वक्त


वक्त शायद दुनिया का सबसे ताकतवर शब्द है। वक्त ही वो ताकत है जिस पर किसी का जोर नहीं चलता। जब वक्त साथ हो तब इंसान को फर्श से अर्श पर और जब विपरीत हो तो अर्श से फर्श तक का सफर तय करने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। इसकी एक बड़ी खासियत है कि ये कभी एक जैसा नहीं रहता है और बदलता जरूर है। और जब बदलता है तब एेसा बदलता है कि इंसान की जिंदगी ही बदल जाती है। वक्त और कर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं वक्त के साथ कर्म और कर्म के साथ वक्त बदल जाता है। जो आज अकेले चल रहा है कल उसके साथ दुनिया चलेगी और जो जिसके कदमों में आज दुनिया है उसे शायद सुकून एकांत में मिलेगा। बड़ा मुश्किल है यह अनुमान लगाना कि वक्त का ऊंट किस करवट बैठेगा। पर जीवन की यही महान अनिश्चितता ही जीवन में रोमांच भरती है। वक्त कब बदलेगा किसी को नहीं पता अगर पता है तो बस अपने इरादे जो निश्चित रूप से वक्त को बदल देते हैं। कर्म करे बिना हम रह नहीं सकते बस कर्म करते रहना ही हमारे हाथ में है इसलिए जो हाथ में है उसे करते रहिये और अपने इरादे नेक रखिए क्या पता आपका वक्त कब बदल जाए… यही तो कहा था भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से जब वो खड़ा था असमंजस में बिल्कुल उसी तरह जैसे हम और आप आज खडे़ हैं…


तुलना

बिहेवियरल सांइस में एक थ्योरी है जिसे इक्विटी थ्योरी कहते हैं। इस के अनुसार व्यक्ति चार तरह से तुलना कराता है – खुद की खुद से, खुद की दूसरों से, दूसरों की खुद से, दूसरों की दूसरों से। इस तुलना में वो दो कारकों को इस्तेमाल करता है- आन्तरिक और वाह्य कारक। व्यक्ति अपनी सफलता के लिए आन्तरिक और असफलता के लिए वाह्य कारकों को जिम्मेदार मानता है। इन दो कारकों को इस्तेमाल करके वह एक सन्तुलन बना लेता है और उसी के अनुसार उसकी सोच बन जाती है। जब कभी यह सन्तुलन बिगड़ जाता है तब वह उत्तेजित, निराश या परेशान हो जाता है। उसकी परेशानी तब तक रहती है जब तक उसे सन्तुलन बनाने के लिए उचित कारक नहीं मिल जाता है। वह तलाश कराता है इन कारकों की बाहर और भीतर और चैन की तलाश में और बेचैन हो जाता है। उसकी तलाश पूरी होती है जब वह पूरी ईमानदारी से तलाशता है और जब इन्सान खुद के लिए ईमानदार हो जाता है तब उसे अपना अक्स साफ दिखने लगता है। फिर उसकी मुलाकात होती है खुद से और वो जान जाता है कि अपने दुखों का कारण और निवारण दोनों वह खुद है। इसे ही साइकॉलजी की भाषा में सेल्फ रिलाइजेशन कहते हैं…

हौसला

हौसला या हिम्मत एक सिक्के के दो पहलू हैं। मोटिवेशन की सारी थ्योरी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती हैं। ये इन्सान की वो फितरत है जो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाने का माद्दा रखती है। जो भी उठा है इसी के बूते उठा है और जो नहीं उठ सका उसमें शायद इसकी कमी थी। कुछ लोग खुद हौसला रखते हैं पर दूसरों को नहीं दे पाते वहीं कुछ लोग दूसरों को हौसला देते हैं पर खुद नहीं रख पाते। पहले को रिजर्व और दूसरे को सोशल कह सकते हैं। दोनों में बेहतर कौन है ये बिहेवियर सांइस के शोध का विषय है। कहते हैं सकारात्मक सोच हौसला या हिम्मत जुटाने का सबसे अच्छा श्रोत है। सोच हमें अपने चारों तरफ के वातावरण से मिलती है पर यह भीतर से भी आती है चूंकि भीतर का बाहर और बाहर का भीतर प्रभाव पड़ता है इसलिए हमारी सोच भी सकारात्मक से नकारात्मक और नकारात्मक से सकारात्मक होती रहती है। सामान्य स्थिति में बाहर का भीतर पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है ईसीलिए हमारा खुशियां हमारी सोच अक्सर दूसरों की मेहरबानी पर निर्भर करती है। जब हम किसी की मेहरबानी पर जीते हैं तो हम में हिम्मत या हौसला नहीं होता और जो होता है उसे डर कहते हैं भला डर के सहारे कभी कोई ऊंचा उठ सकता है? बुद्ध ने इसे समझा था और कहा था ” अपो दीपो भव:” अपने दीपक आप बनें। इसे आत्मसात करिये और खुद के बनाए डर से ऊपर उठिये..

गुस्सा

मौसम साफ था..पर मन नहीं..बाहर के आकाश में सूरज चमक रहा था.. पर उसका मन संदेह,आशंका,डर से भरा हुआ था। वो बाहर से सामान्य दिख रहा था पर उसके अंदर तूफान उठ रहा था। ये तूफान अपने साथ सबकुछ बहा ले जाना चाहता था..सारी मर्यादा तोड़ते हुए सब कुछ मिनटों में खत्म कर देना चाहता था। ये क्रोध का तूफान था जो बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह पूरी गति से भाग रहा था और सामने आने वाली हर चीज़ को अपने आगोश में ले रहा था..और यह सब इतनी तेजी से हो रहा था कि वो कुछ भी सोच समझ नहीं पा रहा था। उसने बहुत कुछ सीखा था..पर क्रोध पर नियंत्रण करना वो नहीं सीख पाया था। तभी उसने एक बच्चे को देखा जो रोने के बाद अब हस रहा था..उसकी आँखें चमक रहीं थी…वो बेपरवाह था इससे कि क्या हुआ और आगे क्या होगा? वो तो बस वर्तमान में था। अचानक उसे महसूस हुआ कि तूफान थम गया है..वो शांत हो गया था। वो उठा और चल पड़ा..उसे रास्ता मिल गया था।

शुरूआत

गाड़ी तेजी से बढ़ रही थी। वक्त मानो पंख लगा के उड़ रहा था। सभी दौड़ रहे थे वो भी भाग रहा था। जितनी जल्दी हो सके जितना ज्यादा हो सके वो सब कुछ पा लेना चाहता था। दूसरों की नजर में खुद को साबित करना चाहता था फिर भले ही खुद की नजरों में गिरना क्यूं न पड़े। नियम तो जरूरत के मुताबिक हर कोई बदल लिया कराता है ।उसने तो खुद को ही बदल लिया था। रिश्ते,प्यार, दुआ, ईमान, गांव, दोस्त, हिंदी और माँ-बाप सब दूसरी पिछड़ी दुनिया के लगते थे। तभी एक धमाका हुआ और उसकी नींद टूट गई। गाड़ी पटरी से उतर गई थी। भीषण रेल हादसा हुआ था। चारों तरफ सिर्फ लाशें और धूल थी। उसकी आँखों के सामने वो पिछड़ी दुनिया घूम गयी फिर चल दिया वो एक नई शुरुआत पर… दूसरों की नजर में सफल होकर।

आसान रास्ता

आज वह उठा तो कुछ उदास था.अपनी उदासी का कारण दूसरों में ढूंढा तो जो मिला वो पहले से पता था.आसान था यह रास्ता…दूसरों में खुद को ढूंढना हमेशा आसान होता है. मुश्किल है तो बस खुद को ढूंढना..जो सबसे करीब है वो नजर नहीं आता और जो दूर दिखता है वो सबसे आसान लगता है…यही देखने का नजरिया ही तो कारण था उसकी उदासी का..शायद किसी ने ईसे समझा था और लिखा दिया था..”आनंद श्रोत बह रहा फिर मन क्यूं उदास है? अचरज है कि जल में रह कर भी मछली को प्यास है.”