। कुछ दिनों की मुलाकात के पश्चात संकेत और श्रुति बहुत करीब आ गए थे। संकेत श्रुति की आंखें तो श्रुति संकेत की जुबान बन गई थी।

श्रुति हमेशा संकेत से कहती रहती थी की तुम मुझे इतना प्यार क्यूँ करते हो!मैं तुम्हारे किसी काम नहीं आ सकती मैं तुम्हें वो प्यार नहीं दे सकती जो कोई और देगा,लेकिन संकेत उसे हमेशा दिलासा देता रहता था कि तुम ठीक हो जाओगी, तुम्हीं मेरी दुनिया हो, कुछ समय तक ये सिलसिला यूहीं चलता रहा।

आज संकेत ने श्रुति से मिलने का वादा किया था, पर अंतिम समय में कुछ काम आ जाने से संकेत को देर हो गई थी और उसकी ट्रेन छूट गई थी, संकेत श्रुति को इंतजार नहीं करना चाहता था, उसने अपने दोस्त से बाइक मांग ली और तेज रफ्तार से श्रुति से मिलने के लिए निकल पड़ा।

काफी देर से श्रुति मेट्रो स्टेशन पर संकेत का इंतजार कर रही थी, जब काफी देर हो गई और घर जाने का समय हो गया तो उसने संकेत को फोन किया पर उसका फोन स्वीच आफ जा रहा था। अगली सुबह श्रुति को एक नामी अस्पताल से फोन आया कि किसी व्यक्ति ने आपकी आंखों के आपरेशन के लिए पैसे और अपनी आंखें दान की हैं। बहुत पूछने पर भी उस व्यक्ति का नाम और पता नहीं पता चल सका। श्रुति ने यह खुशी शेयर करने के लिए संकेत को फोन किया पर उसका फोन अभी भी स्वीच आफ था।

श्रुति को कुछ चिंता हुई पर उसने सोचा कि अाखों का आपरेशन कराकर वह संकेत को सरप्राइज देगी और सबसे पहले संकेत को देखेगी। श्रुति की आखों का आपरेशन सफल रहा। उसने अपनी सहेली से संकेत को फोन करने को कहा पर उसका फोन अभी भी बंद था। श्रुति के पास संकेत के रूम पार्टनर सुमित का नंबर भी था, जब उससे संपर्क किया गया तो उसने बस इतना कहा कि वो शाम को अस्पताल आएगा।

शाम को सुमित जब अस्पताल पहुंचा तो संकेत साथ नहीं था। श्रुति के बार बार पूछने पर वह बस इतना कह सका कि संकेत कहीं बिना बताए चला गया है, इसके आगे वह कुछ कह नहीं सका उसका गला रूंध गया और उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह वहां से चला गया और जाते जाते श्रुति के हाथों में एक पत्र थमा गया। श्रुति किसी अनहोनी की आशंका से सिहर उठी।

श्रुति ने कांपते हाथों से पत्र को खोला और पढना शुरू किया, पत्र अस्पष्ट राइटिंग और जल्दबाजी में लिखा था, इस पत्र में लिखा था कि जब तुम इस पत्र को नहीं पढ़ रही होगी तो शायद मैं तुम्हारे पास नहीं होऊंगा, पर यकीन मानों मैं हर पल तुम्हारे साथ हूं और तुम्हारी आँखों से सब कुछ देख रहा हूँ। पत्र के अंत में लिखा था – अपना और मेरी आंखों का ख्याल रखना, तुम्हारा – संकेत।

कुछ समय पश्चात श्रुति को सच पता चला । संकेत की बाइक को उस रात किसी तेज रफ्तार कार ने टक्कर मार दी थी। संकेत को गंभीर अवस्था में उसी अस्पताल में लाया गया था। जब संकेत को अस्पताल लाया गया तब उसकी चेतना पूरी तरह लुप्त नहीं हुई थी । जब संकेत को अस्पताल लाया गया तब उसकी चेतना पूरी तरह लुप्त नहीं हुई थी । शायद संकेत को यह अहसास हो गया था कि उसका अंतिम समय नजदीक है। इसलिए उसने सुमित के माध्यम से अस्पताल प्रसाशन के सामने अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त कर दी थी।

संकेत जाते भी अपना वादा निभा गया था। उसने श्रुति की अंधेरी दुनिया को रोशनी दे दी थी,वह हमेशा के लिए श्रुति की आंखों में बस गया था।

किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता

जीवन में सम्पूर्णता किसी को नहीं मिलती है। जिन्दगी से संपूर्णता की उम्मीद करना उसी तरह व्यर्थ है जैसे सूर्य से शीतलता की उम्मीद करना. जीवन की हर परिस्थितियां, हर घटनाएं और हर व्यक्ति अपने साथ खूबियों आौर कमियों दोनों को साथ लिए हुए आता है।खूबियां हमारी ताकत और कमियां हमारी कमजोरी बन जाती हैं। अपनी कमजोरियों को ताकत में बदलना ही मानव जीवन का उद्देश्य है।

हमें अगर गलती निकालनी हो तो हम भगवान से लेकर छोटे इन्सान तक में गलती पर्याप्त मात्रा में निकाल ही लेते हैं। बस हम अपनी ही गलतियों और कमियों की सही समीक्षा नहीं कर पाते हैं।

यदि मनुष्य अपनी गलतियों के प्रति सजग है तो उसे अपने जीवन को निखारने से कोई भी रोक नहीं सकता है। वह खुद भी एक अच्छा इंसान बनेगा और दूसरों को भी सही रास्ते पर चलने को कहेगा। मनुष्य के जीवन का एकमात्र उद्देश्य यही है कि वो अपने जीवन की निरन्तर समीक्षा करते हुए उसे बेहतर बनाए। वह बीते हुए कल से सीखकर आने वाले कल को और बेहतर बनाए।

बेकार से बेहतर की यात्रा ही हमें मंजिल की तरफ ले जाती है। यह सारे जीवन लगातार चलने वाली यात्रा है। हर दिन हमें बीते हुए कल से सीखने का मौका देता है। और हमें अवसर देता है खुद को कल से बेहतर बनने का।

जिदंगी में हर चीज चुनने का विकल्प हमारे पास नहीं होता है। कुछ चीजें कुछ व्यक्ति कुछ घटनाएं हमारे जीवन में स्वतः आ जाती हैं और घटित होती हैं। इनका अनुभव अच्छा या बुरा दोनों हो सकता है. वहीं कुछ चीजें जैसे सकारात्मक सोच, अच्छा व्यवहार, दूसरों की मदद, गलत का विरोध आदि का चुनाव हमारे हाथ में होता है.

जीवन की सार्थकता चीजों, परिस्थितियों और व्यक्तियों को उनकी अच्छाई और कमियों के साथ स्वीकार कर लेने में है।जब हम चीजों को उनकी अच्छाई और बुराई के साथ स्वीकार कर लेना सीख लेते हैं तब हम जीवन में आगे बढ़ जाते हैं। चीजों और परिस्थितियों को स्वीकार कर लेने के बाद हम ज्यादा बेहतर तरीके से समझ पाते हैं
और उनकी कमियों को दूर करने के लिए ज्यादा गंभीर प्रयास कर पाते हैं।

जिन्दगी में सिर्फ नकारात्मकता ही नहीं है,सभी के पास काफी कुछ एेसा है जो दूसरों के पास नहीं है। विचारों में बहुत शक्ति होती है,हम जैसा सोचते हैं वैसे ही बन जाते हैं।नकारात्मक विचार नकारात्मकता को और सकारात्मक विचार सकारात्मकता को आकर्षित करते हैं।आवश्यकता है खुद की समीक्षा करने की और अपनी ताकत और कमजोरियों को समझने की, जो हमें आने वाले अवसर और संभावित बाधाओं को पहचानने में मदद करते हैं।

यों तो दूर से देखने पर इतने छोटे से प्रयास की गंभीरता का अनुमान लगाना मुश्किल है पर यदि यह गुण हमारी दिनचर्या में शामिल हो जाता है तो धीरे-धीरे ही सही पर हमारी दृष्टि बाहर से मुड़कर भीतर की ओर हो जाती है और फिर हमें चीजों को देखने समझने का एक नया नजरिया मिल जाता है जो हमें और हमारे आने वाले कल को बीते हुए कल से बेहतर बना सकता है। मैं भी प्रयास कर रहा हूं आप भी कीजिए।