परिवर्तन के नियम

परिवर्तन जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। यह अनवरत जारी रहने वाली प्रक्रिया है। परिवर्तन हमारे चाहने या न चाहने पर निर्भर नहीं होता ये तो बस होता रहता है। परिवर्तन मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं macro और micro जो परिवर्तन हमे और दूसरों को होते हुए दिखाई देते हैं जैसे उम्र के साथ होने वाले परिवर्तन, रहन सहन में होने वाले परिवर्तन, वेशभूषा में और खानपान में होने वाले परिवर्तन आदि को macro changes कहा जाता है वहीं जो परिवर्तन सूक्ष्म होते हैं जैसे विचारों में होने वाले परिवर्तन, व्यवहार में होने वाले परिवर्तन आदि को micro changes कहा जाता है। हम अक्सर macro changes को तो नोटिस करते हैं पर micro changes को नोटिस नहीं कर पाते हैं। जो सूक्ष्म है उसे देख पाना आसान नहीं होता..
जीवन में होने वाले परिवर्तन सकारात्मक भी होते हैं और नकारात्मक भी। जो परिवर्तन जीवन में अनुकूल परिस्थितियां लाते हैं उन्हें सकारात्मक और जो परिवर्तन प्रतिकूल परिस्थितियां लाते हैं उन्हें नकारात्मक परिवर्तन कहते हैं। हममे से ज्यादातर लोग परिवर्तन पसंद नहीं करते और इसके लिए तैयार भी नहीं होते हैं क्योंकि हमें हमेशा एक अज्ञात का डर होता है जिसे fear of unknown कहते हैं। कम ही लोग होते हैं जो इस डर को जीत पाते हैं जो इस डर के आगे बढ़ पाते हैं उन्हें परिवर्तन पसन्द होता है और एेसे लोग देश और दुनिया में परिवर्तन लाते हैं इन्हें change agents कहते हैं। परिवर्तन लाने में हमेशा विरोध का सामना करना पड़ता है कभी यह विरोध खुद के भीतर से तो कभी बाहर से होता है।
जीवन में होने वाले बड़े परिवर्तन अकस्मात होते हैं जिसके लिए हम तैयार नहीं होते हैं और जब ये परिवर्तन होते हैं तो अक्सर जीवन बदल जाता हैं। परिवर्तन में अवसर भी होता है और भय भी होता है जो इसमें अवसर देखते हैं वो आगे बढ़ जाते हैं और जो परिवर्तन से भयभीत हो जाता है वो वहीं रह जाता है जहां वो पहले था। विकास या development भी एक तरह का परिवर्तन ही होता है जिसे सकारात्मक या positive development कहा जा सकता है और जब यह परिवर्तन सतत या continuous होता है तो इसे ही समावेशी विकास या sustainable development कहते हैं।
क्या कोई भी development सम्पूर्ण या 100% हो सकता है? ब्रिटिश एयरवेज का sustainable process development प्रोग्राम की accuracy 99.96% पहुंच चुकी है जिसका मतलब यह हुआ हर 10000 उड़ान में से 40 उड़ान के दुर्घटनाग्रस्त होने की संभावना होती है। सोचिए हर बार जब उड़ान भरी जाती है तब कितने इन्सानों की जिंदगी दावं पर लगी होती है। पर यह संभावना कभी भी 100% नहीं हो सकती क्योंकि हर साल इसमें नये कारक या variables जुड़ जाते हैं जो पुराने कारकों से पूरी तरह भिन्न होते हैं। यह लगातार दौड़ी जाने वाली एेसी रेस है जिसकी कोई फिनिशिंग लाइन नहीं होती है। इसका मतलब यह भी है कि जीवन में कोई भी परिवर्तन स्थायी या पूर्ण नहीं होता यह लगातार चलने वाली अंतहीन प्रक्रिया है जिसका कोई अंत नहीं है। Management की भाषा में इसे ही TQM या Total Quality Management कहते हैं।






सही निर्णय

निर्णय लेने से कोई बच नहीं सकता। जब तक सांसें चलेगी फैसले लेने होंगे। निर्णय या डिसिजन जिदंगी के आधार हैं। हम आज जो भी हैं अपने बीते हुए कल में लिए गए फैसलों के कारण ही हैं। हम कल क्या होगें इसका फैसला हमारे आज के लिये हुए निर्णय करेंगे। निश्चित रूप से किसी के सभी निर्णय हमेशा न तो सही और न ही हमेशा गलत हो सकते हैं। हर इन्सान के जीवन में कुछ सही तो कुछ गलत निर्णय होते है। आपका कोई निर्णय सही होगा या गलत इसका निर्धारण सिर्फ और सिर्फ समय करता है। अक्सर हमें आज जो सही लगता है वो भविष्य में गलत साबित होता है और जो गलत लगता है वो ही सही साबित हो जाता है। जब निर्णय सही साबित हो जाता है तो तारीफ और जब गलत हो जाता है तो आलोचना के साथ गलत होने की जिम्मेदारी भी लेनी पड़ती है।
जब भी इन्सान कोई निर्णय लेता है तो वह यह सोच के नहीं लेता कि यह गलत साबित होगा। दरअसल निर्णय आज की परिस्थितियों में लिए जाते हैं जबकि कल की बदली हुई परिस्थितियां उन्हें सही या गलत साबित करती हैं। कल किसने देखा है? किसी ने नहीं पर इंसान की फितरत होती है अनुमान लगाने की और इसी आधार पर निर्णय लिए जाते हैं।आप कितनी सटीकता से भविष्य का अनुमान लगा सकते हैं यह आपकी दूरदर्शिता को निर्धारित करता है और आपकी दूरदर्शिता निर्धारित करती है आपके निर्णय के सफल या असफल होने की संभावना को। अनुमान तो कोई भी लगा सकता है पर अनुभव के साथ अनुमान लगाने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है उच्च पदों पर अनुभवी लोगों की नियुक्ति की जाती है जो कपंनी के लिए निर्णय लेते हैं। दूसरे शब्दों में आपकी कंपनी के CEO और आपमें बस इतना फर्क होता है कि वो आपकी तुलना में ज्यादा बेहतर अनुमान लगा सकते हैं।
अपनी जिंदगी में सारे निर्णय हम खुद नहीं ले सकते हमारी जिंदगी के कुछ निर्णय दूसरे भी लेते हैं और हम अक्सर अपनी जिंदगी में सफलताओं के लिए अपने निर्णयों को और असफलताओं के लिए दूसरों के निर्णयों को जिम्मेदार ठहराते हैं। इसे ही साइकॉलजी की Self prophecy theory कहते हैं। कुछ लोग जल्दी निर्णय लेते हैं तो कुछ लोग जल्दबाजी में निर्णय लेते हैं। कुछ लोग निर्णय लेने में बहुत वक्त लेते हैं तो कुछ को निर्णय लेना दुनिया का सबसे मुश्किल काम लगता है। कुछ निर्णय लेना आसान तो कुछ निर्णय लेने मुश्किल होते हैं। कुछ भी हो पर किसी के लिए सारे निर्णय न तो सही और न ही गलत हो सकते हैं।
दरअसल हम जो भी निर्णय लेते हैं वो भविष्य के अनुमान पर निर्भर होते हैं। हमारे अनुमान जितने सही होगें हमारे निर्णयों के सही होने की संभावना उतनी अधिक होगी। यह भी सही है कि अनुभव अनुमान को बेहतर बनाते हैं जिससे सफलता की संभावना बढ़ जाती है। पर फिर भी सब कुछ अनुमान और संभावना पर निर्भर करता है। प्रायिकता या Probability theory के अनुसार किसी भी घटना या event के होने या न होने की Probability न तो एक (one) और न ही शून्य (zero) हो सकती है। जिसका अर्थ यह हुआ कि किसी घटना के होने या न होने की संभावना को लेकर न तो पूरी तरह से आश्वस्त और न ही पूरी तरह से निराश हुआ जा सकता है। यही कारण है कि हमारे सारे निर्णय न तो हमेशा सही और न ही हमेशा गलत होते हैं। दरअसल अनुमान कभी भी absolute नहीं हो सकते। इसलिए किसी घटना के होने या न होने की संभावना हमेशा शून्य और एक के बीच होती है। यही कारण है कि हमारे कुछ निर्णय सही और कुछ गलत होते हैं। इसलिए जब लगे कि आपका या दूसरे का कोई निर्णय गलत साबित हुआ है तो इसका मतलब यह हुआ कि आपसे या दूसरों से महज अनुमान लगाने में चूक हुई है। अनुमान गलत होने का यह मतलब कतई नहीं कि आप अयोग्य या असफल हैं और हमेशा असफल होगें। अच्छा होगा कि घटनाओं से अनुभव लेकर अगली बार बेहतर अनुमान लगाइए क्या पता यही आपका सही निर्णय हो…



विचारों की फ्रीक्वेंसी

हम आज जो भी हैं अपनी आदतों की वजह से हैं। आदतें ही वो हैं जो हमें बनाती हैं और मिटाती हैं। वक्त के साथ आदतें भी बदलती रहती हैं नई आती हैं और पुरानी जाती हैं वहीं कुछ आदतें एेसी भी होती हैं जो ताउम्र नहीं बदलती हैं। जो आदतें कभी नहीं बदलती वो हमारे सब कॉन्शस या अचेतन मन का हिस्सा बन जाती हैं और हमारे चीजों को देखने के नजरिये को प्रभावित करती हैं। हमारा नजरिया और हमारी आदतें मिलकर हमारा स्वभाव बनाती हैं। हम देखते हैं कि एक परिस्थिति में दो अलग अलग स्वभाव के लोग अलग प्रतिक्रिया देते हैं इसका मतलब यह भी हुआ कि एक स्वभाव के लोग किसी एक परिस्थितियों में लगभग एक जैसी प्रतिक्रिया देगें। यही कारण है कि बड़ी कंपनियों में समय-समय पर अलग अलग बैकग्राउंड के लोगों के लिए एक जैसी ट्रेनिंग आयोजित की जाती है इसके पीछे उद्देश्य होता है कि एक जैसी विभिन्न परिस्थितियों के आने पर सभी कर्मचारी विभिन्न परिस्थितियों में लगभग एक जैसी प्रतिक्रिया दें। हमारा स्वभाव हमारी आदतों और हमारे नजरिए का मिश्रण होता है। आदतें नजरिए को प्रभावित करती हैं और आदतों को विचार प्रभावित करते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि विचारों को बदलकर आदतों को, आदतों को बदलकर नजरिए को और नजरिए को बदलकर स्वभाव को बदला जा सकता है। यही कारण है कि हमें विचारों को सकारात्मक रखने को कहा जाता है क्योंकि सकारात्मक विचार पाजिटिव और नकारात्मक विचार निगेटिव स्वभाव के निर्माण में पूरी तरह से सक्षम हैं।

दूसरे शब्दों में मनुष्य अपने विचारों को बदलकर अपना कायाकल्प कर सकता है। इसे ही बिहेवियर की cognitive resonance थ्योरी कहते हैं.. इसका सार यही है कि कोई किसी के विचारों की फ्रिक्वेंसी को पकड़ कर उसके जैसा बन सकता है या विचारों की फ्रिक्वेंसी को मैच कराकर विभिन्न परिस्थितियों में एक जैसी प्रतिक्रिया प्राप्त की जा सकती है..।



अन्तिम इच्छा

वो सोचता था कि बस ये मिल गया तो फिर कुछ नहीं मांगूगा। रात दिन उसी के सपने देखने लगा.. मेहनत करने लगा.. उसी के बारे में सोचने लगा। जिन्दगी ने इम्तिहान लिया.. कई बार लिया फिर वो सफल हो गया। उसे मिल गया था वह सब जिसके बारे में वो सोचता था। थोड़े दिनों बाद उसे लगने लगा कि उसे जो मिला है वो अधूरा है और लोगों की तुलना में कम है। उसने इस बार मेहनत कम की और चालाकी एवं होशियारी पर ज्यादा ध्यान दिया और अपनी अधूरी जिन्दगी को पूरा करने की कोशिश करने लगा। अब उसे ईश्वर पर कम और अपनी होशियारी पर ज्यादा भरोसा हो गया था.. दूसरों की नजर में उसमें आत्मविश्वास आ गया था। उसे इस बार संघर्ष कम करना पड़ा और काफ़ी हद तक वो अपने इरादों में सफल भी हुआ था। पर न जाने क्यों जिदंगी का अधूरापन दूर नहीं हुआ बार बार ध्यान उन चीजों की तरफ जाता था जो उसने हासिल नहीं की थी। उसकी बेचैनी बढ़ी तो उसने दिमाग दौड़ाया और अधूरे को पूरा करने का प्लान बनाया। इस बार उसने पूरा ध्यान होशियारी पर दिया.. उसे अब ईश्वर पर बस दिखावे के लिए भरोसा था.. अब उसकी नज़र में सब जायज़ था। दूसरों की नजर में अब उसमें अहंकार आ गया था। उसे इस बार जो मिला वो पहले से ज्यादा था। वह दुनिया की नजर में सफल हो गया था। थोड़े दिनों बाद उसे लगने लगा कि वह अभी भी सन्तुष्ट नहीं है..अपने शिखर पर पहुंच कर वो अकेला था.. उसकी नजर में होशियारी ही सर्वोपरि थी। वक्त के अपने नियम होते हैं जो किसी के लिए नहीं बदलते कुछ पलों के लिए लगता है कि जीवन और वक्त हमारे नियन्त्रण में है और हम जो चाहें वो कर सकते हैं और हमारी होशियारी हमें बचा लेगी.. पर वक्त के नियम नहीं बदलते। उसका भी वक्त बदल रहा था.. जिन्दगी के नियम लागू हो रहे थे.. पर बुद्धि को लाजिक नहीं समझ आ रहा था.. वक्त के नियम लाजिक के परे थे। बहुत मुश्किल था अहंकार के लिए वक्त के आगे झुकाना..उन रास्तों पर वापस लौटना जिन्हें वो पीछे छोड़ चुका था.. जब बेबसी ज्यादा बढ़ी तब उसने ईश्वर को पुकारा। अब उसे होशियारी पर कम और ईश्वर पर ज्यादा भरोसा था… अब वह वापस मुड़ गया था जिसकी दिशा केन्द्र की ओर थी…