जो बीत गई सो बात गई

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यदि व्यक्ति किसी घटना को लगातार और लंबे समय तक याद करता रहता है तो वह दीर्घकालीन स्मृति में परिवर्तित होकर अवचेतन मन में चली जाती है

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इन्सान अपने अतीत की सुखद घटनाओं के स्थान पर दुखद एवं पीड़ित करने वाले क्षणों को अधिक याद करता है। हमारे साथ किसने अच्छा किया है वह याद नहीं रहता जितना कि हमारे साथ बुरा हुआ है वह याद रहता है।

बीते हुए कल की कड़वी यादें हमारा पीछा आसानी से नहीं छोड़ती हैं। ये यादें हमें पीड़ा देती हैं और परेशान करती रहती हैं। बीते हुए कल के दुखद क्षणों को याद करते-करते हम वर्तमान में अपने संबंधों को भी अनजाने में ही प्रभावित करते रहते हैं।

हम कोशिश तो बहुत करते हैं पर ये यादें हमें पीछे खींचती रहती हैं। हम रहते तो आज में हैं पर जीते उस बीते हुए कल के साथ हैं जिसकी यादें हमारे मन-मस्तिष्क को कुरेदती रहती हैं।

वर्तमान और अतीत की इस कशमकश में हमारा मन तनाव, ग्लानि और क्रोध से भर जाता है जिसका हमारे संबंध एवं कार्यक्षमता दोनों पर बुरा असर पड़ता है।

जब हम दर्द भरी दुखद घटनाओं को याद करते हैं तो हमारे शरीर में जैव रासायनिक क्रियाओं में वृद्धि हो जाती है। जिसके कारण अनेक हार्मोन का स्राव होता है इनमें से कुछ क्रियाएं और हार्मोन शरीर और मन के लिए अत्यंत हानिकारक होते हैं और इनका मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

बीते हुए कल की कड़वाहट से बचने का सबसे बढ़िया तरीका खुद को अपनी रूचि के अनुसार किसी अच्छे कार्य में मनोयोग पूर्वक लगाए रखना है।

अतीत की कडुआहट से बचने के लिए हमें वर्तमान में जीने का प्रयास करना चाहिए। जो वर्तमान को संभाल लेता है, वह अतीत की भूलों से सीख लेकर अपने भविष्य को संवार लेता है।

जिंदगी बड़ी बहुमूल्य एवं बेहद खूबसूरत है,उसे केवल वर्तमान के पलों एवं क्षणों से सजाया और संवारा जा सकता है।

यदि भविष्य को सँवारना हो तो अतीत को गुजर जाने दीजिए।

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