सपने कभी मरते नहीं हैं

By-ABHISHEK TREHAN ON 29/06/2017

मुम्बई आर्ट गैलरी में प्रतिष्ठित वार्षिक exhibition चल रही थी। देश विदेश के नामी गिरामी कलाकारों ने अपनी कला को पेन्टिंगस के माध्यम से प्रदर्शित किया था। इनकी कला के मुरीद आम आदमी से लेकर फिल्म स्टार्स तक हर कोई था।
exhibition में प्रदर्शित कुछ कलाकृतियां तो इतनी सजीव थीं कि उन्हें देखकर एेसा लगता था कि मानों ये पेन्टिंगस अभी बोल पड़ेगीं।

देवेन्द्र सेठाना कला के बडे़ पारखी इंसान थे। कहने को तो वे वे बम्बई शहर के प्रतिष्ठित उद्योगपति थे पर ह्रदय से वे एक संवेदनशील व्यक्ति थे। कला संवेदना को व्यक्त करने का एक बेहतरीन माध्यम है यही कारण है कि संवेदनशील सेठाना का मन कला में अधिक रमता था। उनके पास नामचीन कलाकारों की पेंटिंग्स का बेहतरीन कलेक्शन था। मन के मनोभावों को कैनवास पर उकेरना उन्हें बहुत प्रिय था। वह स्वयं भी एक बढ़िया कलाकार थे।

उसी अार्ट गैलरी में एक लड़का बहुत देर से एक पेंटिंग के सामने खड़ा उसे निहार रहा था। वह उस पेंटिंग को बहुत गौर से देख रहा था। उसकी आँखें स्थिर थीं पर दिमाग तेजी से दौड़ रहा था। उसकी मुख मुद्रा से वह कुछ असंतुष्ट प्रतीत हो रहा था। वह अपने विचारों में इतना खोया हुआ था कि कब सेठाना उसके पीछे आकर खड़े हो गए इसका उसे पता ही नहीं चला। वह एक दौड़ते हुए काले घोडे़ की पेंटिंग थी जो इतनी सजीव थी कि मानो वह घोड़ा तस्वीर से निकलकर सामने आकर खड़ा हो गया हो।

इस पेंटिंग को देखते ही सेठाना बोल पड़े ब्यूटीफुल एन्ड flawless वर्क। यह सुनते ही बिना पेटिंग से नजरों को हटाए वह लड़का बोल उठा यह पेंटिंग ब्यूटीफुल तो है पर flawless नहीं। यह सुनकर सेठाना थोड़ा चौंक गए और बोले क्या कमी है इसमें? लड़के ने उतर दिया भागते हुए घोड़े की एक आंख बंद है। यह सुनकर सेठाना आश्चर्यचकित रह गए उन्होंने दुबारा पेटिंग की तरफ देखा लड़के की बात सही थी।

लड़के ने जो त्रुटि पकड़ी थी उसे पकड़ पाना आसान नहीं था। एकबारगी तो उनकी पारखी आखें भी धोखा खा गयीं थीं। फिर भी लड़के के ज्ञान की गहराई नापने के लिए उन्होंने कहा कि क्या फर्क पड़ता है इससे पेटिंग तो अभी भी सुन्दर है। इस बार लड़का उनकी तरफ मुड़ा और सीधे उनकी आखों में देखकर बोला वही फर्क पड़ता है जो दाल में बिना नमक और खीर में बिना चीनी के पड़ता है। कलाकार की इस छोटी सी त्रुटि ने उसकी सम्पूर्ण मेहनत पर पानी फेर दिया है।

यह लड़का मनीष महात्रे था। मनीष एक वित्तीय संस्थान में एकाउंटेंट था। उसका दिमाग भले ही दिन भर आकड़ों की एनालिसिस में उलझा रहता हो पर उसका मन, उसकी आत्मा तो कैनवास और रंगों में ही रमती थी। तकदीर ने उसे आकड़ों में उलझा कर एकाउंटेंट बना दिया था पर मन से वह अभी भी एक कलाकार ही था। जब भी उसे वक्त मिलता वह अपने विचारों को कैनवास पर उतारकर उनमें रंग भरता रहता था और फिर उनकी तस्वीरें खींचकर फेसबुक पर शेयर कर देता था। दोस्तों से मिलने वाले कुछ लाइक और कमेंट पर ही खुश हो लेता था। उसे खुद भी नहीं पता था कि वो कितना बेहतरीन पेंटर है।

सेठाना लड़के से प्रभावित हुए थे और फेसबुक के माध्यम से एक दिन अकस्मात ही उन्होंने मनीष को ढूढ निकाला और उसे मिलने के लिए आमंत्रित किया। मनीष इतने बड़े आदमी से मिलने खाली हाथ नहीं जाना चाहता था। बहुत सोचने के बाद उसने उन्हें अपनी पेटिंग भेंट करने की सोची जिसे उसने पिछले दिनों बहुत मनोयोग से बनाया था। सेठाना से मुलाकात के कुछ हफ्तों बाद उसे उनका एक मेल प्राप्त हुआ जिसमें उसके मनोबल को बढ़ाने वाली अनेक बातें उन्होंने कही थीं और उसके काम की प्रशंसा की थी। मेल के अंत में उन्होंने उनको भेंट की गयी पेटिंग के लिए धन्यवाद दिया था और लिखा था कि दि ब्यूटीफुल वर्क हैज़ नाउ बिकम फ्लोलेस ( flawless)। यह भागते हुए काले घोडे़ की हूबहू वही पेटिंग थी।

एक वर्ष बाद आज मुंबई आर्ट गैलरी में चल रही exhibition का अंतिम दिन है। आज समापन समारोह में सबसे बेहतरीन पेटिंग की घोषणा का सभी प्रतिभागियों को बेसब्री से इंतजार है। आज मनीष महात्रे बहुत व्यस्त हैं उनकी गैलरी में आज बहुत भीड़ है लोग उनकी पेंटिंग्स के बारे में जानना चाहते हैं। सेठाना के उस मेल ने उनकी जिंदगी बदल दिया था उनके शब्दों ने मनीष के सोए हुए आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति को फिर जगा दिया था। उसके बाद अनेक मुश्किलों का सामना करने के बावजूद मनीष महात्रे ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी कड़ी मेहनत और इच्छाशक्ति के बल पर देश के उभरते हुए पेंटरों में अपना स्थान बना लिया है।

मनीष की पेंटिंग को उभरते हुए कलाकारों की श्रेणी में पहला पुरस्कार प्राप्त हुआ है। मनीष की आखों में पुरूस्कार ग्रहण करते समय आँसू आ गए हैं उन्होंने देखा सेठाना हाल में पीछे की तरफ बैठे मुस्कुरा रहे हैं। मनीष ने पुरूस्कार ग्रहण करने के पश्चात सेठाना का पैर छुए, सेठाना ने उन्हें उन्हें उठाकर गले से लगा लिया और उनके कान में धीरे से कहा ” सपने कभी मरते नहीं हैं।”

यदि आपका भी कोई सपना है, आपके पास भी कोई हुनर है तो उसको मरने मत दीजिए। जो भी परिस्थितियों आपको मिली हों उनसे संघर्ष कीजिए और सपने को जीना शुरू कीजिए। आपके छोटे – छोटे कदम भी आपको मंजिल की ओर ले जाएंगे। इसलिए प्रयास करना, कदम उठाना, परिस्थितियां से जूझना मत छोड़िए क्या पता किसी मोड़ पर कोई सेठाना आपका इंतजार कर रहा हो।




जिन्दगी में हर बार दूसरा मौका नहीं मिलता

अजय कपूर एक बेहतरीन वेब डिजाइनर हैं। उनके क्लाइंट्स उनके काम के मुरीद हैं। उनके पास काम की कोई कमी नहीं है। वह स्वस्थ और सुखी जीवन जी रहे हैं। पर कुछ वर्षों पहले तक उनके जीवन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था वह पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ दोनों मोर्चों पर संघर्ष कर रहे थे।

आज से पांच साल पहले की रविवार की उस सुबह को वो कभी भी नहीं भूल सकते जब सुबह के वक्त वो अपने चार वर्ष के बेटे अर्जुन के साथ घर के बाहर लान में फुटबाल खेल रहे थे। गेंद के पीछे भागते हुए अचानक उन्होंने महसूस किया कि वो बुरी तरह हाफं रहे हैं। उनकी सांसें उखड़ रहीं थीं और चेहरा लाल हो गया था। वह बुरी तरह खांस रहे थे।

अजय कपूर की एक बुरी आदत थी जो उनकी सभी अच्छाईयों पर भारी पड़ रही थी। उन्हें धूम्रपान की लत थी। एक दिन में 10-15 सिगरेट पी जाना उनके लिए सामान्य सी बात थी। उनके दिन की शुरुआत सुबह की चाय और सिगरेट के साथ होती थी और अौर अंत रात के खाने के बाद सिगरेट से होता था। इस आदत की शुरुआत कई वर्षों पहले कालेज के समय से हुई थी जब उन्होंने दोस्तों के कहने पर शौक में सिगरेट पीना शुरू किया था। शुरुआत में वो सामान्य सिगरेट पीते थे और अब डिजाइनर सिगरेट पीने लगे थे। उनका यह शौक कब गंभीर लत में बदल गया इसका स्वयं उन्हें भी पता नहीं था।

अजय कपूर की हालत तेजी से बिगड़ती जा रही थी। अब वह जमीन पर गिर गये थे उनकी पत्नी उनके सीने को और उनकी मां उनके पैरों के तलवों को जोर जोर से मल रहीं थीं। उनकी चेतना तेजी से लुप्त होती जा रही थी। थोड़ी ही देर में एम्बुलेंस आ गयी और उन्हें समय रहते अस्पताल पहुंचा दिया गया था। उन्हें दिल का गंभीर दौरा पड़ा था जिसका मुख्य कारण डाक्टर ने अत्यधिक सिगरेट और शराब का सेवन बताया था। उनकी बायोप्सी भी की गई थी जिसकी रिपोर्ट में कैंसर के प्रारंभिक लक्षणों की पुष्टि हुई थी।

अजय अस्पताल के अपने बिस्तर पर शांत लेटे हुए थे। उनकी मुख मुद्रा गंभीर थी उनकी आखें खिड़की के बाहर शून्य में कुछ तलाश रहीं थीं। आज उनका दिल उनसे कुछ कह रहा था एेसा नहीं था कि उनका दिल पहले कुछ नहीं कहता था वो पहले भी उनसे बात करता था पर उनके जीवन में इतना कोलाहल था कि उसकी आवाज उन तक नहीं पहुंच पाती थी। उन्हें याद आ रहा था कि उनकी मां और पत्नी ने न जाने कितनी बार उनसे इस बुरी आदत को छोड़ देने को कहा था पर हर बार उन्होंने उनकी बातों को धुएं में उड़ा दिया था। पहले उन्होंने सिगरेट को पिया था और अब सिगरेट उन्हें पी रही थी।

अजय को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी और वो अपने घर वापस आ गए थे पर उनकी समस्याएं अभी समाप्त नहीं हुईं थीं। उन्हें अभी एक लम्बी लड़ाई लड़नी थी और यह लड़ाई उनकी खुद से थी। वर्षों से जमी हुई आदतें यूं ही नहीं जाती हैं। इंसान का मन बार बार सही गलत कुछ भी लॉजिक देकर उन आदतों के पास वापस लौट जाना चाहता है। इन्हें उखाड़ फेंकने के लिए आवश्यकता होती है दृढ़ इच्छाशक्ति और मनोबल की जो लगातार अभ्यास और संयम से आता है।

कहते हैं इंसान को वक्त सब कुछ सिखा देता है। अजय कपूर को भी वक्त ने सिखा दिया। बीते वक्त की परिस्थितियों और मुश्किलों ने उन्हें मजबूत बना दिया था। लंबे समय तक उन्होंने खुद से संघर्ष किया और अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इस बुरी आदत से छुटकारा पा लिया।
सौभाग्यशाली थे अजय कपूर जो समय रहते संभल गए और मौत के मुंह से बाहर निकल आए। यदि आप में भी कोई एेसी बुरी आदत है तो उसे अपनी मजबूत इच्छाशक्ति और मनोबल के सहारे उखाड़ फेंकिये। याद रखिए जिन्दगी में हर किसी को दूसरा मौका नहीं मिलता, हर कोई अजय कपूर की तरह भाग्यशाली नहीं होता।

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

लालाराम एक दस साल का छोटा बच्चा है. वह देश के एक पिछड़े हुए जिले के एक अनजान से गांव में रहता है. लालाराम गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता है. विकास किस चिड़िया का नाम है यह उसके गांव के लोगों को नहीं पता है. वे लोग अभी तक जीवन जीने के पारंपरिक तरीके अपनाए हुए हैं जिनमें खुले में शौच जाना भी शामिल है. यह उनकी रूटीन लाइफ का हिस्सा है. गांव का प्रधान भी एक रूढ़िवादी किस्म का व्यक्ति है जिसकी सोच आधुनिक नहीं है.

लालाराम को एक दिन अपने पिता के साथ दिल्ली जाने का मौका मिलता है. उसने शहर की चकाचौंध और चमक-दमक को पहली बार देखा है. यह सब देखकर वह बहुत खुश है. लालाराम को एक दिन अपने पिता के साथ मेट्रो ट्रेन में सफर करने का मौका मिलता है. मेट्रो स्टेशन और मेट्रो ट्रेन की स्वच्छता देखकर वह खुश है. सफर के दौरान अचानक उसे दिखाई देता है कि कुछ लोग जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं पटरी के किनारे खुले में शौच कर रहे हैं. यह सब देखकर उसे अच्छा नहीं लगता. उसे यह शहर की खूबसूरती पर धब्बे की तरह लगता है. उसे याद आता है कि गांव में उसकी मां को भी खुले में शौच जाना पड़ता है. यह सोचकर उसे बहुत शरम महसूस होती है. उसका मन विचलित हो जाता है. मेट्रो स्टेशन पर उतरने पर उसे स्टेशन के बाहर प्रधानमंत्री स्वच्छता अभियान के बड़े बड़े होर्डिंग्स दिखाई देते हैं जिसमें वे लोगों से खुले में शौच छोड़ने की अपील करते हुए दिखाई देते हैं.


गांव वापस लौटने पर लालाराम अपने पिता से शौचालय बनवाने के लिए कहता है जिसपर पिता आर्थिक तंगी की बात कहते हैं. वह लोगों से शौचालय निर्माण के लिए मदद मांगता है पर लोग उसकी बात को उपहास में उड़ा देते हैं. अंत में वह परेशान होकर गांव के प्रधान के पास शौचालय निर्माण के लिए मदद मांगने के लिए जाता है. प्रधान पुरानी सोच का व्यक्ति है. वह उसका उपहास उड़ाता है और बच्चा समझकर भगा देता है. लालाराम हर तरफ से निराश होकर प्रधानमंत्री को शौचालय निर्माण में मदद के लिए पत्र लिखता है.

लालाराम के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता जब कुछ दिनों बाद गाड़ियों का काफिला उसके घर के सामने आकर रूकता है. जिले के कलेक्टर अपने प्रशासनिक अधिकारियों के साथ उसके घर पहुंचते हैं और अपने हाथों से लालाराम को सरकार की तरफ से शौचालय निर्माण के लिए अनुदान राशि का चेक सौंपते हैं. वह लालाराम को प्रधानमंत्री की तरफ से प्रशस्ति पत्र सौंपते हैं जिसमें लालाराम के प्रयासों के लिए उसकी प्रशंसा की गई है.

यह सब देखकर गांव के प्रधान की भी सोच बदलती है वह गांव के हर घर में शौचालय के निर्माण के लिए सरकारी अनुदान दिलाने का संकल्प लेता है. कुछ ही दिनों में लालाराम का गांव खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया जाता है. अब लालाराम की मां को खुले में शौच नहीं जाना पड़ता है. उसे अपने बेटे पर गर्व है. उसने अपने बेटे होने के फर्ज को निभाया है. लालाराम को गर्व है अपने देश के प्रधानमंत्री की सोच पर जिन्होंने देश को. लालाराम ने साबित कर दिया है कि कोशिश करने वालों की कमी हार नहीं होती.




लोग कैसे प्रेरित होते हैं

मोटिवेशन की अवधारणा आधुनिक मैनेजमेंट का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसकी जड़ में दो विचारधाराएं काम करती हैं. इनमें से एक को नकारात्मक विचारधारा या Theory X कहते हैं. और दूसरी को सकारात्मक विचारधारा या Theory Y कहते हैं.
Theory X के अनुसार कर्मचारी स्वभाव से ही आलसी, काम को टालने वाले और डेडलाइन को फालो नहीं करने वाले होते हैं. अतः मैनेजमेंट को कर्मचारियों के साथ कड़ाई से पेश आना चाहिए और सख्त नियंत्रण के साथ उत्पादन को बढ़ाने पर जोर देना चाहिए. मोटिवेशन की यह विचारधारा औद्योगिक क्रांति के समय में अमेरिका और यूरोप की कंपनियों में लोकप्रिय थी जिसका उद्देश्य कम लागत पर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना था. डिसीपलिन और Layoff का कॉन्सेप्ट Theory X का बेहतरीन उदाहरण है.

वहीं Theory Y या मोटिवेशन की सकारात्मक विचारधारा का सारा फोकस कर्मचारियों के मानवीय पहलू पर होता है. इस थ्योरी के अनुसार अधिकतर कर्मचारी कर्मठ, जिम्मेदारी को समझने वाले और कर्तव्यों का निर्वाह करने वाले होते हैं. अतः मैनेजमेंट को कर्मचारियों के साथ उदारता से पेश आना चाहिए और परस्पर सहयोग के द्वारा लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए. टीम वर्क और सामूहिक डिसिजन मेकिंग का कॉन्सेप्ट Theory Y का बेहतरीन उदाहरण है. मोटिवेशन की यह विचारधारा नब्बे के दशक में ग्लोबलाइजेशन के उपरांत मल्टीनेशनल कंपनियों में काफी लोकप्रिय रही है.

यहां यह सवाल उठाना लाजिमी है कि मोटिवेशन की कौन सी विचारधारा लोगों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है? लोग किस विचारधारा से ज्यादा प्रभावित होते हैं? बिहेवियरल सांइस के क्षेत्र में हुए शोध से पता चलता है कि अत्यधिक सख्ती एवं अत्यधिक उदारता दोनों ही स्थितियां उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं. कर्मचारियों को नियंत्रण एवं छूट दोनों की आवश्यकता होती है. पर यह कितनी, कब, कैसे हो इसका सही निर्धारण ही कंपनी के HR मैनेजमेंट की काबिलियत को निर्धारित करता है.

लोग ही किसी भी कंपनी या संस्था के सबसे बड़े asset होते हैं. उन्हे नियंत्रित करना और बढ़ावा देना दोनों ही मैनेजमेंट की जिम्मेदारी है. जिस तरह स्वादिष्ट खीर के लिए दूध और चीनी की सही मात्रा में होना आवश्यक है ठीक उसी तरह कर्मचारियों के लिए भी संतुलित मात्रा में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही तरह के मोटिवेशन आवश्यक होते हैं.