बस चलते रहना जरूरी है

जब भी इन्सान कोई निर्णय लेता है तो वह यह सोच के नहीं लेता कि यह गलत साबित होगा। दरअसल निर्णय आज की परिस्थितियों में लिए जाते हैं जबकि कल की बदली हुई परिस्थितियां उन्हें सही या गलत साबित करती हैं। कल किसी ने नहीं देखा है पर इंसान की फितरत होती है अनुमान लगाने की और इसी आधार पर वह निर्णय लेता है।

जीवन ताश के खेल की तरह है। हमने खेल का आविष्कार नहीं किया है और न ताश के पत्तों के नमूने ही हमने बनाये हैं। हमने इस खेल के नियम भी खुद नहीं बनाये और न हम ताश के पत्तों के बँटवारे पर ही नियंत्रण रख सकते हैं। पत्ते हमें बाँट दिये जाते हैं, चाहे वे अच्छे हों या बुरे। इस सीमा तक नियति या भाग्य की भूमिका है।

पर हम खेल को अच्छे या खराब ढंग से खेल सकते हैं। हो सकता है कि किसी कुशल खिलाड़ी के पास खराब पत्ते आये हों और फिर भी वह खेल में जीत जाये। यह भी संभव है कि किसी खराब खिलाड़ी के पास अच्छे पत्ते आये हों और फिर भी वह खेल को बिगाड़ करके रख दे। हमारी जिंदगी किस्मत और चुनाव का मिश्रण है।

कल किसी ने नहीं देखा है पर इंसान की फितरत होती है अनुमान लगाने की और इसी आधार पर वह निर्णय लेता है।आप कितनी सटीकता से भविष्य का अनुमान लगा सकते हैं यह आपकी दूरदर्शिता को निर्धारित करता है और आपकी दूरदर्शिता निर्धारित करती है आपके निर्णय के सफल या असफल होने की संभावना को। अनुमान तो कोई भी लगा सकता है पर अनुभव के साथ अनुमान लगाने की संभावना बढ़ जाती है।

यदि हमारा वर्तमान मुश्किल परिस्थितियों में घिरा है तो इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि हमारा भविष्य भी अन्धकारमय होगा। हमारा भविष्य भी उज्ज्वल हो सकता है। आवश्यकता है ध्यानपूर्वक यह देखने की कि जो कुछ हमारे पास है उसका सबसे अच्छा उपयोग हम कर पा रहे हैं अथवा नहीं?

यदि हम उपलब्ध साधनों का दुरुपयोग करते हैं, तो चाहे वह कितने ही तुच्छ और सारहीन क्यों न हो, हम उसके भी अधिकारी नहीं रहेंगे। यह साधन भी हमसे दूर चले जायेंगे या छीन लिए जाएंगे।

खुद के सुधार के बिना परिस्थितियाँ नहीं सुधर सकतीं। अपना दृष्टिकोण बदले बिना जीवन की गतिविधियाँ नहीं बदली जा सकती हैं। इस बात को इंसान जितनी जल्दी समझ ले उसके लिए उतना ही अच्छा है।

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