जब वक्त बदलता है

जब सूर्य उदय या अस्त होता है दोनों समय उसका रंग लाल होता है। केवल दिशा का फर्क आने वाले समय को निर्धारित करता है। यह बताता है कि सुबह होगी या फिर अंधेरी रात आयेगी । दोनों ही स्थितियों में सूरज का रंग और आकार एक जैसा होता है।
काल से ताकतवर कुछ भी नहीं होता। इसके आगे सब बेबस हो जाते हैं। जीवन, परिस्थितियां,घटनाएं सबकुछ काल के अधीन होती हैं। जब वक्त बदलता है तो यह परिस्थितियों को रूपांतरित कर देता है।
इंसान की फितरत होती है कि जब वक्त अच्छा होता है तब वो सबकुछ आसान समझता है और बुरे वक्त का ख्याल करना ही नहीं चाहता है। जब देश की इकॉनमी अच्छी होती है तो हम बुरे वक्त के लिए सेविंग नहीं करते बल्कि उसके स्थान पर इनवेस्टमेंट करते हैं और कई गैरजरूरी चीजों में इनवेस्टमेंट करने के लिए लोन भी ले लेते हैं। हम यही सोचते हैं बाजार और इकॉनामी सबकुछ एेसे ही रहेंगे और बुरा वक्त कभी नहीं आएगा।
वर्ष 2000 में अमेरिका में अर्थशास्त्र का इनवेस्टमेंट माँडल लोकप्रिय था जिसका मतलब था जितना ज्यादा इनवेस्टमेंट उतना ज्यादा फायदा। बैंक भी एक ही आदमी को कई कई बार लोन किये जा रहे थे। फिर वर्ष 2007 आया जब इकॉनामी ने लंबा गोता लगाया और जो लोग वर्ष 2000 में हवा में उड़ते थे वो वर्ष 2007 में जमीन पर पैर रखने से भी कतराने लगे थे। दुनिया के सबसे ताकतवर बैंक का पतन होते हुए सबने देखा था। जाहिर है कि सबके अनुमान के विपरीत वक्त बदल गया था।
भारत में भी इकॉनामी का सूर्य पूरी बुलंदियों के साथ चमक रहा है। शेयर बाजार नई ऊंचाईयों को छू रहा है। हर कोई जोश में है और बिना जोखिम को समझे इनवेस्टमेंट किये जा रहा है। बैंकों में डिफाल्ट लगातार बढ रहा है और सरकार एक के बाद एक ऋण माफी की योजना को ला रही है। रबर को भी एक हद से ज्यादा नहीं खींचा जा सकता। कोई भी इकॉनामी एवर ग्रीन नहीं होती है अमेरिका, जापान, चाईना, ब्रिटेन आदि देशों का उदाहरण हमारे सामने है।

आवश्यकता है चीजों को गौर से देखने की और समझने की प्रकृति भी यही संदेश देती है कि हर उगने वाले सूरज के साथ ढलने वाला सूरज भी साथ होता है अजीब बात है कि दोनों देखने में एक जैसे लगते हैं और दोनों का रंग और आकार भी एक जैसा होता है…




मैं बहरा हूँ





एक बार एक सीधे पहाड़ में चढ़ने की प्रतियोगिता हुई. बहुत लोगों ने हिस्सा लिया. प्रतियोगिता को देखने वालों की सब जगह भीड़ जमा हो गयी. माहौल में सरगर्मी थी , हर तरफ शोर ही शोर था. प्रतियोगियों ने चढ़ना शुरू किया। लेकिन सीधे पहाड़ को देखकर भीड़ में एकत्र हुए किसी भी आदमी को ये यकीन नहीं हुआ कि कोई भी व्यक्ति ऊपर तक पहुंच पायेगा…

हर तरफ यही सुनाई देता …“ अरे ये बहुत कठिन है. ये लोग कभी भी सीधे पहाड़ पर नहीं चढ़ पायंगे, सफलता का तो कोई सवाल ही नहीं, इतने सीधे पहाड़ पर तो चढ़ा ही नहीं जा सकता और यही हो भी रहा था, जो भी आदमी कोशिश करता, वो थोडा ऊपर जाकर नीचे गिर जाता, कई लोग दो -तीन बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में लगे हुए थे …पर भीड़ तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी, ये नहीं हो सकता, असंभव और वो उत्साहित प्रतियोगी भी ये सुन-सुनकर हताश हो गए और अपना प्रयास धीरे धीरे करके छोड़ने लगे,

लेकिन उन्हीं लोगों के बीच एक प्रतियोगी था, जो बार -बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर पहाड़ पर चढ़ने में लगा हुआ था ….वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा और अंततः वह सीधे पहाड़ के ऊपर पहुच गया और इस प्रतियोगिता का विजेता बना. उसकी जीत पर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ, सभी लोग उसे घेर कर खड़े हो गए और पूछने लगे, तुमने ये असंभव काम कैसे कर दिखाया, भला तुम्हे अपना लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति कहाँ से मिली, ज़रा हमें भी तो बताओ कि तुमने ये विजय कैसे प्राप्त की?

तभी पीछे से एक आवाज़ आई … अरे उससे क्या पूछते हो, वो तो बहरा है तभी उस व्यक्ति ने कहा कि हर नकारात्मक बात के लिए –
” मैं बहरा था, बहरा हूँ और बहरा रहूँगा “।

अक्सर हमारे अन्दर अपना लक्ष्य प्राप्त करने की काबिलियत होती है, पर हम अपने चारों तरफ मौजूद नकारात्मकता की वजह से खुद को कम आंक बैठते हैं और हमने जो बड़े-बड़े सपने देखे होते हैं उन्हें पूरा किये बिना ही अपनी ज़िन्दगी गुजार देते हैं….

इन्सान की जड़ें






चीन में एक लड़का अपनी दादी के साथ रहता था। उन्होंने एक बगीचा लगा रखा था। बगीचे में बहुत सारे रंग बिरंगे फूलों के पौधे लगे हुए थे। दादी इन पौधों की देखभाल बड़े जतन से करती थीं।

एक दिन जब दादी बीमार पड़ गयी तो उन्होंने बगीचे की देखभाल के लिए उस लड़के को भेजा। अगले दिन सुबह जब दादी ने बगीचे में जाकर देखा तो उन्हें पता चला कि उनके पोते ने किसी भी पौधे की जड़ में पानी नहीं डाला है। पौधे मुरझाए हुए दिख रहे थे।

उन्होंने जब अपने पोते को बुलाकर इसका कारण पूछा तो वह बोला – ” दादी मैने हर पौधे की पत्तियां पोछी थी और उनकी जड़ों में रोटी के टुकड़े भी डाले थे।” उसकी दादी बोलीं – ” बेटा पौधों की जड़ों में रोटी के टुकड़े डालने से और पत्तियां पोछने से पौधे नहीं बढते। तुम्हें उनकी जड़ों में पानी डालना चाहिए था।”

लड़का सोच में पड़ गया। उसने दादी से पूछा – “दादी क्या मनुष्य की भी जड़ें होती हैं? दादी क्या इन्सानों की भी जड़े होती हैं?” दादी ने जवाब में कहा हां बेटा इन्सान की भी जड़े होती हैं। ये जड़े हमारे मन में हमारी हिम्मत में होती हैं। यदि हम रोजाना हम इन्हें पोषण दे तो हम ताकतवर बन सकते हैं।

उस लड़के ने फैसला किया कि वो अपने मन को साहस से भरपूर रखेगा। और अपनी हिम्मत को किसी भी परिस्थिति में टूटने नहीं देगा। यही लड़का आगे चलकर चीन का राष्ट्रपति, माओतसे तुगं बना।

खुद को निखारिए







किसी यूरोपीय ने एक बार महान एक भारतीय दार्शनिक से पूछा था कि मनुष्य के जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानवीय गुण कौन सा है ? दार्शनिक ने कुछ देर सोचने के बाद कहा था कि वह गुण है “आत्मसमीक्षा” अर्थात खुद के प्रति सजग होना।

हमें अगर गलती निकालनी हो तो हम भगवान से लेकर छोटे इन्सान तक की गलती पर्याप्त मात्रा में निकाल ही लेते हैं। बस हम अपनी ही गलतियों और कमियों की सही समीक्षा नहीं कर पाते हैं।

यदि मनुष्य अपनी गलतियों के प्रति सजग है तो उसे अपने जीवन को निखारने से कोई भी रोक नहीं सकता है। वह खुद भी एक अच्छा इंसान बनेगा और दूसरों को भी सही रास्ते पर चलने को कहेगा। मनुष्य के जीवन का एकमात्र उद्देश्य यही है कि वो अपने जीवन की निरन्तर समीक्षा करते हुए उसे बेहतर बनाए। वह बीते हुए कल से सीखकर आने वाले कल को और बेहतर बनाए।

बेकार से बेहतर की यात्रा ही हमें मंजिल की तरफ ले जाती है। यह सारे जीवन लगातार चलने वाली यात्रा है। हर दिन हमें बीते हुए कल से सीखने का मौका देता है। और हमें अवसर देता है खुद को कल से बेहतर बनने का।

यों तो दूर से देखने पर इतने छोटे से प्रयास की गंभीरता का अनुमान लगाना मुश्किल है पर यदि यह गुण हमारी दिनचर्या में शामिल हो जाता है तो धीरे-धीरे ही सही पर हमारी दृष्टि बाहर से मुड़कर भीतर की ओर हो जाती है और फिर हमें चीजों को देखने समझने का एक नया नजरिया मिल जाता है जो हमें और हमारे आने वाले कल को बीते हुए कल से बेहतर बना सकता है। मैं भी प्रयास कर रहा हूं आप भी कीजिए।

जीना इसी का नाम है



एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था। अचानक से उसे लगा कि, उसकी बहन पीछे रह गयी है। वह रुका, पीछे मुड़कर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।

लडका पीछे आता है और बहन से पूछता है, “कुछ चाहिये तुम्हें?” लडकी एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है। बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी।

दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ। अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पूछा, “सर, कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?”

दुकानदार एक शांत और गहरा व्यक्ति था, उसने जीवन के कई उतार चढ़ाव देखे थे, उन्होने बड़े प्यार से बच्चे से पूछा, “बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो ?” बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोड़ी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर बीनी थी!

दुकानदार वो सब लेकर यूँ गिनता है जैसे कोई पैसे गिन रहा हो।सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,”सर कुछ कम हैं क्या?”

दुकानदार : “नहीं – नहीं, ये तो इस गुड़िया की कीमत से भी ज्यादा है, ज्यादा मैं वापस देता हूँ” यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी। बच्चा बड़ी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।

यह सब उस दुकान का कामगार देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पूछा, “मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सीपों के बदले मे दे दी?”

दुकानदार हंसते हुये बोला, “हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6 साल के बच्चे के लिये बहुत मूल्यवान है और अब इस उम्र में वो नहीं जानता, कि पैसे क्या होते हैं?

पर जब वह बडा होगा ना.. और जब उसे याद आयेगा कि उसने सीपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी। तब उसे मेरी याद जरुर आयेगी, और फिर वह सोचेगा कि, “यह विश्व अच्छे इंसानों से भी भरा हुआ है।”

यही बात उसके अंदर सकारात्मक सोच बढानेे में मदद करेगी और वो भी एक अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा।

Courtsey by AWGP Shantikunj Haridwar
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यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता


हमारे जानने वाली एक महिला इस बात से बेहद परेशान थी कि उनका चार साल का बेटा अक्सर दूसरों के यहाँ से कुछ भी जो उसे अच्छा लगता वो सामान घर उठा कर ले आता कभी दूसरे बच्चों के खिलौने उठा लाता तो कभी उनकी पेन्सिल या किताबें उठा लाता। उसकी इस आदत से परेशान वो उसको डांटती उस पर गुस्सा होती पर बच्चे के व्यवहार में कोई परिवर्तन न होते देख उन्होंने child psychologist से मदद मांगी उन्होंने उनसे खुद को बच्चे के स्थान पर रखकर सोचने की सलाह दी और समझाया कि बच्चों को अपनी और दूसरों की चीजों का अन्तर मालूम नहीं होता,इसलिए अच्छी लगने पर कोई भी चीज उठा लेना चाहे वो किसी और की क्यों न हो,इसमें उन्हें बुराई नजर नहीं आती। बच्चों का मानना है कि दुनिया की हर चीज अपनी है जिसे वे जब चाहे ले सकते हैं हालांकि 6 वर्ष की उम्र तक आते आते वे अपनी और दूसरों की चीजों में अन्तर करना जान जाते हैं। उन्होंने उन महिला को समझाया कि जब भी बच्चा दूसरों की चीज उठाकर घर ले आए तो उन्हें बच्चे को डाटने की बजाय खुद को बच्चे की जगह रखकर सोचना चाहिए और उसे धैर्य के साथ समझाना चाहिए, उसे गलती का एहसास कराना चाहिए कि जो चीज वो अपनी समझ कर उठा लाया है वो उसकी नहीं है और उसे उस चीज को वापस करना होगा और जब वो वह चीज वापस कर दे तो उसकी तारीफ करनी चाहिए एेसा करने पर बच्चे में सुधार होगा और यह सुधार डर के कारण नहीं होगा।

अपनी एक पोस्ट “सही निर्णय” में हमने चर्चा की थी कि क्यूं किसी इंसान के सभी निर्णय सही नहीं होते हैं। हमने पुष्टि की थी उस universal law की जिसके अनुसार किसी भी घटना के होने या न होने की probability कभी भी शून्य या एक नहीं होती। यही कारण है कि घटनाओं के सम्बन्ध में हमारे निर्णय भी हमेशा न तो सही और न ही हमेशा गलत होते हैं।
यह मानव का स्वभाव है कि अक्सर हम निर्णय लेते वक्त भावनाओं में बह जाते हैं। यह emotions क्रोध, दया, sympathy,पूर्वाग्रह या prejudice हो सकते हैं। एेसे में हमारे निर्णय के गलत होने की संभावना बढ़ जाती है। पर खुद को भावनाओं या emotions से मुक्त रखना बड़ा ही मुश्किल काम है। मानव मन है ही एेसा जो भावनाओं और संवेदनाओं से भरा हुआ है और भावनाओं पर नियंत्रण रखना नामुमकिन नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर है।
अंग्रेजी में एक कहावत है When you take decision put yourself in another shoe.यानी निर्णय लेते वक्त खुद को दूसरे के स्थान पर रखना चाहिए। बड़ी ही practical बात है दूसरे व्यक्ति की मनोदशा समझने का इससे अच्छा तरीका हो ही नहीं सकता। जब हम खुद को दूसरे के स्थान पर रखते हैं तो दूसरे व्यक्ति की मनोदशा के साथ हमें उन परिस्थितियों को भी समझने में मदद मिलती है जिसके प्रभाव में व्यक्ति वर्तमान में में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। फिर जब हम दूसरे व्यक्ति के बारे में निर्णय लेते हैं तो उसके सही होने की संभावना बढ़ जाती है। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि एेसा करने में या सोचने में हमें अपनी भावनाओं से मुक्त भी नहीं होना पड़ता है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि आपको को किसी की बात सुनकर गुस्सा आ गया है और बदले में आप भी क्रोध में आकर प्रतिक्रिया व्यक्त करने जा रहे हैं तो आपकी प्रतिक्रिया के सही होने की संभावना बढ़ जाएगी यदि आप खुद को सामने वाले के स्थान पर रखकर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।
यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता तो क्या होता, क्या हमारी दुनिया एेसी होती, क्या मैं और भी बेहतर होता, क्या जिदंगी और भी अच्छी होती… इन सभी के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है पर एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता तो आपके निर्णय बेहतर होते और आपको उन निर्णय निर्णयों पर अफसोस भी कम होता क्योंकि जब आप दूसरों के स्थान पर खुद को रखकर निर्णय लेते हैं तो दरअसल आप दूसरों के बारे में नहीं बल्कि खुद के बारे में निर्णय लेते हैं और आपके बारे में आपसे बेहतर कौन जानता है यही कारण है कि आपके निर्णय के सही होने की संभावना बढ़ जाती है…

HAD I BEEN IN YOUR PLACE




ये काम नहीं है आसान

जरूरत से ज्यादा काम भारतीयों को बेकार बना रहा है। मशहूर अर्थशास्त्री John Keens ने कभी कहा था भविष्य में लोगों के पास फुर्सत के काफी क्षण होगें पर लगता है कि भारत उनकी भविष्यवाणी को गलत साबित करने वाला देश बनने जा रहा है। काम और आराम में असंतुलन गंभीर खतरा बनता जा रहा है। ये तो सबको पता है कि भारत डायबिटीज, बी.पी सहित अनेक बीमारियों की Global capital बन गया है पर इस तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता कि इसकी एक बड़ी वजह काम का बढ़ता बोझ है।
भारत में एक कर्मचारी एक साल में लगभग 5200 घंटे और एक हफ्ते में लगभग 52 घंटे तक काम करता है जो दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। अभी हाल के दिनों में बैंक कर्मचारियों ने नोटबंदी के दौरान 12 से 18 घंटे प्रतिदिन काम किया और विश्व इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक घटना को सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया। बैंक के कुछ कर्मचारियों की इस दौरान काम के अत्यधिक दबाव के कारण जान भी चली गई।
दूसरा पहलू यह भी है कि आज नौकरी करने वाले 35% युवा डिप्रेशन से ग्रस्त हैं और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। भारत में औसत सैलरी मात्र 3168/-है जो कि विश्व में सबसे कम है। भारत में विश्व के सबसे ज्यादा बेरोजगार हैं प्रतिवर्ष नौकरी उत्पन्न करने के मामले में हम विश्व के पिछड़े देशों में शामिल है। हमारे देश में न्यूनतम और अधिकतम वेतन का अनुपात 1:2000 है जो विश्व में सर्वाधिक है। शिक्षा का स्तर यह है कि एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट को बैंक का बाबू बनने में भी पसीने छूट जाते हैं। हमारे यहां आरक्षण का यह हाल है कि किसी को 90 नंबर पाकर भी मौका नहीं मिलता और कोई 2 नंबर पाकर भी अफसर बन जाता है। पर हमारी सरकारें इन सबसे बेखबर वोट बैंक की राजनीति में लगी रहती हैं और हम हाथ पर हाथ रखकर अच्छे दिनों के आने के सपने देखते रहते हैं।

एेसे देश में नौकरी पाना ही अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। पर इतनी मुश्किल से नौकरी पाकर काम के बोझ से बीमार पड़ जाना और भी हैरान करता है। दरअसल इन सबकी जड़ में हमारे labour reforms हैं। यह एक एेसा क्षेत्र है जो सालों से उपेक्षित है। हमारे देश में RBI,SEBI, TRAI जैसी regulatory bodies हैं पर labour reforms के लिए कोई regulatory body नहीं है। हमारे manufacturing और Service industry को आज भी 1935 का payment of wages act, factories act 1956,और industrial dispute act 1947 govern कर रहे हैं जो वर्तमान की परिस्थितियों में बिलकुल भी प्रासंगिक नहीं हैं। इन obsolete हो चुके laws का सहारा लेकर इनमें दिये गये नियमों को आज की परिस्थितियों में अपने हिसाब से तोड़ मरोड़कर अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए कम्पनियाँ अपने Employees को exploit कर रही हैं। जरूरत से ज्यादा काम के बोझ के कारण काम और आराम में असंतुलन गंभीर होता जा रहा है और हमारी young workforce तेजी से बीमारियों की चपेट में आ रही है। वक्त है सरकार और हमारे लिए जागने का और वक्त है labour reforms का कहीं एेसा न हो कि जिस युवा शक्ति पर भारत आज नाज़ कराता है कल वही बीमार होकर उसके लिए बोझ न बन जाए….