बीते हुए कल को गुजर जाने दो

बीते हुए कल की कड़वी यादें हमारा पीछा आसानी से नहीं छोड़ती हैं। ये यादें हमें पीड़ा देती हैं और परेशान करती रहती हैं। हम कोशिश तो बहुत करते हैं पर ये यादें हमें पीछे खींचती रहती हैं। हम रहते तो आज में हैं पर जीते उस बीते हुए कल के साथ हैं जिसकी यादें हमारे मन-मस्तिष्क को कुरेदती रहती हैं।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इन्सान अपने अतीत की सुखद घटनाओं के स्थान पर दुखद एवं पीड़ित करने वाले क्षणों को अधिक याद करता है। हमारे साथ किसने अच्छा किया है वह याद नहीं रहता जितना कि हमारे साथ बुरा हुआ है वह याद रहता है।

वर्तमान और अतीत की इस कशमकश में हमारा मन तनाव, ग्लानि और क्रोध से भर जाता है जिसका हमारे संबंध एवं कार्यक्षमता दोनों पर बुरा असर पड़ता है। बीते हुए कल के दुखद क्षणों को याद करते-करते हम वर्तमान में अपने संबंधों को भी अनजाने में ही प्रभावित करते रहते हैं।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यदि व्यक्ति किसी घटना को लगातार और लंबे समय तक याद करता रहता है तो वह दीर्घकालीन स्मृति में परिवर्तित होकर अवचेतन मन में चली जाती है और जैसे ही हम इस बारे में सोचते हैं तो हमारे मन-मस्तिष्क में अतीत की वह घटना पिक्चर की भांति चलने लगती है और हम उन घटनाओं के साथ जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

जब हम दर्द भरी दुखद घटनाओं को याद करते हैं तो हमारे शरीर में जैव रासायनिक क्रियाओं में वृद्धि हो जाती है। जिसके कारण अनेक हार्मोन का स्राव होता है इनमें से कुछ क्रियाएं और हार्मोन शरीर और मन के लिए अत्यंत हानिकारक होते हैं और इनका मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

बीते हुए कल की कड़वाहट से बचने का सबसे बढ़िया तरीका खुद को अपनी रूचि के अनुसार किसी अच्छे कार्य में मनोयोग पूर्वक लगाए रखना है। खुद की दिनचर्या में थोड़ा परिवर्तन करके उसे व्यवस्थित बनाने से भी मन पर अनावश्यक बोझ नहीं पड़ता है और मन काफी हद तक शांत और तनाव मुक्त हो जाता है। सही दिनचर्या के साथ हमें समय निकालकर प्रति दिन अच्छे साहित्य को भी पढ़ने का प्रयास करना चाहिए ताकि हमारा मन सकारात्मक सोच से भरा हुआ रहे।

अतीत की कडुआहट से बचने के लिए हमें वर्तमान में जीने का प्रयास करना चाहिए। जो वर्तमान को संभाल लेता है, वह अतीत की भूलों से सीख लेकर अपने भविष्य को संवार लेता है। जिंदगी बड़ी बहुमूल्य एवं बेहद खूबसूरत है,उसे केवल वर्तमान के पलों एवं क्षणों से सजाया और संवारा जा सकता है। यदि भविष्य को सँवारना हो तो अतीत को गुजर जाने दीजिए।










क्योंकि कल कभी नहीं आता है

अक्सर हमारे भीतर काम को टालने की बुरी आदत होती है। अपनी इस आदत के कारण अक्सर हम अपने बनते हुए कामों को बिगड़ बैठते हैं, जिससे हमें भारी नुकसान उठना पड़ता है।अपनी इसी आदत की वजह से कभी-कभी हम मंज़िल के करीब होकर भी चूक जाते हैं।

आज किसी काम का जितना महत्व है, कल भी उसका उतना ही महत्व रहेगा इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। परिस्थितियों के समीकरण हर क्षण बदलते रहते हैं। कभी-कभी काम को समय से पूरा नहीं करने पर बदली हुई परिस्थितियों में कार्य का महत्व समाप्त हो जाता है।

टालमटोल की आदत एक गंभीर बीमारी है, जो जिस व्यक्ति को लग जाती है वो अपनी जिंदगी में अनेक महत्वपूर्ण कार्यों को पूरा नहीं कर पाता है। यहां तक कि उसके निजी जीवन के महत्वपूर्ण कार्य भी अधूरे रह जाते हैं। एेसे व्यक्ति दिखाई तो हर समय व्यस्त देते हैं पर असलियत में कामों का बोझ उनके सिर पर लदा रहता है और उनसे बचने के लिए वे हर समय काम को दूसरों पर धकेलने की कोशिश करते रहते हैं।

यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि टालमटोल करने वाला व्यक्ति परिस्थितियों का शिकार भी हो सकता है। खराब स्वास्थ्य, मानसिक दुर्बलता, काम का अत्यधिक बोझ, जानकारी का अभाव आदि एेसे कारण हैं जिनके कारण कभी-कभी काम को टालना व्यक्ति की विवशता बन जाती है।

काम का भार अधिक दिखाई पड़ने पर एक चिड़चिड़ापन हमारे स्वभाव में आ जाता है परंतु हाथों हाथ काम को करते रहने पर एेसी स्थिति से काफी हद तक बचा जा सकता है। मुश्किल परिस्थितियों में कार्यक्षमता को बढ़ाने का प्रयास हमें करना चाहिए और मन में उत्साह को जगाकर दृढ़तापूर्वक पूरी शक्ति लगाकर कार्य को पूरा करने का प्रयास हमें करना चाहिए।

कठिन काम से निराश मत होइए। बड़े से बड़े काम भी मन लगाकर करने से समय पर पूरे हो जाते हैं। हमें छूटे हुए कामों की एक लिस्ट बनानी चाहिए, उसमें से भी अत्यंत आवश्यक कार्यों को चुनकर उन्हें प्राथमिकता के आधार पर पूरा करना चाहिए, कम आवश्यक कामों को पीछे पूरा किया जाना चाहिए।

यदि हम किसी काम के पीछे हाथ धोकर पड़ेगें तो देर से ही सही लेकिन वो काबू में अवश्य आएगा। हमें काम को बोझ समझ कर भी नहीं करना चाहिए और काम करते समय झुंझलाहट से बचना चाहिए, हमें अपने मन को कार्य की जटिलता सुलझाने में लगाने का प्रयास करना चाहिए। एेसा करने से हमारी निर्णय लेने की क्षमता विकसित होगी और हम आज हो सकने वाले कामों को कल पर नहीं टालेंगें,क्योंकि कुछ कामों के लिए कल कभी नहीं आता है।







दिखावे से कुछ हासिल नहीं होता

वरूण ने देश के एक प्रतिष्ठित संस्थान से मैनेजमेंट की शिक्षा प्राप्त की थी और उसका कैंपस सेलेक्शन एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में एक अच्छे पद पर हुआ था। आज उसका आफिस में पहला दिन था।

कंपनी ने वरूण को काम करने के लिए अलग से एक केबिन दिया था, उसका केबिन शानदार और अाधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण था।

वरूण अपनी कुर्सी पर बैठे हुए अपने केबिन को निहार रहा था और सुखद भविष्य की कल्पनाओं में खोया हुआ था तभी केबिन के दरवाजे पर से खट-खटाने की आवाज आने लगी,वरूण ने देखा दरवाजे पर एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति साधारण सी वेशभूषा में खड़ा था, वह व्यक्ति अंदर आने की अनुमति मांग रहा था, पर उसे अंदर आने के लिए कहने के बजाय वरूण ने उस व्यक्ति से आधा घँटा बाहर इंतजार करने के लिए कहा।

आधा घँटा बीतने के पश्चात वह आदमी फिर से केबिन के गेट पर आकर अंदर आने की अनुमति मांगने लगा, उसे गेट पर खड़ा देख वरूण ने अपनी टेबल पर रखे टेलीफोन के रिसीवर को उठा लिया और बातें करनी शुरू कर दीं।

वरूण फोन पर किसी से बहुत सारे पैसो की बाते करने लगा वह फोन पर ही अपने ऐशो आराम के बारे मे कई प्रकार की डींगें हाँकने लग गया,सामने गेट पर खड़ा वह व्यक्ति उसकी सारी बातें चुपचाप सुन रहा था,इसकी बिना कोई परवाह किए वरूण ने फोन पर बड़ी-बड़ी डींगें हांकने जारी रखा।

आखिरकार जब वरूण की बातें खत्म हो गयीं तब जाकर उसने बड़े अनमने भाव से उस साधारण दिखने वाले व्यक्ति से पूछा कि तुम यहाँ क्या करने आये हो?

उस आदमी ने वरूण को विनम्र भाव से देखते हुए कहा कि साहब, मै यहाँ टेलीफोन रिपेयर करने के लिए आया हूँ,मुझे खबर मिली थी कि आप जिस टेलीफोन से बात कर रह थे वो हफ्ते भर से बँद पड़ा है इसलिए मै यहां इस टेलीफोन को रिपेयर करने के लिए आया हूँ।

इतना सुनते ही वरूण शर्म से लाल हो गया, उसे कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था, वह चुप-चाप कमरे से बाहर चला गया। उसे अपने दिखावे का फल मिल चुका था।

वरूण की भांति ही हमे भी जब कभी जिंदगी में सफलता मिलती है और हम एक मुकाम हासिल कर लेते हैं,तब हमें अपने आप पर बहुत गर्व महसूस होने लगता है। सफलता मिलने के बाद गर्व होना स्वाभाविक भी है, गर्व करने से हमें खुद के स्वाभिमानी होने का एहसास भी होता है।

अक्सर यहीं हमसे चूक हो जाती है,एक सीमा के बाद यह गर्व अहंकार का रूप ले लेता है और हम कब स्वाभिमानी से अभिमानी बन जाते हैं इसका स्वयं हमें भी पता नहीं चलता है। अभिमानी बनते ही हम दूसरों के सामने झूठा दिखावा करने लगते हैं,और ऐसा करते हुए हम अपने स्तर को और भी नीचे गिरा लेते हैं।

यह आवश्यक है कि जिंदगी में ऊंचे मुकाम पर पहुंच कर भी हम विनम्र बने रहें और व्यर्थ के अहंकार और झूठे दिखावे में ना ही पड़ें अन्यथा वरूण की तरह हमें भी कभी न कभी शर्मिंदा होना पड़ सकता है।

व्यर्थ के दिखावे से कुछ हासिल नहीं होता है, इससे बचने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है कि जीवन में मिलने वाली हर छोटी बड़ी सफलता को सिर्फ पड़ाव समझा जाए, इसे मंजिल समझने की भूल न की जाए, हमें जीवन में एक मुकाम को हासिल करने के बाद दूसरे को और फिर तीसरे को और इस तरह से अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।




जो जैसा करेगा वो वैसा भरेगा

कहते हैं कि कर्मों की गति बड़ी गहन होती है । हम जो कुछ भी कर्म आज करते है वो भविष्य मे हुमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है । कर्मफल के सिद्धान्त अटल और अकाट्य हैं। कभी जल्दी तो कभी देर से और कभी बहुत देर से पर कर्मों का फल मिलता अवश्य है।

कर्मों की गति गहन होती है जिसको साधारण बुद्धि और विवेक से समझना और उसकी वयाख्या करना आसान नहीं है। हमारे किन कर्मों के फल भविष्य मे किस रूप के मिलेंगे इसके बारे मे स्पष्ट रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है। साधारण मनुष्य के लिए तो इतना ही समझ लेना काफ़ी है क़ि जो जैसे करेगा वो वैसा ही भरेगा।

देव का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। बचपन में ही माता पिता का साया उठ गया था। जीविका चलाने के लिए वह फेरी लगाकर सामान बेचता था और उसी से स्कूल की फीस भी भरता था।

वो जेठ के महीने के दिन थे आसमान में सूर्य पूरी प्रचंडता के साथ चमक रहा था। आसमान से मानो आग बरस रही थी। पेड़ पौधे, जीव जंतु सभी त्रस्त थे, धरती मानों वीरान सी हो गई थी।

इस प्रचंड गर्मी में भी देव समान बेचने के लिए घर घर घूम रहा था। उसे इस महीने के अंत में हर हाल में अपनी स्कूल की फीस भरनी थी। आज सुबह से ही उसका कोई सामान नहीं बिका था दोपहर होने को आई थी वह भूख प्यास से बेहाल हो रहा था।

जब भूख और प्यास असह्य हो गई तो उसने निश्चय किया कि अब वह जिस घर में भी जाएगा वहां पीने के लिए पानी और खाने के लिए कुछ मांग लेगा। देव ने एक घर का दरवाजा खटखटाया तो एक लड़की बाहर आयी उसे देखकर देव को कुछ संकोच हुआ और उसने खाने के बजाय सिर्फ पीने के लिए पानी मांग लिया।

लड़की ने न जाने कैसे यह भांप लिया कि वह भूखा है वह अंदर गई और वह दूध से भरा एक बड़ा गिलास ले आई। लड़के ने दूध पी लिया और धन्यवाद देते हुए दूध की कीमत पूछी। इस पर लड़की ने कहा कि पैसे किस बात के? आप यहां चाहें मेहमान की तरह आए हों अथवा जरूरतमंद की तरह, दोनों ही स्थितियों में आपसे पैसे लेना नहीं बनता है।

इस घटना के कई वर्षों बाद वह लड़की गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। जब स्थानीय चिकित्सक सफल नहीं हुए तो उसे शहर के एक बड़े अस्पताल ले जाया गया। उसकी स्थिति को देखते हुए एक विशेषज्ञ डॉक्टर को मरीज देखने के लिए बुलाया गया उन्होंने लड़की को देखा और तय कर लिया कि उसकी जान बचनी ही चाहिए। डाक्टर की मेहनत रंग लाई और लड़की की जान बच गई।

डॉक्टर अस्पताल के कार्यालय में गये और उस लड़की के इलाज का बिल माँगाया . इस बिल के कोने मे उन्होने एक नोट लिखा और बिल को लड़की के पास भिजवा दिया। बिल देखकर लड़की सोचने लगी कि बीमारी से तो वह बच गयी है, पर अब बिल कैसे भरेगी?

उसने बिल को देखा तो उसकी नज़र बिल के कोने पर लिखे संदेश पर गयी। वहां पर लिखा था कि आपको इस बिल का भुगतान करने की कोई आवश्कता नही है। एक गिलास दूध के माध्यम से आपके द्वारा इस बिल का भुगतान वर्षों पहले ही किया जा चुका है । नीचे डॉक्टर देव के हस्ताक्षर थे।

लड़की समझ चुकी थी कि जिस लड़के की उसने वर्षों पहले एक गिलास दूध देकर मदद की थी उसी ने आज उसे इतने बड़े संकट से मुक्त किया है।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि समय आने पर हमे हमारे कर्म परिपक्व होकर कर्मों का फल देते ही हैं। आवश्यकता है तो बस लगतार सत्कर्म करने की साथ ही फल की प्राप्ति के लिए हमें अधीर भी नही होना चाहिए।

इस सन्दर्भ में कबीरदस जी का बड़ा ही सटीक दोहा है-

धीरे -धीरे रे मना, धीरे सब कछु होये।
माली सींचै सौ घड़ा, ऋतु आए फल होये।।




खुद को जानना भी जरूरी है

खुद को जानना ही ज्ञान की पराकाष्ठा है। खुद को समझे बिना किसी और को समझने का मूल्य कुछ भी नहीं है। जो खुद से बेगाना है वह दूसरों से कितना भी घुल मिल जाए उसका कोई अर्थ नहीं है। स्वयं के अनुभव के बिना दूसरों से प्राप्त ज्ञान में हित कम अहित ज्यादा है।

हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम स्वयं के प्रति उदासीन हैं। हम खुद के प्रति सजग नहीं हैं। चिराग तले अंधेरा वाली कहावत हमारे जीवन में सत्य सिद्ध हुई है। एेसे में यदि हमारी जीवन भटककर गलत दिशा में चला जाता है तो इसमें अचरज कैसा? खुद के प्रति अनजान बने रहने के कारण हमारी जिंदगी की स्थिति उस नाव की भांति है जिसका मांझी सो गया है फिर भी नाव किसी तरह, इधर-उधर लहरों के सहारे बही चली जा रही है।

इससे पहले कि हम यह जानें कि हम क्या होगें, यह जान लेना जरूरी है कि हम क्या हैं? हम जो भी हैं उसे पहचानकर, समझकर ही उस भविष्य की रचना की जा सकती है जो अभी तक हमारे भीतर कहीं सो रहा है।

हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? यदि हमें इस प्रश्न का उत्तर खोजना है तो इसकी तलाश खुद के भीतर से ही प्रारंभ करनी होगी, खुद को समझ लेने के बाद ही संसार से प्राप्त ज्ञान का सही उपयोग हो पाता है अन्यथा यह ज्ञान खोखला ही साबित होता है जो सिर्फ हमारे भीतर अहंकार का ही पोषण करता है।

ज्ञान और जानकारी में फर्क है जो हमें अपने भीतर से, खुद को खोजने से, खुद के विषय में प्राप्त होता है वही ज्ञान है बाकी जो कुछ हम संसार से सीखते हैं वो जानकारी है।
हममें से ज्यादातर लोगों के पास जानकारी तो बहुत है पर ज्ञान बहुत अल्प या नहीं के बराबर है।

ज्ञान प्राप्त करने की पहली शर्त खुद को जानने की है। यदि इस बिंदु पर अंधकार है तो सब जगह अंधेरा है। यदि यहां प्रकाश है तो सर्वत्र उजाला है।

आसान नहीं है खुद को जानना, बहुत कोशिश करनी पड़ती है पर जीवन को सार्थक बनाने की यह अनिवार्य शर्त है। आप भी खुद को समझने की कोशिश कीजिए, मैं भी कर रहा हूं।




क्योंकि शब्दों के घाव भी गहरे होते हैं

आज के युग मे इंसान को क्रोध बहुत जल्दी आता है. गुस्सा एक तरह का मनोविकर है जिसका मुख्य कारण तनाव पूर्ण जीवनशैली है.
क्रोध एक ऐसी अग्नि है जो सबसे पहले खुद को जलती है कहते है क्रोध करने वाले इंसान को उसका क्रोध स्वय सज़ा देता है.

आज बहुत दिनो की बारिश के बाद आज मौसम साफ हुआ था .पर समीर अपने कमरे मे उदास बैठा था उसकी आज ऑफीस मे फिर से किसी से किसी बात पर बहस हुई थी उसका मान गुस्से से भरा हुआ था. यू तो समीर एक होशियार और मेहनती कर्मचारी था पर उसके भीतर एक ही कमी थी कि उसे क्रोध बहुत जल्दी आता था.

छोटी छोटी बातों में अपना टेम्पर लूज कर देना समीर का स्वभाव बन गया था.अपनी इस आदत से स्वयं समीर भी परेशान था और इस आदत से छुटकारा पाना चाहता था .पर यह सब इतनी तेजी से होता था कि वो कुछ भी सोच समझ नहीं पाता था .उसने बहुत कुछ सीखा था पर क्रोध पर नियंत्रण करना वो नहीं सीख पाया था

बहुत प्रयास करने के बाद भी जब उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ तो उसने अपने मित्र अनुराग से मदद माँगी. अनुराग समीर को लेकर मठ मे अपने गुरुजी के पास गया समीर ने गुरुजी से अपनी समस्या बतायी और सहयता करने की अपील की.

समीर की बात सुन कर गुरुजी मुस्कुराने लगे उन्होने समीर को कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि, अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना.

पहले दिन समीर ने छोटी छोटी बातों में दिनभर में बीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी. पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक काबू करना सीख लिया. और फिर एक दिन ऐसा आया समीर ने पूरे दिन में एक बार भी अपना टेम्पर लूज नहीं किया.

जब उसने अपने मित्र अनुराग को ये बात बताई तो वह उसे लेकर फिर आश्रम गया जहा समीर की बात सुनकर गुरुजी ने कहा आज से, अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो उस दिन इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना.

समीर ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब समीर ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने मित्र अनुराग को ख़ुशी से ये बात बतायी.

कुछ दिनों बाद गुरुजी अनुराग के साथ समीर के घर आये और उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, बेटा तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो. अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था.जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं.

गुरुजी के जाने के बाद समीर फिर से बाड़े के पास गया और बाड़े में हुए छेदों पर हाथ फेरने लगा उसे यह महसूस हो रहा था कि मानों ये बाड़े के छेद न होकर लोगों के ह्दय थे जिन्हें उसने अपनी बातों से छलनी कर दिया था. उसकी आखों मे आसू आ गये थे .समीर ने मन ही मन गुरुजी को धन्यवाद दिया और निश्चय किया कि वो अब क्रोध करके इस बाड़े में और कील नहीं ठोकेंगा.

इसलिए अगली बार आप भी अपना टेम्पर लूज करने से पहले ज़रूर सोचियेगा कि क्या आप भी उस बाड़े में और कीलें ठोकना चाहते हैं!




जिसकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है

Abhishek Trehan on 12/08/2017

जगदीश सिंघानिया एक सफल बिजनेसमैन होने के साथ-साथ एक बेहतरीन इंसान भी थे। उनका जीवन मेहनत और सेवा की अद्भुत मिसाल था। उन्हें बिजनेस में जो भी लाभ होता उसका एक बडा हिस्सा वे समाज सेवा के कार्यों में खर्च करते थे।

उन्होंने अपने दिवंगत पिता के नाम से एक ट्रस्ट की स्थापना की थी जिसके माध्यम से अनेक अस्पताल, स्कूल कालेज, मंदिर आदि का संचालन होता था। अहंकार तो मानो उन्हें छू भी नहीं गया था पीड़ित मानवता की सेवा व सहायता को मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म मानते थे।

आज उनके ट्रस्ट द्वारा संचालित एक कालेज में वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जिसका शीर्षक था ‘प्राणिमात्र की सेवा’ इस प्रतियोगिता में बतौर मुख्य अतिथि जगदीश सिंघानिया को आमंत्रित किया गया था।

प्रतियोगिता समय पर प्रारंभ हुई जिसमें बोलने के लिए कई विद्यार्थी मंच पर आए और एक से बढ़कर एक भाषण देकर भी गए, जब पुरूस्कार देने का समय आया तो सभी निगाहें निर्णायक मंडल की ओर उठ गयीं, सभी को विजेता का बेसब्री से इंतजार था तभी सिंघानिया अचानक अपनी कुर्सी पर से उठे और निर्णायक मंडल के पास जाकर कुछ कहने लगे।

कुछ देर बाद सिंघानिया पुरूस्कार देने मंच पर पहुंचे गए और उन्होंने स्वयं उन्होंने प्रतियोगिता के विजेता के नाम की घोषणा की, उन्होंने प्रतियोगिता का विजेता एक एेसे छात्र को घोषित किया था जो प्रतियोगिता में सम्मिलित ही नहीं हुआ था। यह देखकर प्रतिभागियों और कुछ शिक्षकों में भी रोष के स्वर उठने लगे। उनमें से कुछ मिलीभगत का आरोप भी लगाने लगे।

उन्हें शांत कराते हुए जगदीश सिंघानिया बोले मेरे प्रिय मित्रों एवं विधार्थीयों मुझे पता है कि इस विद्यार्थी के विजेता के रूप में चयन से आप सभी आश्चर्यचकित एवं शंकित हैं परंतु इससे पहले कि आप किसी नतीजे पर पहुंचे मैं आपको बताना चाहता हूं कि आप के कालेज के मुख्य गेट से अंदर आते समय मैने वहां एक कुत्ते को घायल अवस्था में देखा जिसके मुहं से लगातार खून बह रहा था।

हम सभी ने उसी गेट से अंदर प्रवेश किया पर किसी ने भी उस कुत्ते की ओर आंख उठा कर भी नहीं देखा। यही छात्र एकमात्र ऐसा था जिसने बिना प्रतियोगिता की परवाह किए वहां रूककर उस कुत्ते का उपचार किया,उसे पानी पिलाया और उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़कर आया।

सिंघानिया कह रहे थे कि सेवा-सहायता व्याख्यान का विषय नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की कला है। जो अपने व्यवहार और आचरण से शिक्षा देने का साहस न रखता हो, उसका ज्ञान, उसका भाषण कितना भी ओजस्वी क्यूं न हो, उसकी कथनी और करनी में फर्क होता है। एेसा ज्ञान जो व्यवहार और आचरण में न उतर सके वह अधूरा और उधार का ज्ञान होता है और एेसा ज्ञान पुरूस्कार पाने के योग्य नहीं होता है।

सत्य का पता चलते ही असंतुष्ट विधार्थीयों और शिक्षकों की गर्दन शरम से नीची हो गई और वे पुरस्कृत विधार्थी के व्यवहार के प्रति नतमस्तक हो गए।