अंधेरों से भी आ रही रोशनी है

By- Abhishek Trehan on 31st July 2017

शिवम अपने परिवार के साथ शहर के एक साधारण मोहल्ले में रहता था। शहर के ज्यादातर मोहल्लों की तरह उसका मोहल्ला भी बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा था।
उसके मोहल्ले में बिजली के खम्भे तो लगे थे पर उन पर लगी लाइटें वर्षों से खराब थीं और बिजली विभाग में बार-बार शिकायत करने के बावजूद भी कोई उन्हें ठीक करने नहीं आता था ।

शाम ढलते ही बाहर अंधेरा हो जाता था जिसके कारण मोहल्ले वालों एवं सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को काफी परेशानी उठानी पड़ती थी और दुर्घटना होने की आशंका भी बनी रहती थी। अभी कुछ दिन पहले ही एक मोटरसाइकिल सवार ने मोहल्ले में अँधेरे का फायदा उठाकर कोचिंग से लौट रही उसकी बहन की चेन खींचने की कोशिश की थी और शोर मचाने पर वह बदमाश अंधेरे का फायदा उठाकर भाग निकला था।

यह सब देखकर शिवम को सिस्टम पर बहुत गुस्सा आता था वह समझ नहीं पा रहा था कि इस समस्या को कैसे दूर किया जाए इस संबंध में जब वह अपने बड़ों, अपने माता-पिता या पड़ोसियों से कहता तो सब इसे सरकार और प्रशासन की लापरवाही कह कर टाल देते थे और उसे समझाने का प्रयास करते हुए कहते थे कि हमारे देश में सरकारी विभागों में यही वर्क कल्चर है, यहां कुछ भी बदलने वाला नहीं है तुम भी इस बात को स्वीकार कर लो और व्यर्थ में परेशान होना छोड़ दो।

ऐसे ही कुछ महीने और बीत गए फिर एक दिन शिवम के दादाजी गांव से आ रहे थे। जाड़े के दिन थे कोहरा होने के कारण उनकी ट्रेन काफी लेट हो गई थी, लगभग आधी रात के समय शिवम के पिताजी दादा जी को स्टेशन से लेकर लौट रहे थे, मोहल्ले में हमेशा की तरह अंधेरा था, वे घर के पास ही थे कि कहीं से कुछ कुत्तों का झुंड आ गया और उनके पीछे लग गया दादाजी उनसे बचने के लिए तेजी से चलने लगे, अंधेरे के कारण उन्हें खुला हुआ मेनहोल दिखाई नहीं दिया और वे बेचारे बुजुर्ग मेनहोल के गड्ढे में जा गिरे, दादाजी गिरने से गंभीर रूप से घायल हो गए और उनके पैर में फ्रेक्चर हो गया।

अगले दिन शिवम खुद बिजली विभाग के दफ्तर गया और लाइनमैन से खम्भे की लाइटें ठीक करने को कहा उसने वहां उपस्थित बाबू को कल रात का घटनाक्रम भी बताया पर सरकारी नौकरशाही की मोटी चमड़ी पर बच्चे की बात का कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने उसे यह कहते हुए वापस कर दिया कि अभी तुम्हारे मोहल्ले के लिए बजट नहीं आया है जब पैसा आएगा लाइटें तब ठीक करा दी जाएंगी

सरकारी मशीनरी के दांव-पेंच से अनजान वह बच्चा वापस आ गया। शिवम समझ चुका था कि यह समस्या उसकी है और उसे ही सामाधान भी ढूंढना पड़ेगा, दूसरों से मदद की उम्मीद रखना अब व्यर्थ है। अगले दिन सुबह उसने अपनी गुल्लक तोड़ दी और बाजार चला गया जब वह लौटा तो अपने साथ बिजली का कुछ तार और एक लम्बा बांस ले आया।

शाम को अपने कुछ दोस्तों की मदद से शिवम ने अपने घर के सामने बाँस गाड़कर उस पर एक बल्ब लटका दिया जब आस-पड़ोस के लोगों ने देखा तो पूछा , अरे शिवम तुम यह क्या कर रहे हो?

शिवम ने कहा मैं अपने घर के सामने एक बल्ब जलाने की कोशिश कर रहा हूँ, अरे इससे क्या होगा, अगर तुम एक बल्ब लगा भी लोगे तो पूरे मोहल्ले में प्रकाश थोड़े ही फैल जाएगा, आने जाने वालों को तब भी तो परेशानी उठानी ही पड़ेगी, देखना तुम्हारा प्रयास व्यर्थ ही साबित होगा। एेसा कहते हुए वे लोग वहां से चले गए।

शिवम ने मन ही मन सोचा कि हो सकता है कि उन लोगों की बात सही हो है पर ऐसा कर के मैं कम से कम अपने घर के सामने से जाने वाले लोगों को तो परेशानी से बचा ही पाउँगा। रात को जब बल्ब जला तो बात पूरे मोहल्ले में फैल गयी। किसी ने रोहित के इस कदम की खिल्ली उड़ाई तो किसी ने उसकी प्रशंशा की।

एक-दो दिन बीते तो लोगों ने देखा की कुछ और घरों के सामने लोगों ने बल्ब टांग दिए हैं। फिर क्या था महीना बीतते-बीतते पूरा मोहल्ला ही प्रकाश से जगमगा उठा। एक छोटे से लड़के के एक कदम ने इतना बड़ा बदलाव ला दिया था।

धीरे-धीरे पूरे शहर में ये बात फैल गयी सोशल मीडिया में भी यह खबर तेजी से वायरल हुई और अंत में प्रशासन को भी अपनी गलती का अहसास हुआ और मोहल्ले में स्ट्रीट-लाइट्स को ठीक करा दिया गया।

कई बार हम किसी अच्छे काम को करने में इसलिए संकोच करते हैं क्योंकि हमें उससे होने वाला बदलाव हमें बहुत छोटा प्रतीत होता है। पर हकीकत में हमारा एक छोटा सा कदम भी एक बड़ा बदलाव लाने की ताकत रखता है, जरूरत है तो बस खुद पर भरोसा रखते हुए एक पहल करने की और वह बदलाव बनने की जो हम दुनिया में होते हुए हम देखना चाहते हैं याद रखिए जहां उम्मीद है वहां जीवन है।




कुछ सबक जो जिंदगी बदल देते हैं

By Abhishek Trehan on 29/07/2017

एक छोटी सी लड़की अपने पिता के साथ मंदिर गयी थी। तभी मंदिर के प्रवेश द्वार पर उसने शेर की प्रतिमा को देखा उस पत्थर के शेर को देखकर वो छोटी सी बच्ची डर गयी और रोते हुए कहने लगी पापा जल्दी से यहां से चलो नहीं तो ये शेर हमें मारकर खा जायेगा।

उसके पिता ने बच्ची को गोद में उठा लिया और उसे समझाते हुए कहने लगे मुन्नी डरो नहीं ये शेर तो पत्थर का है ये हमारा कुछ बिगाड़ नहीं पायेगा।

मंदिर में मूर्ति के दर्शन के बाद वे दोनों बाहर आ गये। मंदिर के बाहर एक अपाहिज बैठा हुआ था उसके साथ एक छोटा लड़का भी था वे मंदिर के बाहर आने वाले हर व्यक्ति से कुछ मांग रहे थे और मिलने वाले पैसों और प्रसाद को अलग – अलग थैलों में डाल रहे थे।

जब पिता और पुत्री उस अपाहिज व्यक्ति के पास से गुजरे तो उसने अपना हाथ आगे कर दिया पिता ने अनमने भाव से पांच रूपये का सिक्का निकाला और उस अपाहिज के पास फेंक दिया तभी वो छोटा सा लड़का दौड़कर थैला लेकर आया और इशारे से थैले में प्रसाद डालने के लिए आग्रह करने लगा। पिता ने बच्ची को गोद में उठाया और उस लड़के को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ गए। ये शहर के प्रतिष्ठित वकील सुधीर चक्रवर्ती और उनकी बेटी पालकी थे।

सुधीर अभी पार्किंग में खड़ी हुई अपनी गाड़ी के पास पहुंचे ही थे कि न जाने कहां से वही लड़का दौड़ता हुआ आया और उनका हाथ पकड़ कर खींचने लगा सुधीर को लगा कि वह उनसे प्रसाद देने की जिद कर रहा है उन्हें लड़के का यह व्यवहार पसंद नहीं आया और उन्होंने को बिना कोई मौका दिये अपना हाथ झटके के साथ छुड़ाया और लड़के के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया।

सुधीर के इस व्यवहार से हतप्रभ वह लड़का वहीं जमीन पर गिर पड़ा उसकी आँखों में आँसू आ गए थे। सुधीर ने देखा कि वह अपाहिज भिखारी दूर से ही उन्हें रूकने का इशारा करते हुए जमीन पर घिसटते हुए तेजी से उनकी तरफ चला आ रहा है। अब तक थोड़ी भीड़ भी तमाशा देखने के लिए जुट गई थी। सुधीर को महसूस हुआ कि बात बढ़ गई है और उन्होंने सौ रुपए का नोट उसे देने के लिए निकाल लिया वह लोगों से पैसा लूटने की इन लोगों की इस चाल को समझ चुके थे।

वह बूढा अपाहिज भिखारी सुधीर के पास आकर हाथ जोड़कर कहने लगा बाबूजी लगता है कि इस लड़के से कोई गलती हो गई है इसे माफ कर दीजिए, यह लड़का बोल नहीं सकता है। इसे मैंने ही आपको बुलाने के लिए भेजा था दरअसल आपकी बिटिया की चांदी की पायल मंदिर में गिर गई थी जिसे यह बच्चा उठाकर मेरे पास ले आया उसे वापस करने के लिए ही इसे मैंने आपको बुलाने के लिए भेजा था।

सुधीर अपने बिस्तर पर लेटे हुए करवटें बदल रहे थे उन्हें आज नींद नहीं आ रही थी रह रह कर उस अपाहिज भिखारी और उसके गूँगे लड़के का चेहरा उनकी आखों के सामने आ जाता था। सुधीर ने देखा कि पालकी भी अभी जाग रही है उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और प्यार से पूछा बिटिया रानी ये बताओ कि मंदिर में तुमने आज भगवान से क्या माँगा? पालकी ने कहा कुछ नहीं मांगा क्योंकि शेर की प्रतिमा की तरह ही मंदिर में भगवान भी पत्थर के हैं।

सुधीर उठे और अपनी डायरी में आज की तारीख डालकर लिखने लगे आज मैं अपनी बेटी के उत्तर के सामने निशब्द और निरूउत्तर हूं। मैं आज तक ईश्वर को मंदिर में पत्थरों में खोज रहा था। पर आज पता चला कि वो वहीं मंदिर के बाहर इंसानों में इंसानियत के रूप में मौजूद था जिसे पहचानने में मुझसे गलती हो गई ।




हर बार भूल सुधारने का मौका नहीं मिलता

Abhishek Trehan 28/07/2017

राधिका और सिद्धार्थ की मुलाकात एक सोशल नेटवर्किंग साइट पर हुई थी। समय के साथ उनकी दोस्ती गहरी हो गई थी। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती मुलाकातों में और फिर मुलाकातें गहरे प्रेम में रूपांतरित हो गईं थीं। इस प्रेम की परीणिति शादी के रूप में हुई और दोनों विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए।

प्रेम उन्मुक्त होता है पर विवाह एक बंधन है, प्रेम सुखद कल्पना है तो विवाह यथार्थ का धरातल है। यथार्थ का जमीन कठोर होती है जहां कोरी भावुकता से काम नहीं चलता है। विवाह के रिश्ते से जुड़ी हुई कुछ मर्यादाएं और जिम्मेदारियां होती हैं जिसका पालन पति-पत्नी दोनों को करना पड़ता है। शुरुआत के कुछ वर्षों तक तो सिद्धार्थ और राधिका काफी हँसी मजाक और नोक झोंक किया करते थे। पर शादी के सालों बाद उनमें छोटी छोटी-छोटी सी बातों पर झगड़े होने लगे।

इस बेकार की लड़ाई में कोई भी झुकने को तैयार नहीं था उन दोनों का अहंकार हिमालय से भी ऊंचा था। समय पंख लगा कर उड़ रहा था अब उनके जीवन में एक नन्हीं सी परी मुस्कान भी आ गई थी जिसकी परवरिश की जिम्मेदारी उन पर थी। मुस्कान के आने के बाद राधिका का अधिकांश समय बेटी की देखभाल करने में बीतता था राधिका और सिध्दार्थ के बीच अब संवाद कम और खामोशी बढ़ गई थी। दोनों बिना कुछ कहे खामोशी से जिंदगी की गाड़ी को किसी तरह से खींच रहे थे।

जीवन में कुछ घटनाएं एेसी घटती हैं जो हमारे नजरिये को बदल कर रख देती हैं एेसा ही कुछ राधिका और सिद्धार्थ के जीवन में भी घटित हुआ था। उस दिन उनकी शादी की सालगिरह थी, राधिका ने उस दिन सिद्धार्थ को विश नहीं किया वो पति के रिस्पॉन्स को देखना चाहती थी। उस दिन सिध्दार्थ सुबह जल्दी उठा और बिना कुछ कहे घर से बाहर निकल गया। राधिका रुआँसी हो गई उसे लगा सिध्दार्थ आज के दिन उसे इग्नोर कर रहा है।

दो घण्टे बाद घर की कॉलबेल बजी, राधिका दौड़ती हुई गई और जाकर दरवाजा खोला । दरवाजे पर गिफ्ट के पैकेट और उसकी पसंद के फूलों के बुके के साथ सिध्दार्थ खड़ा मुस्कुरा रहा था। सिध्दार्थ ने उसे गले से लगा लिया और सालगिरह को विश किया। फिर वह बिना कुछ कहे अपने कमरे मेँ चला गया।

राधिका गिफ्ट का पैकेट खोल कर देखने लगी तभी उसके मोबाइल फोन पर घंटी बजी उसके पास स्थानीय पुलिस स्टेशन से फोन आया था फोन पर पुलिस वाला कह रहा था कि सारी मैम बहुत दुख के साथ आपको बताना पड़ रहा है कि आपके पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है, उनकी जेब में पड़े पर्स से आपका फोन नम्बर ढूढ़ कर आपको कॉल किया है।

राधिका के हाथ से फोन छूट कर जमीन पर गिर पड़ा उसे इस खबर पर सहसा विश्वास ही नहीं हुआ वह सोचने लगी की सिध्दार्थ तो अभी-अभी घर के अन्दर आये हैं और मुझे गले लगाकर विश भी किया है जरूर पुलिस वालों को कोई गलतफहमी हुई है । तभी उसके दिमाग में एक बात बिजली की तरह कौँध गई उसे कहीं पर सुनी एक बात याद आ गई कि मरे हुये इन्सान की आत्मा अपनी विश पूरा करने एक बार जरूर आती है। क्या सिद्धार्थ सचमुच में मर चुका था?

राधिका बदहवास होकर दहाड़े मारकर रोने लगी। उसे सिद्धार्थ से अपना वो मिलना, प्यार , लड़ना, झगड़ना, नोक-झोंक सभी कुछ याद आने लगा। उसे अपने ऊपर पश्चतचाप होने लगा कि अन्तिम समय में भी वो सिध्दार्थ को प्यार ना दे सकी।

वो बिलखती हुई जब अपने कमरे में पहुंची तो उसने देखा सिद्धार्थ वहाँ नहीं था। वो चिल्ला चिल्ला कर रोती हुई सिद्धार्थ की तस्वीर के सामने खड़े होकर प्लीज कम बैक, कम बैक सिद्धार्थ कहने लगी, वह रोते हुए कह रही थी कि सिद्धार्थ तुम एक बार वापस आ जाओ मै अब कभी भी तुमसे नहीं झगड़ूंगी।

ठीक उसी वक्त बाथरूम का दरवाजा खुला और किसी ने से उसके कंधे पर किसी ने हाथ रख कर पूछा क्या हुआ?

राधिका ने पलट कर देखा तो उसके पति सिध्दार्थ उसके सामने खड़े थे। वो रोती हुई उनके सीने से लग गइ उसने सुबुकते हुए सिद्धार्थ से सारी बात बताई ।

तब सिद्धार्थ ने बताया कि आज सुबह जब वो राधिका के लिए शादी की सालगिरह का गिफ्ट लेने के लिए गए थे तो रास्ते में उनका पर्स कहीं गिर गया था फिर एक दोस्त से पैसे उधार लेकर उन्होंने गिफ्ट खरीदा था । जिस व्यक्ति को उनका
बटुआ मिला होगा लगता है उसकी दुर्घटना में मौत हो गई है।

जिन्दगी में किसी की अहमियत तब पता चलती है जब वो हमारे साथ नही होता है, राधिका और सिद्धार्थ को तो जिंदगी ने दूसरा मौका दे दिया पर जिन्दगी की करवटें सभी को भूल सुधार का मौका नहीं देती हैं। थोड़ा झुककर लोगों को माफ़ कर देना अच्छा है क्या पता दुबारा पश्चाताप का मौका भी मिले न मिले।




जिद नहीं समर्पण है प्रेम

By-ABHISHEK TREHAN ON 26/07/2017

प्रियांश और प्रिया की मुलाकात कुछ वर्षों पहले कालेज में हुई थी। दोनों के विचारों में काफी समानता थी वे एक-दूसरे का साथ पसंद करते थे। वक्त के साथ उनकी मित्रता घनिष्ठता में बदल रही थी। यह घनिष्ठता कब प्रेम में रूपांतरित हो गई इसका खुद उन्हें भी पता नहीं चला था।

वक्त तेजी से बीत रहा था। आखिरकार वह कालेज का अंतिम दिन भी आ गया जब उन्हें अलग होना था। भारी मन से प्रियांश प्रिया को छोड़ने स्टेशन आया था। ट्रेन छूटने में कुछ समय शेष था। तभी प्रियांश ने प्रियांश ने प्रिया से अपने मन बात कही थी उसने प्रिया से प्रणय निवेदन किया था जिसे प्रिया ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि इन सब बातों का अभी सही वक्त नहीं है।

खुद को अस्वीकार किया जाना आसान नहीं होता है। यह प्रियांश के लिए अप्रत्याशित था। उसने प्रिया के इन्कार की वजह का आकलन करने के स्थान पर इसे अपने अपना अपमान समझ लिया और इसके लिए प्रिया को दोषी ठहरा दिया। इस घटना को हुए कई वर्ष बीत गए थे पर प्रियांश की वेदना कम नहीं हुई थी। समय के साथ गहरे घाव भी भर जाते हैं पर चोट के निशान शेष रह जाते हैं।

प्रियांश की पीड़ा गहरी थी जो वक्त के साथ प्रिया की निंदा और स्वयं की प्रशंसा में परिणित हो गई थी। प्रियांश को जब भी अवसर मिलता वह प्रिया की निंदा शुरू कर देता था। यदि अवसर नहीं मिलता तो अवसर बना लेता यदि तर्क नहीं मिलता तो कुतर्क करता था यदि कोई श्रोता नहीं मिलता तो स्वयं ही वक्ता व श्रोता बन जाता था।

इस तरह वह प्रिया की निंदा का कोई मौका नहीं छोड़ता था। इतने पर भी जब उसका अहंकार संतुष्ट नहीं होता तो वह दूसरों के सामने अपनी प्रशंसा करने लग जाता और दूसरों की नजरों में प्रिया को हीन और खुद को श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास करता था।

यह बातें धीरे-धीरे प्रिया तक भी पहुंच गयीं शुरुआत में तो उसने शुरुआत में इन बातों को महत्व नहीं दिया पर जब निंदा का स्तर गिरकर मर्यादा की सीमा को लांघने लगा तो उसने प्रियांश से मिलने का निश्चय किया। वर्षों बाद आज प्रियांश से प्रिया मिल रही थी उसने महसूस किया कि प्रियांश में बदलाव आ गया था उसकी आँखों में जिद और व्यवहार में अहंकार था।

प्रिया ने धीमे स्वर में कहा प्रियांश आज जीतकर भी तुम हार गए हो। जीत तुम्हारे अहंकार की हुई है और हार तुम्हारे प्रेम की हुई है। अपनी बातों से तुमने मेरा ही नहीं बल्कि स्वयं का भी उपहास उड़ाया है अपनी बातों से तुमने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रेम के विषय में तुम अभी भी अपरिपक्व और अधूरे हो।

किसी का जीवन में आना और जिदंगी से चले जाना प्रकृति का नियम है पर प्रेम के उसूल समय से परे हैं जिसकी अनिवार्य शर्त पवित्रता और समर्पण हैं। इसमें में जो जितना खोता है उतना ही पाता है, बिना त्याग प्रेम अधूरा है। उस दिन का मेरा निर्णय परिस्थितियों के अनुसार था पर अपनी अपरिपक्वता और व्यवहार से तुमने आज साबित कर दिया है कि मेरा वह निर्णय सही था।

प्रिया जा चुकी थी प्रियांश वहीं अवाक् बैठा था वह जीतकर भी हार गया था और प्रिया हारकर भी जीत गयी थी। प्रियांश समझ चुका था प्रेम जिद नहीं है,यह वह पवित्र समर्पण है जिसमें लोग जीतकर भी हार जाते हैं और कुछ लोग हारकर भी जीत जाते हैं आज प्रियांश को जीवन का सबसे बड़ा सबक मिला था, उसकी पीड़ा समाप्त हो गई थी।




डर के आगे जीत है

By-ABHISHEK TREHAN ON 25/07/2017

न जाने क्यों आजकल हर कोई चिंतित है,डरा हुआ है। हमारा जीवन एक अज्ञात से भय के साये में बीत रहा है, हमारे हर काम में, भाव में, विचारों में एक अनजाने से भय ने अपनी पैठ बना ली है। खुश रहना तो मानो हम भूल ही गए हैं।

हमारे इस डर का मूल कारण क्या है? इस प्रश्न के यूं तो अनेक उत्तर मिल जाएंगें लेकिन इसका सटीक और मौलिक उत्तर है – हमारे पास जो कुछ भी है उसके छिन जाने की, समाप्त हो जाने की आशंका। आज जो हमारे पास है वह कल हमारे पास नहीं होने की संभावना ही सारे भय की जड़ है।
अपने बुने हुए भय के जाल से बचने की कोशिश हम जीवन भर करते रहते हैं, पूरे जीवन भागदौड़ करते हैं पर अपने बुने हुए भय के बाहर निकल नहीं पाते। एक के बाद एक आने वाली परेशानियों और चिंताओं का सिलसिला हमें लगातार डराए हुए रखता है और जीवन के बहुमूल्य क्षण व्यर्थ की चिंताओं में निकल जाते हैं।

खुश रहना मनुष्य की एक स्वाभाविक क्रिया है। अपनी इस विशेषता के कारण मानव जीवन का फूल विषम से विषम परिस्थितियों के बीच भी मुरझाता नहीं है। प्रसन्नता का व्यक्ति के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। प्रसन्नता के आभाव में जीवन अनेक परेशानियों से घिर जाता है।
आजकल लोग अपनी गंभीरता और उदासी का कारण चिंता और उत्तरदायित्व को बताते हैं पर यह नहीं सोच पाते हैं कि उदास रहने से चिंताएं प्रबल हो जाती हैं और उत्तरदायित्व का बोझ बढ़ जाता है जबकि जीवन की छोटी-छोटी बातों में खुशियां ढूंढने पर मन प्रसन्न हो जाता है और मन के प्रसन्न रहने पर जिम्मेदारी और चिंताओं का बोझ हल्का महसूस होता है।

यदि तुम हँसोगे तो दुनिया हँसेगी पर यदि तुम रोओगे तो कोई तुम्हारा साथ नहीं देगा। भौरें भी उसी फूल पर बैठते हैं जो खिला हुआ दिखाई देता है। मुरझाए फूलों पर न तो भौरें जाते हैं और न तितलियाँ। मनहूसियत मिटाने और अपने प्रतिदिन के जीवन को तनाव से मुक्त रखने का सबसे बेहतर तरीका है कि जीवन एक खेल की तरह जिया जाए और खिलाडी़ जैसी मनोदशा रखी जाए।

यही उपाय है भय के मकड़जाल से खुद को मुक्त कर पाने का और खुद के करीब आने का क्योंकि जब हम खुद के करीब होते हैं तो हम सत्य के करीब होते हैं और इस सत्य की अनुभूति ही भय से सम्पूर्ण मुक्ति है। यह सही है कि डर के आगे जीत है।




आदतें ही हमें बनाती और मिटाती हैं

BY-Abhishek Trehan on 22/07/2017

समीर की सुबह कभी शांत नहीं होती है वह हड़बड़ी में उठता है और आफिस के लिए कभी समय पर तैयार नहीं हो पाता है। आफिस का समय हो जाने पर भी वह कभी कपड़े पहन रहा होता है, तो कभी बैग या जूते ढूढ रहा होता है। इस वजह से वह नाश्ता भी नहीं कर पाता है। इन सबका असर उसके काम पर भी पड़ता है आफिस देर से पहुंचने के कारण अक्सर उसे बास की नाराजगी का सामना करना पड़ता है और सुबह का नाश्ता नहीं करने के कारण दिन भर उसका एनर्जी लेवल कम बना रहता है।

देर रात तक जागना और सुबह देर तक सोना समीर की आदत में शुमार है और उसकी यही आदत उसकी शारीरिक और मानसिक तनाव की वजह भी है। समीर की भांति लगभग सभी घरों में सुबह एेसी ही होती है जिसका मुख्य कारण दिनचर्या का सही निर्धारण नहीं होना है। हममें से ज्यादातर लोगों को यह पता नहीं होता है कि दिनचर्या का सही निर्धारण कैसे करना चाहिए।

हमारे जीवन में अनेक समस्याएं दिनचर्या के गलत निर्धारण के कारण होती हैं, सही दिनचर्या हमें न केवल अनेक परेशानियों से बचाती है बल्कि हमें शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रखने में भी मदद करती है। हममें से कुछ लोग दूसरों को देखकर अपनी दिनचर्या बनाते हैं, एेसे में महत्वपूर्ण है कि लोगों की सभी आदतों को फालो करने की जगह आप उनकी केवल उन्हीं आदतों को अपनाएं जो आपको जीवन में आगे बढ़ाने में सहायक हों दूसरो को देखकर अपनी दिनचर्या बनाने में सावधानी बरतना भी आवश्यक है क्योंकि उनकी गैरजरूरी आदतें आपको व्यर्थ में थकती हैं और आपको पीछे ले जाने का काम करती हैं।

हमारे लिए यह समझना भी आवश्यक है कि अपने कार्यों को समय से पूरा करना हमारी खुद की जिम्मेदारी है इसके लिए दूसरों को दोषी ठहराना उचित नहीं है। दूसरे हमें हमारे कार्यों को समय से पूरा करने में हमारी मदद जरूर कर सकते हैं पर काम को समय से पूरा करने की आदत हमें स्वयं ही विकसित करनी होगी और इसके लिए हमें स्वयं ही प्रयास करना होगा।

हम आज जो भी हैं अपनी आदतों की वजह से हैं। आदतें ही वो हैं जो हमें बनाती हैं और मिटाती हैं। वक्त के साथ आदतें भी बदलती रहती हैं नई आती हैं और पुरानी जाती हैं। सुबह समय से जागना,आफिस के लिए समय से तैयार हो जाना, सुबह का नाश्ता अनिवार्य रूप से करना आदि एेसी छोटी-छोटी बातें हैं जिन्हें हम अपनी आदत में शुमार करके अनेक समस्याओं को कम कर सकते हैं। इन आदतों को अपनी दिनचर्या में शामिल करके हम काम को समय से पूरा कर सकते हैं और भविष्य में आने वाली चुनौतियों का सामना बेहतर ढंग से कर सकते हैं।




उम्मीदों का दिया कभी बुझाता नहीं है

BY-Abhishek Trehan on 21/07/2017
एक मुसाफिर अपनी मंजिल की ओर तेजी से बढ़ रहा था, रात का समय था,चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था, आगे का मार्ग घने जंगल से होकर गुजरता था। उसके पैर भी लंबी यात्रा से थक गए थे और अब चलने से इंकार कर रहे थे। उसने रात्रि विश्राम करने का निश्चय किया और उपयुक्त स्थान की तलाश करने लगा।

जगह सूनसान थी, दूर दूर तक आबादी का नामोनिशान तक नहीं था। काफी मशक्कत करने के बाद उसे एक छोटा सा मंदिर दिखाई दिया। पास जाने पर मुसाफिर ने पाया कि वहां कोई नहीं है, मंदिर के गर्भगृह के कपाट बंद हो चुके थे। गर्भगृह के बाहर चार दिये जल रहे थे जिसके कारण पूरे मंदिर में हल्की रोशनी फैल गई थी।

मुसाफिर बेहद थका हुआ था इसलिए जमीन पर लेटते हुए ही वह गहरी नींद में सो गया था। रात्रि के अंतिम पहर में अचानक उसकी नींद एक मधुर आवाज़ से टूट गई, यह मधुर आवाज़ मंदिर के गर्भगृह के पास से आती हुई प्रतीत हो रही थी।

पहले तो उसे कुछ भय हुआ फिर उसे याद आया कि वह तो मंदिर में है, ईश्वर के घर में भला भय कैसा, उसने खुद से यह कहा और गर्भगृह के समीप पहुंच गया। वहां पहुंचकर उसने जो देखा उसे देखकर उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। उसने देखा कि मंदिर के गर्भगृह के बाहर रखे चारों दिये आपस में बात कर रहे हैं। वह मुसाफिर वहीं बैठकर ध्यान से उनकी बातें सुनने लगा।

पहले दिया बोल रहा था ” मेरा नाम शांति है, पर मुझे लगता है अब इस दुनिया को मेरी ज़रुरत नहीं है, चारों तरफ आपाधापी और लूट-मार मची हुई है, मैं यहाँ अब और नहीं रह सकता। ” और ऐसा कहते हुए, कुछ देर में वह दिया बुझ गया।

कुछ देर तक वातावरण में शांति छाई गई तभी दूसरा दिया बोला ” मेरा नाम विश्वास है, और मुझे लगता है झूठ और फरेब के इस दुनिया मेरी भी यहाँ किसी को कोई ज़रुरत नहीं है, मैं भी यहाँ से जा रहा हूँ। ”, और कुछ ही क्षणों में वह दूसरा दिया भी बुझ गया ।

यह सब देखकर वह मुसाफिर आश्चर्यचकित था, उनकी बातें सुनकर वह दुखी भी था उनकी बातों में वह जीवन की सच्चाई को महसूस कर रहा था। वह अपने इन ख्यालों में खोया हुआ था कि तीसरे दिया धीमी आवाज में कहने लगा कि “मैं प्रेम हूँ, मेरे पास जलते रहने की ताकत है, पर आज हर कोई इतना व्यस्त है कि मेरे लिए किसी के पास फुर्सत नहीं है, दूसरों की बात तो दूर लोग अपनों से भी प्रेम करना भूल गए हैं, मुझसे ये सब और नहीं सहा जाता है मैं भी इस दुनिया से जा रहा हूँ। ”

तीसरा दिया अभी बुझा ही था कि वहां कहीं से एक पतंगा आ गया। दियों को बुझा हुआ देखकर वह घबरा गया, उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे और वह रुंआसा होकर बोला “अरे, तुम दिये जल क्यों नहीं रहे हो, तुम्हे तो अंत तक जलना है, अभी अंधकार समाप्त नहीं हुआ है, तुम इस तरह बीच में हमें कैसे छोड़कर कैसे जा सकते हो?”

तभी चौथा दिया जो शांति से सबकी बात सुन रहा था और चुपचाप जल रहा था मधुर स्वर में बोला ” प्यारे पतंगे घबराओ नहीं, मेरा नाम आशा है और जब तक मैं जल रहा हूँ हम बाकी दियों को फिर से जला सकते हैं। “

यह सुन कर मुसाफिर की आंखें चमक उठीं वह चौथे दिये के समीप आ गया और उसने आशा के बल पर शांति,विश्वास, और प्रेम को फिर से प्रकाशित कर दिया। चारों दीपक पुनः अपनी पूरी क्षमता से अंधकार को मिटाने में जुट गए।

कुछ देर बाद सुबह हो गई और मुसाफिर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चला उन चारों दीपकों ने उसके भीतर के अँधेरे को नष्ट कर दिया था वह मन ही मन सोच रहा था कि जब जीवन में सबकुछ बुरा होते हुए दिखाई दे रहा हो, चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार नज़र आ रहा हो, अपने भी पराये लगने लगें तो भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए, हमें उम्मीद हमेशा रखनी चाहिए क्योंकि इसमें इतनी शक्ति है कि ये हर खोई हुई चीज हमें वापस दिल सकती है।

अपनी उम्मीदों के दिए को हमेशा जलाये रखिये, बस अगर ये दिया जलता रहेगा तो आप किसी भी दिये को प्रकाशित कर सकते हैं। जो हमसे दूर हो गया है उसे वापस पा सकते हैं क्योंकि जब तक साँस है तब तक आस है।

जीना इसी का नाम है-2

जीवन में संवेदनाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। यह संवेदना ही है जो इंसान और मशीन में फर्क करती हैं। आज एेसे बहुत से इंसानी काम हैं जो आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के माध्यम से रोबोट कर सकते हैं। बस यह संवेदनाएं ही हैं जो अभी तक विज्ञान और मशीन के परे हैं।

संवेदनशीलता यानि, दूसरों के दुःख-दर्द को समझना, अनुभव करना और उनके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें शरीक होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।

वह जेठ के महीने की एक दोपहर थी जब अविनाश जो कि कस्बे के डाकघर में पोस्टमैन था ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,चिट्ठी ले लीजिये। अंदर से एक लड़की की आवाज आई,आ रही हूँ। लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो अविनाश ने फिर जोर से आवाज लगाकर कहा,अरे भाई! मकान में कोई है क्या, अपनी चिट्ठी ले लो। तपती दोपहर की गर्मी ने अविनाश को कुछ बेचैन कर दिया था।

लड़की ने अंदर से ही उत्तर दिया,पोस्टमैन साहब, दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए, मैं आ रही हूँ। अविनाश ने सोचा लगता है कि इस लड़की को दूसरे की समस्या से कोई लेना-देना नहीं है तभी बार -बार पुकारने पर भी यह जल्दी नहीं आ रही है फिर भी उसने खुद को संभाला और कहा,नहीं, मैं खड़ा हूँ, रजिस्टर्ड चिट्ठी है,रसीद पर तुम्हारे साइन चाहिये। करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। अविनाश इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही, लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया, सामने एक अपाहिज लड़की जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी।

अविनाश अपनी सोच पर शर्मिंदा हुआ और चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। इसके बाद में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, अविनाश एक आवाज देता और जब तक वह लड़की न आ जाती तब तक खड़ा रहता। उस लड़की का नाम आरूषि था। एक दिन अविनाश आरूषि की डाक लेकर आया था तभी आरूषि ने देखा कि अविनाश के पांवों की चप्पलें टूट गई हैं, उसने सोचा कि बिना टूटी चप्पलें पहन कर घर घर जा कर डाक बांटने में अविनाश को कितनी तकलीफ होती होगी। दीपावली नजदीक आ रही थी वह सोच रही थी कि पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ।

उस दिन जब अविनाश डाक देकर चला गया, तब उस आरूषि ने, जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे, उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये।

दीपावली के कुछ दिन बाद अविनाश आरूषि की डाक लेकर आया उसने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई,कौन? पोस्टमैन, उत्तर मिला। आरूषि हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा,अंकल, मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह गिफ्ट है। आरूषि ने कहा,अंकल प्लीज़ इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना। बिटिया को मना करके अविनाश उसके दिल को तोड़ना नहीं चाहता था। उसने अनमने भाव से लड़की के हाथ से पैकेट लिया और ठंडा शुक्रिया देकर चला गया।

घर जाकर जब अविनाश ने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया, क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे। साथ ही एक पत्र भी था जिसमें सुन्दर हैंडराइटिंग में लिखा था ” एक छोटी सी भेंट उन पैरों के लिए जिनको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है”। उसकी आखों में आंसू आ गए। अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए।

पोस्टमास्टर ने कारण पूछा,तो अविनाश ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा,” सर आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?”

पोस्टमास्टर भला व्यक्ति था उसने कहा अविनाश ईश्वर से प्रार्थना है कि वह बिटिया जहां रहे यू हीं खुशियां बिखेरती रहे। वह ईश्वर हमें भी संवेदनाओं से भरा मन प्रदान करे ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें। संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है,अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है। अपनी बात खत्म करते हुए पोस्टमास्टर ने कहा अविनाश ईश्वर ढूंढने से कही नहीं मिलता वह एेसे ही किसी रूप में हमारे सामने आ जाता है और अहसास करा जाता है अपने होने का, वास्तव में जीना इसी का नाम है।




मेहनत बड़ी है या भाग्य

दादाजी क्या मैं बड़ा होकर कलेक्टर बन पाऊंगा?
दस वर्ष के प्रखर ने अपने दादाजी से यही प्रश्न पूछा था। प्रखर के दादाजी उच्च शिक्षित एक बेहद सुलझे हुए और मिलनसार व्यक्ति थे। वे भारतीय विदेश सेवा से कुछ समय पहले ही रिटायर हुए थे। प्रखर और उसकी छोटी बहन ऊर्जा को अपने दादाजी से विशेष लगाव था। वो दोनों छुट्टी के दिनों में दिन भर दादाजी के आसपास मंडराते रहते थे। दादाजी भी बच्चों से बेहद स्नेह करते थे और खेल-खेल में उन्हें मानवीय मूल्यों की शिक्षा दिया करते थे।

प्रखर के इस प्रश्न को सुनकर दादाजी के चेहरे पर मुस्कान आ गयी उन्होंने मुस्काते हुए पूछा कि प्रखर पहले यह बताओ कि तुम कलेक्टर क्यों बनाना चाहते हो? प्रखर ने कुछ सोचने के बाद उत्तर दिया कि दादाजी स्कूल में मेरे दोस्तों ने बताया है कि कलेक्टर बहुत बडा़ आदमी होता है, उसके पास बड़ी गाड़ी और घर होता है, मेरे दोस्तों ने बताया है कि उससे सभी लोग डरते हैं, दादाजी इसीलिए मैं कलेक्टर बनना चाहता हूं।

प्रखर के उत्तर से दादाजी को आश्चर्य नहीं हुआ। उन्हें प्रखर के बाल मन से उसी प्रकार के उत्तर की उम्मीद थी। उन्होंने प्रखर से कहा “बेटा यदि तुम सही दिशा में प्रयास करोगे, पूरे मनोयोग से परिश्रम करोगे और तुम्हारे भाग्य में होगा तो तुम अवश्य कलेक्टर बन जाओगे।” दादाजी के कहे शब्दों को प्रखर ध्यान से सुन रहा था। उसने बालसुलभ जिज्ञासा के साथ पूछा दादाजी भाग्य किसे कहते हैं?

यह प्रश्न सुनकर दादाजी कुछ गंभीर हो गए कुछ देर शांत रहने के बाद वो प्रखर को समझाते हुए बोले कि बेटा भाग्य यानी किये जा चुके कर्मों का संचय,बीते हुए कल में हमारे द्वारा किये गये कर्मों का फल ही भाग्य का निर्माण करता है। जब तुम बड़े हो जाओगे तो तुम्हें समझ में आने लगेगा कि जीवन में सब कुछ हमारे हाथ में नहीं होता है।

हमारे हाथ में तो बस प्रयास करना या मेहनत करना होता है। कर्मों का फल हमारे हाथ में नहीं होता है। हमारे प्रयासों के फल हमारे भाग्य के अनुरूप होते हैं। जीवन में कभी कभी बहुत प्रयास करने के बाद भी वांछित सफलता नहीं मिल पाती है। हमारे भाग्य के अनुरूप ही बाहर की परिस्थितियां परिवर्तित होने लगती हैं इनका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है और हमारी किस्मत हमें वहां पहुंचा देती है जहां हमें पहुंचाना होता है। भाग्य प्रबल और शक्तिशाली होता है।

दादाजी की बातों का प्रखर पर असर पड़ा था। पर अभी उसकी बुद्धि इतनी परिपक्व नहीं हुई थी कि इन बातों को उसके सही अर्थ में आत्मसात कर सके । प्रखर सोचने लगा कि मनुष्य का भाग्य ही सबकुछ होता है हम कुछ करें या न करें हमारे भाग्य में जो होगा वह हमें अवश्य ही मिल जाएगा। प्रखर में आए इस परिवर्तन से सभी हैरान थे। बात जब दादाजी तक पहुंची तब उन्होंने प्रखर की छोटी बहन ऊर्जा को बुलाकर प्रखर के इस व्यवहार के बारे में पूछा, ऊर्जा ने बताया कि भैय्या कह रहे थे कि पढ़ाई में मेहनत करने से कोई फायदा नहीं है दादाजी ने बताया है कि जो हमारे भाग्य में होता है वह हमें अवश्य ही मिल जाता है।

ऊर्जा की बात सुनकर दादाजी की चिंता कम हो गयी वो समझ गए कि प्रखर में आए इस अचानक परिवर्तन का कारण क्या है। उन्होंने प्रखर को बुलाया और समझाते हुए कहा कि ” बेटा तुमने मेरी बातों का जो अर्थ समझा है वो अधूरा है। भाग्य प्रबल और शक्तिशाली अवश्य है पर बिना पुरूषार्थ के वह अधूरा है। भाग्य और पुरूषार्थ एक दूसरे के पूरक हैं। जहां पुरूषार्थ है भाग्य भी उसी के साथ है। बेटा इतिहास की किताबों से लेकर हमारे वर्तमान समय में अनेक एेसे उदाहरण मिल जाएगें जिन्होंने अपने भाग्य को प्रबल पुरूषार्थ से बदल दिया। बेटा पुरूषार्थ ही वह ईधन है जिसकी शक्ति से जीवन की गाड़ी दौड़ती है।”

दादाजी की बातों को सुनकर प्रखर के मन से संदेह दूर हो रहा था। उसके मन से संशय के बादल छंट रहे थे। दादाजी अपनी बात जारी रखते हुए बोले बेटा प्रखर जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है उन कर्मों पर ध्यान देना जो हमारे हाथ में हैं जिस चीज पर हमारा वश नहीं है उसके बारे में ज्यादा सोचना निरर्थक है। कर्म ही हमारे वश में हैं कर्मों के फल या भाग्य हमारे नियंत्रण से बाहर है इसलिए हमें ज्यादा सोचना छोड़कर बस कर्म करते रहना चाहिए। यही भगवान कृष्ण ने गीता में भी कहा है कि कर्म करते हुए फल की चिंता मत करो।

दादाजी के शब्दों ने प्रखर के मन को छुआ था। प्रखर ने कर्म के महत्व को समझा और वह पुनः मेहनत से पढ़ाई करने लगा प्रखर को मेहनत के रास्ते पर लौटता देख कर सभी खुश थे। दादाजी शांत बैठे प्रखर और ऊर्जा को खेलता हुए देख रहे थे वो जानते थे कि अब बच्चों का भविष्य उज्ज्वल है। आज एक बार फिर साबित हो गया था कि भाग्य और पुरूषार्थ के बीच श्रेष्ठता की कशमकश में पुरूषार्थ या मेहनत ही सर्वोपरि है।




जब कमजोरी ही ताकत बन जाती है

जापान के एक छोटे से कसबे में रहने वाले दस वर्षीय ओकायो को जूडो सीखने का बहुत शौक था पर बचपन में हुई एक दुर्घटना में बायाँ हाथ कट जाने के कारण उसके माता -पिता उसे जूडो सीखने की आज्ञा नहीं देते थे पर अब वो बड़ा हो रहा था और उसकी जिद्द भी बढती जा रही थी।

माता-पिता को झुकना ही पड़ा और वो ओकायो को नजदीकी शहर के एक मशहूर मार्शल आर्ट्स गुरु के यहाँ दाखिला दिलाने ले गए। गुरु ने जब ओकायो को देखा तो उन्हें अचरज हुआ कि, बिना बाएँ हाथ का यह लड़का भला जूडो क्यों सीखना चाहता है?

उन्होंने पूछा,तुम्हारा तो बायाँ हाथ ही नहीं है तो भला तुम और लड़कों का मुकाबला कैसे करोगे। ये बताना तो आपका काम है, ओकायो ने कहा मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मुझे सभी को हराना है और एक दिन खुद “सेंसेई” (मास्टर) बनाना है। गुरु उसकी सीखने की दृढ इच्छा शक्ति से काफी प्रभावित हुए और बोले, ठीक है मैं तुम्हे सीखाऊंगा लेकिन एक शर्त है, तुम मेरे हर एक निर्देश का पालन करोगे और उसमे दृढ विश्वास रखोगे।

ओकायो ने सहमती में गुरु के समक्ष अपना सर झुका दिया।
गुरु ने एक साथ लगभग पचास छात्रों को जूडो सीखना शुरू किया ओकायो भी अन्य लड़कों की तरह सीख रहा था पर कुछ दिनों बाद उसने ध्यान दिया कि गुरु जी अन्य लड़कों को अलग -अलग दांव -पेंच सीखा रहे हैं लेकिन वह अभी भी उसी एक किक का अभ्यास कर रहा है जो उसने शुरू में सीखी थी उससे रहा नहीं गया और उसने गुरु से पूछा, गुरु जी आप अन्य लड़कों को नयी -नयी चीजें सीखा रहे हैं, पर मैं अभी भी बस वही एक किक मारने का अभ्यास कर रहा हूँ क्या मुझे और चीजें नहीं सीखनी चाहियें?

गुरु जी बोले, तुम्हे बस इसी एक किक पर महारथ हांसिल करने की आवश्यकता है और वो आगे बढ़ गए। ओकायो को विस्मय हुआ पर उसे अपने गुरु में पूर्ण विश्वास था और वह फिर अभ्यास में जुट गया।

समय बीतता गया और देखते -देखते दो साल गुजर गए, पर ओकायो उसी एक किक का अभ्यास कर रहा था एक बार फिर ओकायो को चिंता होने लगी और उसने गुरु से कहा, क्या अभी भी मैं बस यही करता रहूँगा और बाकी सभी नयी तकनीकों में पारंगत होते रहेंगे।

गुरु जी बोले, तुम्हे मुझमे यकीन है तो अभ्यास जारी रखो।
ओकायो ने गुरु कि आज्ञा का पालन करते हुए बिना कोई प्रश्न पूछे अगले 6 साल तक उसी एक किक का अभ्यास जारी रखा।

सभी को जूडो सीखते आठ साल हो चुके थे कि तभी एक दिन गुरु जी ने सभी शिष्यों को बुलाया और बोले मुझे आपको जो ज्ञान देना था वो मैं दे चुका हूँ और अब गुरुकुल की परंपरा के अनुसार सबसे अच्छे शिष्य का चुनाव एक प्रतिस्पर्धा के माध्यम से किया जायेगा और जो इसमें विजयी होने वाले शिष्य को “सेंसेई” की उपाधि से सम्मानित किया जाएगा।

प्रतिस्पर्धा आरम्भ हुई। गुरु जी ओकायो को उसके पहले मैच में हिस्सा लेने के लिए आवाज़ दी। ओकायो ने लड़ना शुरू किया और खुद को आश्चर्यचकित करते हुए उसने अपने पहले दो मैच बड़ी आसानी से जीत लिए। तीसरा मैच थोडा कठिन था, लेकिन कुछ संघर्ष के बाद विरोधी ने कुछ क्षणों के लिए अपना ध्यान उस पर से हटा दिया, ओकायो को तो मानो इसी मौके का इंतज़ार था, उसने अपनी अचूक किक विरोधी के ऊपर जमा दी और मैच अपने नाम कर लिया अभी भी अपनी सफलता से आश्चर्य में पड़े ओकयो ने फाइनल में अपनी जगह बना ली।

इस बार विरोधी कहीं अधिक ताकतवर, अनुभवी और विशाल था देखकर ऐसा लगता था कि ओकायो उसके सामने एक मिनट भी टिक नहीं पायेगा। मैच शुरू हुआ,विरोधी ओकायो पर भारी पड़ रहा था, रेफरी ने मैच रोक कर विरोधी को विजेता घोषित करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन तभी गुरु जी ने उसे रोकते हुए कहा, नहीं, मैच पूरा चलेगा।

मैच फिर से शुरू हुआ। विरोधी अतिआत्मविश्वास से भरा हुआ था और अब ओकायो को कम आंक रहा था. और इसी दंभ में उसने एक भारी गलती कर दी, उसने अपना गार्ड छोड़ दिया!! ओकयो ने इसका फायदा उठाते हुए आठ साल तक जिस किक की प्रैक्टिस की थी उसे पूरी ताकत और सटीकता के साथ विरोधी के ऊपर जड़ दी और उसे ज़मीन पर धराशाई कर दिया उस किक में इतनी शक्ति थी की विरोधी वहीँ मुर्छित हो गया और ओकायो को विजेता घोषित कर दिया गया।

मैच जीतने के बाद ओकायो ने गुरु से पूछा, सेंसेई, भला मैंने यह प्रतियोगिता सिर्फ एक मूव सीख कर कैसे जीत ली?
तुम दो वजहों से जीते, गुरु जी ने उत्तर दिया पहला, तुम ने जूडो की एक सबसे कठिन किक पर अपनी इतनी मास्टरी कर ली कि शायद ही इस दुनिया में कोई और यह किक इतनी दक्षता से मार पाए, और दूसरा कि इस किक से बचने का एक ही उपाय है, और वह है विरोधी के बाएँ हाथ को पकड़कर उसे ज़मीन पर गिराना।

ओकायो समझ चुका था कि आज उसकी सबसे बड़ी कमजोरी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुकी थी। अगर ओकायो चाहता तो अपने बाएँ हाथ के ना होने का रोना रोकर एक अपाहिज की तरह जीवन बिता सकता था, लेकिन उसने इस वजह से कभी खुद को हीन नहीं महसूस होने दिया.

उसमे अपने सपने को साकार करने की दृढ इच्छा थी और यकीन जानिये जिसके अन्दर यह इच्छा होती है नियति भी उसकी मदद के लिए कोई ना कोई व्यक्ति,किसी न कि किसी रूप में भेज देती है, ऐसा व्यक्ति जो उसकी सबसे बड़ी कमजोरी को ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बना करके उसके सपने साकार कर सकता है।