जिन्हें फिक्र थी कल की वो रोए रात भर

जिन्हें फिक्र थी कल की
वो रोए रात भर
जिन्हें यकीन था खुदा पर
वो सोए रात भर।

हालात ने जैसे चाहा
वैसे हम ढल गए
बहुत संभल कर चले थे
लेकिन पैर फिसल गए।

चलते रहे जिंदगी की राहों पर
बहते पानी की तरह
जीवन में लोग आते- जाते रहे
सफर के मुसाफिर की तरह।

जो न कहना था लबों को
वो नज़रों ने कह दिया
करवां गुजर चुका था
अकेला मैं रह गया।

जब चले सच की राह पर
तो उसूल कुछ तोड़ने पड़े
जहां पर मेरी गलती न थी
वहां भी हाथ मुझे जोड़ने पड़े।

सजदे पर झुकने की वजह भी
क्या कमाल होती है
झुकता है सिर जमीन पर
दुआ कुबूल आसमान में होती है।

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